कब तक संक्रमण के दौर से गुजरती रहेगी हिन्दी पत्रकारिता

हिन्दी पत्रकारिता संक्रमण काल से गुजर रही है… यह बात तब से सुन रहा हूँ, जब मैंने (1987) पत्रकारिता शुरू की थी | बातचीत के दौरान मेरे सीनियर यह जुमला दोहराते थे… अब सोचता हूँ कि कब इसके अच्छे दिन थे ? वो दिन लद गए, जब पत्रकारिता मिशन हुआ करती थी…आजादी के पहले अंग्रेजों से लड़ने का हथियार हुआ करती थी अब धंधा होकर रह गयी है | हर धंधे की तरह इसका भी उद्देश्य मुनाफ़ा रह गया है…. फिर यदि अखबार या चैनल (खबरिया) कार्पोरेट जगत का हो, बात ही क्या ? 

कही पढ़ा या यूं कहूँ कि सोना था की मालिक अपने कर्मचारी को उतना ही वेतन डरता है जितने में यह उसके काम रहे….कार्ल मार्क्स का अतिरिक्त पूंजी/मुनाफे का भी यही सिद्धांत है | काम के आठ घंटे में चार घंटे मजदूर अपने वेतन के लिए काम करा है तो बाकी के चार घंटे मालिक के मुनाफे के लिए…. आज स्थिति बदली यही दो घंटे हम वेतन के लये काम करते हैं तो बाकी छह घंटे मालिक के मुनाफे के लिए |  

एक सवा महीने में मई दिवस आने वाला है… मजदूरो की बदहाली पर हम सभी हमेशा की तरह घड़ो आंसू बहायेंगे | हम पत्रकार भी श्रमजीवी क़ानून के तहत आते हैं…हम भी मई दिवस मनाएंगे….. हममें से बहुत काम इसके बारे में जानते है | आज से डेढ – पौने दो सौ साल पहले शिकागो में महिला कर्मचारियों ने काम के घंटे को लेकर हड़ताल किया था…तब वे १२ से १६ घंटे तक काम करती थीं…आज भी स्थिति बहुत अच्छी नहीं है | श्रमजीवी पत्रकार क़ानून के तहत हमारे काम के घंटे छह है… कौन सा समाचार या चैनल इसका पालन करता है….

लोग कहते हैं कि पत्रकारिता लोकतंत्र का चौथा खम्बा है…और हम फूलकर कुप्पा हो जाते हैं… सरकार के तीन अंग हैं विधायका, कार्यपालिका और न्यायपालिका| चौथा पत्रकारिता को जोड़ लिया गया है | बहरहाल अगर हम चौथे खम्बे हैं तो इसकी हालत इतनी दयनीय क्यों है ? यह इतना खोखला क्यों है ? यह घृणा हुआ क्यों है ? विधायका, कार्यपालिका और न्यायपालिका| की तुलना में हम इतने लाचार क्यों है ? नौकरी के अंतिम दौर में भी इतने असुरक्छित क्यों हैं ? जो समय एक पिता को अपनी बेटी के लिए वार या लड़के के लिए नौकरी तलाशने का होता है उस समय हम अपने लिए नौकरी तलाशते है…..

एक नजर चौथे खम्बे की माली हालत पर | एक प्रतिष्ठित अखबार जिसका चैनल भी है वहा पर २२-२३ साल पहले सम्पादकीय विभाग ने नौकरी की शुरूआत करने वाले कर्मचारी का वेतन २५ हजार है तो राज्य सरकार में प्राइमरी स्कूल के टीचर का शुरूआती वेतन २५ हजार के आसपास है… २५ हजार वेतन पाने वाला अखबार का यह कर्मचारी १९९१ में १८५० पाटा था तो शिक्छा विभाग का कर्मचारी उसी दौर में २१०० रूपये…. वेतन में ही नहीं वेतन ढांचे में भी बहुत झोल है ?  २५ हजार वेतन पाने वाला अखबार के कर्मचारी का बेसिक १०००० है तो डीए ५००० पीएफ ५००-७०० | वो भी सबका एक मानक नहीं है |  

अभी-अभी bhadas4 मीडिया में पढ़ा कि ” पत्रकारों की फांकामस्ती पर कुछ तो शर्म करों संपादको ” अब संपादक क्या शर्म करेंगे ? अब संपादक संपादक नहीं मालिक का गुलाम बनकर रह गया है…मदारी की तरह मालिक डमरू बजाता है और संपादक चुतर हिलाता है…..

हां अब बात मुद्दे की…. जिसने हमें यह लिखने  के लिए प्रेरित किया | वह है पत्रकारों की फांकामस्ती | सूना है की कभी किसी अखबार में एक उप संपादक के लिए इश्तिहार छपा था जिसे वेतन दो जून की रोटी थी | घाघ सीनियर अक्सर यही उदाहरण देतें है और ताना भी कि जब सारी सुख-सुविघाएं चाहिए तो भईया इस पेशे मै क्यों आये ? मतलब आये हो तो उसी ढाँचे में रहो . करने की छोडो बेहतर भी न सोचो | यही सोच तो मालिकों की है….. यही सोच ने हमारी स्थिति दिहाड़ी मजदूर से भी बुरी कर दी है….एक सामान्य दिहाड़ी मजदूर को ३०० से ४०० तो मिस्तिरी को ४०० से ७०० मिलते हैं…. यानी मजदूर की औसत आय १०००० तो मिस्तिरी की १५,००० होती है… एक सम्मानित अखबार के सम्पादकीय में काम करने वाला नियमित कर्मचारी भी १२, हजार से अधिक नहीं पाता | एक राष्ट्रीय अखबार में ८ साल से संवादसूत्र के रूप में काम करने वाले को मिलता है ७-८ हजार रूपये वो भी टीडीएस काटकर… इसमें कान्वेश और मोबाइल का खर्च भी शामिल होता है | 

केंद्र सरकार अपने कर्मचारियों की बेहतरी के लिए हर १० साल पर वेतन आयोग का गठन करती है | इसके बाद पत्रकारों के लिए आयोग का गठन किया जाता है | मेरी जानकारी के अनुसार अबतक ४ बार आयोग गठित हो चुके हैं बछवात ,  पालेकर मरिशाना और अब मजीठिया | वेतन आयोगों की संस्तुति के अनुसार कोई अखबार पाने कर्मचारियों को वेतन और उसके परिलाभ क्यों नहीं देता | ये अखबार और चैनल वाले अपने-आपको नियम-क़ानून से पर क्यों मानते हैं | सरकारी और निगम में काम करने वाले कर्मचारियों के लिए हर नया वेतन आयोग ढेरों खुशियाँ लेकर आता है लेकिन पत्रकारों के लिए ढेरों गम ऐसा क्यों ? 

 मित्रों अगर हम एक नहीं होंगे तो आगे भी आयोग गठित किये जाएंगे और रद्दी की टोकरी में फेंक दिए जायेगे | अब भी समय है एक होईये और अपने हक़ के लिए लड़िये | इसके लिए भड़ास४ मीडिया के माध्यम से कोर्ट जाइए | भाई यशवंत जी से और एडवोकेट उमेश शर्मा जी से संपर्क करिये |

भड़ास की खबरें व्हाट्सअप पर पाएं
  • भड़ास तक कोई भी खबर पहुंचाने के लिए इस मेल का इस्तेमाल करें- bhadas4media@gmail.com

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *