पंकज शुक्ला-
क्या जाने-अनजाने कार्तिक आर्यन को भी हिंदी सिनेमा का अगला सुशांत सिंह राजपूत बनाने की स्क्रिप्ट लिखी जा रही है? आपको अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत के आकस्मिक निधन के बाद की वो ख़बरें याद हैं, जिनमें हिंदी सिनेमा की एक मशहूर पीआर एजेंसी का भी नाम आया था? वैसा ही कुछ कुछ अब कार्तिक तिवारी उर्फ़ कार्तिक आर्यन के साथ हो रहा है। उनकी फ़िल्में ओटीटी पर अच्छे दामों पर बिक रही हैं, लेकिन ये ऐसी फ़िल्में हैं जो सिनेमाघरों में चलने लायक बनी ही नहीं हैं।
मतलब साफ़ है, बाहर से आए और अपने दम पर बुलंदियों तक पहुंचे एक लड़के को नंबर वन का दावेदार बनने ही मत दो। और, अगर काम की बुराइयों से बात न बने तो उसके चरित्र पर लांछन लगा दो।
किसी मेहनतकश हुनरमंद को बर्बाद करने का सबसे घटिया और सबसे आसान तरीक़ा है, चरित्रहनन। कार्तिक आर्यन के साथ जो हुआ, वह मुझे थोड़ी देर से पता चला और वह भी एक युवा अभिनेत्री से, जिसने इस पूरे केस को इंटरनेट पर फॉलो किया है। ये पूरा केस बना ही ज़ेन ज़ी इंटरनेट यूजर्स के बीच।
पहले तो मुझे समझ ही नहीं आया कि वह कह क्या रही है, फिर मैंने घर आकर इंटरनेट खंगाला तो साफ़ हुआ कि ये एक पीआर एजेंसी के उतावलेपन का परिणाम है। ये एक फ्लॉप फ़िल्म के बाद अपने हीरो को लाइमलाइट में लाने के प्रयोग के उल्टा पड़ जाने जैसा मामला लगता है।
कार्तिक की पिछली फ़िल्म ‘तू मेरी मैं तेरा मैं तेरा तू मेरी’ की रिलीज़ वाले दिन ही मैंने कार्तिक को मैसेज किया था कि उन्हें उन फ़िल्म निर्माताओं से बचकर रहना होगा, जो उन्हें लेकर “ओटीटी फ़िल्में” बना रहे हैं। मतलब कि ऐसी फ़िल्में जो ओटीटी पर तो ऊंचे दामों पर बिक जाएं लेकिन सिनेमाघरों में जिन्हें देखने दर्शक ही न आएं। कार्तिक को बात समझ भी आई और उन्होंने इस पर चर्चा के लिए मिलने की बात भी मानी, लेकिन तब तक ये गोवा कांड हो गया।
ऐसा ही कुछ सुशांत सिंह राजपूत के साथ भी हो चुका है। उनके केस की तफ़्तीश अगर ईमानदार तरीक़े से हुई होती, घटनास्थल पर समय रहते लोग पहुंच गए होते और दिशा सालियान के केस की तफ़्तीश भी ढंग से हुई होती तो मामले की सच्चाई सामने आ जाती। सुशांत से तो ‘सोनचिड़िया’ की रिलीज़ के दौरान इस मामले पर लंबी बात भी हुई थी और वह अपनी दिशा और दशा बदलने की बात मान भी गए थे, लेकिन तब तक शायद देर हो चुकी थी।
इनसाइडर-आउटसाइडर का ये संघर्ष अभी बीते दो ढाई दशक में हिंदी सिनेमा में ज़्यादा वीभत्स हुआ है। रणबीर कपूर ने इसकी तरफ़ अभी हाल ही में इशारा भी किया कि हिंदी सिनेमा नए टैलेंट को मौका नहीं दे रहा है और यही वजह है कि हिंदी फ़िल्में बतौर सिनेमा अपनी पहचान खोती जा रही हैं।
