संजय कुमार सिंह
इरान पर अमेरिका-इजराइल के हमले से शुरू हुआ खाड़ी युद्ध चौथे हफ्ते में है। अब यह प्रचार किया जा रहा है कि नरेन्द्र मोदी भारत और भारतीयों पर युद्ध के प्रभाव को कम करने के लिए सक्रिय हैं। सच्चाई यह है कि प्रधानमंत्री इजराइल के दौरे से लौटे और युद्ध शुरू हुआ। इस कारण उन्हें और भारत को अमेरिका-इजराइल के साथ माना जा रहा है लेकिन अब वे खाड़ी के देशों के नेताओं को फोन कर रहे हैं और उन्हें सक्रिय दिखाया जा रहा है। टाइम्स ऑफ इंडिया की आज की लीड ऐसी ही है। हिन्दी में यह शीर्षक कुछ इस तरह होता, ईरान के राष्ट्रपति से फोन पर बात-चीत में नरेन्द्र मोदी ने संरचनाओं पर हमले की आलोचना की, कहा पानी के जहाज का रास्ता खुला रहना चाहिए। इस खबर का इंट्रो है, पेजेश्कियन ने भारत से अपील की कि टकराव खत्म करने के लिए ब्रिक्स की भूमिका का उपयोग करें। यही खबर दि एशियन एज की लीड है। अमर उजाला में यह टॉप पर पांच कॉलम में है। आज अमर उजाला की लीड का शीर्षक है, अमेरिका ने ईरानी तेल पर 30 दिन के लिए हटाई बिक्री पाबंदी। वैसे तो अमेरिका पाबंदी लगा रहा है, हटा रहा है, हम मान रहे हैं यही खबर है और अलग से होनी चाहिए लेकिन इसे सामान्य मानने वालों को प्रधानमंत्री महान लगेंगे कि वे अमेरिका से यह सब करवा पा रहे हैं। इस लिहाज से नरेन्द्र मोदी को महान बनाने-दिखाने का मीडिया खेल चल रहा है। सोशल मीडिया पर भाजपा के अपने प्रयास भी चल रहे हैं।
द हिन्दू में भी आज यह खबर सेकेंड लीड है। हालांकि इसके साथ कांग्रेस का यह सवाल भी है कि क्या सरकार ने कोई प्रमुख कूटनीतिक पहल की है? खबर के अनुसार, कांग्रेस ने शनिवार को ईरान पर अमेरिका-इजराइल के हमलों की निंदा नहीं करने के लिए केंद्र सरकार की कड़ी आलोचना की। पार्टी ने पूछा कि क्या सरकार ने तनाव कम करने या युद्धविराम के लिए कोई महत्वपूर्ण राजनयिक पहल की है? यहां गौर तलब है कि अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प ने ऑपरेशन सिन्दूर रोकने का दावा किया, विपक्ष के बार-बार कहने के बावजूद प्रधानमंत्री ने इस बारे में कुछ नहीं कहा और ट्रम्प अपना दावा दोहराते रहे। तब वे विश्व शांति के लिए काम करते प्रचारित किए जा रहे थे। अब उन्होंने इजराइल के साथ मिलकर इरान पर हमला बोल दिया है। ऐसे में उनके मित्र होने का दावा करने वाले प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने क्या कहा और किया उसपर सबकी नजर है और सवाल तो पूछे ही जाने चाहिए। पर मीडिया की ऐसी भूमिका तो नहीं ही है कांग्रेस के सवाल को भी महत्व नहीं दिया गया है। हिन्दुस्तान टाइम्स में भी यह खबर तीन कॉलम में है। मोदी की फोटो है लेकिन कांग्रेस का सवाल नहीं। युद्ध के मुख्य खबर के साथ ट्रम्प के हवाले से यह भी बताया गया है कि वे युद्ध को समेटने पर विचार कर रहे हैं।
आज के इन अखबारों में सरकार के प्रचार की ये खबरें तो हैं लेकिन विपक्ष के आरोप गायब हैं। यह सब तब है जब चौथे हफ्ते में प्रवेश कर चुके खाड़ी युद्ध से संबंधित कई खबरें हैं। कलकत्ता के अंग्रेजी अखबार, द टेलीग्राफ की लीड अमेरिकी सेना की सूचना है जो वाशिंगटन डेटलाइन से छपी है। इसके अनुसार, युद्ध शुरू होने के बाद से अमेरिकी सेना ने ईरान में 8000 से ज्यादा लक्ष्यों को निशाना बनाया है। इसके मुकाबले इंडियन एक्सप्रेस और देशबन्धु की लीड ईरान के नए हमले की खबर है जो बताती है कि वह अभी भी लड़ रहा है और पूरी तरह टिका हुआ है। एक्सप्रेस का शीर्षक हिन्दी में इस तरह होगा, ईरान ने