नवीन कुमार-
अनुराग द्वारी ने हिंदी की गोबरपट्टी की “भाई साहब पत्रकारिता” का पाप धोया है। उन पत्रकारों के पाप जिन्होंने पत्रकारिता को ही घंटा बना दिया और उसे लटका दिया मंत्रियों, नेताओं और अफसरों के दरबार में- “भाई साहब” आपके क्या कहने।
मंत्री मंत्री होता है, अफ़सर अफ़सर होता है, मेयर मेयर होता है। पद बनाए ही गए हैं इसलिए कि उसे उसके पदनाम से पुकारा जाए। और उसकी जिम्मेदारी तय जा सके। लेकिन गोबरपट्टी के पत्रकारों ने इसे लीपकर सबको “भाई साहब” बना दिया। मंत्री भी भाई साहब, मुख्यमंत्री भी भाई साहब, मेयर भी भाई साहब, पार्षद भी भाई साहब, दारोगा थानेदार कोतवाल भी भाई साहब। और तो और, संपादक, ब्यूरोचीफ, चीफ रिपोर्टर भी भाई साहब।
यह सम्मान देना नहीं है- यह लिलिजापन है। स्वीकृत और पुरस्कृत होने की लिप्सा में अपने आपको तिरोहित कर देना।
दरअसल, ऐसे लोग कहना तो बाप जी चाहते थे पर हया भी कोई चीज़ होती है। नतीजा “भाई साहब” पर घंटा लटका देना पड़ा। लेकिन मार्शल मैकलुहान कहता था- मीडियम इज़ द मैसेज। तो पत्रकार कहते हैं- भाई साहब, लेकिन नेता, मंत्री, मुख्यमंत्री सुनता है बाप जी। और जैसे ही किसी को आप भाई साहब या बाप जी बना लेते हैं, वैसे ही आप उसके लिए घंटा हो जाते हैं, आपका स्वाभिमान उसके लिए घंटा हो जाता है, आपका अस्तित्व उसके लिए घंटा हो जाता है।
तो मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में पत्रकारिता का मतलब ही है “भाई साहब” का घंटा। भाई साहब जैसे बजाएंगे वैसे बजना होगा। भाई साहब का घंटा बनने की क़ीमत भाई साहब तय करेंगे- यह एक जोड़ी जूते, घड़ी, मफलर, जैकेट, गॉगल्स से लेकर ज़मीन के प्लॉट या बिल्डिंग मैटेरियल, सोफे, बच्चे की फ़ीस या ट्रांसफोर पोस्टिंग की दलाली तक कुछ भी हो सकती है। भाई साहब पत्रकारिता के उसी घंटा बाज़ार से निकली अनुराग की तड़प और बेचैनी ने इसके लिजलिजेपन को उधेड़कर रख दिया है।
अनुराग गोबर पट्टी की “भाई साहब पत्रकारिता” के घंटा बाज़ार में जनता की तरफ़ से इंसानियत के हक में सबसे बुनियादी सवाल पूछने की गुस्ताखी कर बैठा। इससे भी सीधे तरीके से कहें तो “भाई साहब पत्रकारिता” के घंटा बाज़ार में खड़े इस पेशे के जल्लादों के बीच उसने इंसान बने रहना चुना। आपके निकम्मेपन की वजह से 10 लोग तड़प-तड़पकर मर गए मंत्री जी- हां तो, घंटा। आपकी सरकार ने जनता को पाखाने का पानी पिलाया है मंत्री जी- हां तो, घंटा। जनता आज भी गंदा पानी पी रही हैं मंत्री जी मैं देखकर आया हूं- हां तो, घंटा.. होकर आए हो तुम। आपने कहा था इलाज सरकार कराएगी लेकिन ऐसा नहीं हो रहा मंत्री जी- हां तो, घंटा। क्या फोकट का सवाल है।
इसके बाद एनडीटीवी के पत्रकार अनुराग द्वारी ने मध्य प्रदेश के घंटा मंत्री का घंटा बजा दिया। अनुराग ने अपने व्यक्तिगत स्वाभिमान और पत्रकारीय निष्ठाओं को बचाने के लिए जिस दुस्साहस का परिचय दिया वह आज की तारीख़ में दुर्लभतम घटनाओं में से है। लेकिन इसकी नौबत क्यों आई? एक उजड्ड, मूर्ख और निहायत बेहूदे मंत्री की इतनी हिम्मत कैसे हो गई कि वो उन सवालों को “फोकट” का बता रहा है। यह हिम्मत एक दिन में नहीं आती। इसकी संस्कृति क़ायम की गई है। भाई साहब संस्कृति। हिंदी के अखबारों में संपादक संपादक होता ही नहीं है। वो भाई साहब होता है। नीचे से ऊपर तक यह भाई-चारा संस्कृति फलती फूलती रहती है।