कार्तिक आर्यन का इस महीन जो विवाद सामने आया, वह किसी वाटर आर्मी का किया धरा लगता है। हुआ यूं कि Reddit और X पर सक्रिय कुछ यूज़र्स ने खुद को “डिजिटल डिटेक्टिव” की तरह पेश करते हुए हुए कार्तिक की गोवा वेकेशन से जुड़ी तस्वीरों और इंस्टाग्राम स्टोरीज़ की तुलना, उनकी फॉलोअर एक किशोरी/युवती से की। पोस्ट्स में दावा किया गया कि कार्तिक आर्यन और ये युवती एक ही समय पर, एक ही गोवा रिसॉर्ट में मौजूद थे। बीच टॉवेल, लाउंजर और वॉलीबॉल नेट जैसी पृष्ठभूमि की समानताओं को इन अटकलों का आधार बनाया गया।
इश्क़, मोहब्बत तक ये बात रहती तो इसमें कुछ भी बुरा नहीं था, लेकिन मामले में संगीन मोड़ तब आया जब लोगों ने इस युवती को नाबालिग साबित करने की कोशिशें शुरू कर दीं और कार्तिक को ऐसे ऐसे विशेषणों से पुकारा जाने लगा, जिसका ख़ामियाज़ा उन्हें अब लंबे समय तक भुगतना पड़ सकता है। ज़ेन ज़ी को ढाल बनाकर कार्तिक पर ये ‘बिलो द बेल्ट हमला’ कैसे और क्यों हुआ? ये अब ज़ाहिर होना शुरू भी हो चुका है।
यहां मुझे वह कविता याद आती है, जिसमें भीड़ से बचकर निकलने की सलाह दी जाती है और भीड़ के रास्ते में कभी न आने को कहा जाता है, क्योंकि भीड़ की आंख नहीं होती है। डिजिटल भीड़ की अदालत में फैसले अक्सर तेज़ होते हैं, लेकिन सच तक पहुंचने का रास्ता कोई तय नहीं करना चाहता। कोढ़ में खाज, उनकी पीआर एजेंसी ने ये किया कि इस विवाद के बाद उसने कुछ ऐसे एंटरटेनमेंट जर्नलिस्ट्स से कार्तिक के हक़ में (पेड/अनपेड) ट्वीट करा दिए, जिन्हें रेडिट यूजर्स ने पहले से एक ‘खांचे’ में रखा हुआ है।
कार्तिक आर्यन का कुछ साल पहले तक अपनी हर सह-कलाकार नायिका से नाम जुड़ता रहा है। फ़िल्म ‘लव आजकल’ के दौरान उनके और सारा अली ख़ान के बीच जो कुछ चल रहा था, उसका तो मैं भी दिल्ली से आगरा के बीच आगरा एक्सप्रेसवे पर चश्मदीद गवाह रहा हूं। लेकिन, किसी ग़ैर फ़िल्मी लड़की के साथ उनका नाम पहली बार जोड़कर जो गॉसिप सुर्खियां बनाने की कोशिश की गई, वह ग़ैर ज़रूरी दिखती हैं। इन सुर्खियों के बाद ही यूजर्स ने दोनों की उम्र का अंतर खंगालकर मामला सनसनीखेज़ बना दिया।
‘भूल भुलैया 2’ से लेकर ‘भूल भुलैया 3’ के बीच कार्तिक की एक भी फ़िल्म नहीं चली। ‘भूल भुलैया 3’ के बाद फिर यही रिपीट होता दिख रहा है और इसकी बड़ी वजह हैं कार्तिक के आसपास ऐसे लोगों का कम होते होना, जो सही को सही और ग़लत को ग़लत कहने का दम रखते हों। और, तुलसी बाबा तो कब का लिख गए, ‘सचिव बैद गुर तीनि जौं प्रिय बोलहिं भय आस। राज धर्म तन तीनि कर होहि बेगिहि नास।।’