डेइगो गार्सिया पर लंबी दूरी की दो मिसाइलें दागीं। अखबार ने इजराल के रक्षा मंत्री के हवाले से यह भी लिखा है कि खतरे खत्म होने तक हमले जारी रहेंगे। देशबन्धु ने इसे 4000 किलोमीटर दूर मिसाइल दागने का मामला बताया है और लिखा है, ईरान ने ताजा हमला हिन्द महासागर में अमेरिका और ब्रिटेन के सैन्य बेस पर कर दिया है। इस तरह ईरान ने मध्य पूर्व से बाहर भी अपनी ताकत दिखाई है। यह भारत के साथ दुनिया के चिन्तित होने का समय है। हिन्दुस्तान टाइम्स की लीड का शीर्षक है, इजराइल ने इरान के परमाणु प्लांट पर फिर से हमला किया। तेहरान ने ब्रिटिश-अमेरिकी बेस पर निशाना साधा। द हिन्दू की लीड के अनुसार, ट्रंप युद्ध समाप्त करने पर विचार कर रहे हैं; अमेरिका ने ईरान के तेल पर लगे प्रतिबंधों में ढील दी।
इसमें खबर यही है कि अमेरिका ने ईरानी तेल के संबंध में ढील दी लेकिन इसका मतलब सिर्फ यह नहीं है कि ट्रम्प युद्ध खत्म करने पर विचार कर रहे हैं। नवोदय टाइम्स की लीड के अनुसार, इरान के नतांज परमाणु संयंत्र पर हमला, अमेरिका ने युद्ध पोत और मिसाइलें भेजीं। इस तरह, इरान और इजराइल मुकाबले में डटे हुए हैं जबकि द टेलीग्राफ ने लिखा है, (अभी तक) यह स्पष्ट नहीं है कि ट्रम्प प्रशासन अपने लक्ष्य हासिल करने के कितने करीब है। ऐसे में क्षेत्रीय सुरक्षा की मोदी की जरूरत अपनी जगह है और वे जो कर रहे हैं उसका प्रचार अभी जैसा हो रहा है वैसा शुरुआती दिनों में नहीं हुआ था। जाहिर है कि वे अमेरिका और इजराइल के साथ थे और तब सबको लग रहा था अमेरिका इजराइल इरान को आसानी से निपटा देगा और शुरू में भारत का रुख भी बात नहीं करने और किसी की परवाह नहीं करने वाला था। बाद में जो हुआ वह सब हम जानते हैं, मैं लिखता रहा हूं।
युद्ध चल रहा है तो हमले दोनों तरफ से होंगे, हो ही रहे हैं। कोई किसी को प्रमुखता दे कोई किसी और को यह भी सामान्य है। लेकिन इस स्थिति में अगर किसी खबर का इंतजार है तो यही कि युद्ध खत्म होने से संबंधित कोई संकेत है या नहीं। भारत में, भारत और भारतीयों से संबंधित खबरें महत्वपूर्ण हो सकती हैं लेकिन प्रधानमंत्री के फोन कॉल को खबर बनाना, रुपए की गिरती कीमत के लिए युद्ध को जिम्मेदार ठहराना, युद्ध के किसी एक हमले की प्रधानमंत्री द्वारा आलोचना और उसे महत्व दिया जाना ऐसी खबरें हैं जो प्रधानमंत्री के प्रचारकों को पसंद आएंगी। टाइम्स ऑफ इंडिया ने ये सारी खबरें की हैं और दिल्ली के पालम इलाके में जब एक बिल्डिंग में आग लगने से नौ लोगों की मौत हुई तो अखबार ने यह नहीं लिखा कि डेढ़ घंटे तक सहायता नहीं पहुंची और दमकल वालों की सीढ़ी टूट गई। यही नहीं, तीन लोग सबसे ऊपर की मंजिल से कूद गए – पढ़कर लग रहा है कि वे घबराहट में कूद गए होंगे लेकिन सीढ़ी टूट गई, वैकल्पिक इंतजाम डेढ़ घंटे बाद हो पाया ऐसी सूचनाएं हैं जो खबर का महत्वपूर्ण हिस्सा होना चाहिए था लेकिन टाइम्स ऑफ इंडिया ने इसे महत्व नहीं दिया। युद्ध में अमेरिका की भूमिका, एप्सटीन फाइल में नाम और उससे संबंधित खुलासे के बाद प्रधानमंत्री का इजराइल जाना, कंप्रोमाइज्ड होने का आरोप – ऐसे मामले हैं जिसका छिद्रान्वेषण अखबारों को करना चाहिए पर वह तो नहीं ही हो रहा है। प्रधानमंत्री के फोन करने और सोशल मीडिया पर इसकी सूचना को खबर बना दिया जा रहा है।

मैं रोज तीन हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल नौ, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। एआई का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।


