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दिल्ली

केजरीवाल की कुर्सी : सत्तालोक के नियम नेता समझता है और आम आदमी सिर खुजाता है!

रंगनाथ सिंह-

दिल्ली की ख़ाली कुर्सी…

कॉमरेड तृप्ता वाही और विजय सिंह ने अपनी बेटी को “मार्लेना” सरनेम दिया! अगर्ज कॉमरेडों को लग रहा होगा कि उन्होंने मार्क्स और लेनिन को श्रद्धांजलि दी है मगर हिन्दी पट्टी में ऐसा सरनेम देना बताता है कि दोनों ही अपनी सांस्कृतिक जमीन से कट चुके थे वरना ऐसा भोलापन न दिखाते।

उत्तरपंथी दायरे में दोनों ही सम्मानित नाम रहे हैं। दोनों ने अपनी सुपुत्री को देश के सबसे अच्छे इंग्लिश मीडियम स्कूल में पढ़ाया। सबसे अच्छे कॉलेज में पढ़ाया। फिर बेटी ब्रिटेन के सबसे अच्छे यूनिवर्सिटी में गयी। यह कहानी चलती रही। उनकी बेटी के राजनीति में आने के कुछ समय बाद हम जैसों को पता चला कि ये सम्मानित कॉमरेडों की बेटी हैं।

सरनेम का रहस्य भी तब खुला जब उसका मजाक बनना शुरू हो गया। यह सब चलता रहा मगर आज से पहले कभी ऐसा नहीं लगा कि उनकी बेटी पर कुछ लिखना चाहिए।

दो सम्मानित कॉमरेडों की सुपुत्री ने देश-विदेश में सर्वश्रेष्ठ संस्थानों से शिक्षा प्राप्त करने के बाद दिल्ली की मुख्यमंत्री बनकर वह कर दिखाया जो भारतीय राजनीति में इसके पहले नहीं हुआ था। माननीय मुख्यमंत्री ने त्रेतायुग के भरत की याद दिला दी! मगर क्या उनका चरित्र भी त्रेतायुग वाले भरत जैसा साबित होगा? इस सवाल का जवाब वक्त देगा फिलहाल यही लग रहा है कि राजसत्ता के खेल में किसी की पृष्ठभूमि, परवरिश और शिक्षा से ज्यादा फर्क नहीं पड़ता है।

सत्ता लोक के गुरुत्वाकर्षण के नियम अलग हैं जिन्हें राजनेता समझते हैं और नासमझ आम आदमी उन्हें लेकर सिर खुझाते रहते हैं।

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