इस घटियापन और लिजलिजेपन को “भाई साहब पत्रकारिता” के बाज़ार में सम्मान कहा जाता है। इस बाज़ार में सवाल, जवाब और उसके पूछे जाने का समय सब “भाई साहब” तय करते हैं। कैलाश विजय वर्गीय ने अनुराग द्वारी को घंटा नहीं कहा। राहुल कँवल को घंटा कहा। एनडीटीवी को घंटा कहा है। उसके मैनेजिंग एडिटर और इनपुट हेड को घंटा कहा है। और इसलिए कहा है कि उसे पता है भाई साहब बाज़ार में किसकी जगह क्या है। यकीन मानिये गौतम अडानी के सामने इंदौर की जनता को पाखाने का पानी पीने पर मजबूर करने वाला कैलाश विजयवर्गीय पाखाना कर देगा। लेकिन अनुराग के सामने उसने इसलिए घंटा निकालकर उछाल दिया कि उसे इसकी आदत लगाई गई है। और ये आदत लगाई है मध्य प्रदेश के तमाम स्वनामधन्य और इनामधन्य पत्रकारों, संपादकों, लेखकों, कवियों ने।
ऐसे में एक भी आदमी सचमुच में पत्रकारिता की गरिमा के पक्ष में तनकर खड़ा हो जाता है तो कैलाश विजयवर्गीय जैसे घटिया लोगों को चौराहे पर आकर नाक रगड़नी पड़ जाती है। लेकिन यकीन मानिए ऐसे लोग उस जीव के दुम की तरह होते हैं जो कभी सीधी नहीं हो सकती। क्योंकि भाई साहब पत्रकारिता के पुरोधाओं की मंडली उसे यकीन दिलाने बैठ जाती है- भाई साहब आप तो जानते ही हैं वो कैसा है, जाने दीजिए न भाई साहब, ये जूता कितना शानदार है कहां से लिया भाई साहब। और भाई साहब अपना सड़ा हुआ दाँत खोदते हुए पिच से थूकते हुए कहते हैं आया था उसके बॉस का फ़ोन, गिड़गिड़ा रहा था। अरे हां, जग्गा को अपने जूते की साइज बता देना। फिर भाई साहब की पालतू पत्रकार मंडली होहो करके हंसती है- इसकी क्या ज़रूरत थी भाई साहब। होहोहो।
मैं जानता हूं अनुराग “भाई साहब पत्रकारिता” के जोंक पुरोधाओं के बीच अकेला पड़ गया होगा। बड़े-बड़े चमकने वाले चेहरे खुले विरोध की बात तो छोड़िए एक फ़ोन तक करने से कतरा रहे होंगे। तुम्हारे आने वाले दिन और अकेलेपन के होंगे। लेकिन यकीन मानना जोंक की तरह भाई साहब के घंटे से चिपके चपंडुकों के बीच मिला यह अकेलापन तुम्हारी सबसे बड़ी पूंजी है। यह अकेलापन तुम्हारी रीढ़ और सिर दोनों को भाई साहबों की आखों में आँख डालकर सवाल पूछने का हौसला देता रहेगा। तुम्हारे साथ खड़ा होना गौरव है, और जो ख़ामोश हैं हम जानते हैं कि भाई साहबों की चौखटों कों उनकी नाकें चिकनी कर रही होंगी। इसे बेशर्मी कहना शर्म का मायनों को भी शर्मिंदा करना होगा।
अगर सचमुच में मध्य प्रदेश में पत्रकारिता का कोई पेशेवर स्वाभिमान जीवित होता तो कैलाश विजय वर्गीय के सामूहिक बहिष्कार का एलान हो चुका होता। ऐसा तब होता जब कैलाश विजय वर्गीय एक मंत्री होता। लेकिन वो इस से ज्यादा “भाई साहब” है। ज्यादा उछलेंगे तो भाई साहब घंटा हिला देंगे। हर पत्रकार अनुराग द्वारी की तरह नहीं होता कि वही घंटा उसके मुँह पर उछाल देगा। कम देखें
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