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आयोजन

महाकुंभ, योगी आदित्यनाथ, भगदड़ और गरीबी

समरेंद्र सिंह-

र्म एक बड़ा रहस्य है। हम और आप ये बहस कर सकते हैं कि धर्म सही है या गलत? या फिर धर्म की जरूरत है या नहीं है? इस लोक से लेकर परलोक से जुड़े अनगिनत सवालों पर चर्चा कर सकते हैं? चर्चा इस पर भी कर सकते हैं कि क्या यज्ञ, स्तुति, प्रार्थना से भाग्य बदलता है या नहीं? लेकिन धर्म का विराट अस्तित्व कोई नकार नहीं सकता। मानव जीवन और मानव संस्कृति में इसका महत्व बहुत बड़ा है।

महाकुंभ में डुबकी और गरीबी

कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने कहा कि गंगा में डुबकी लगाने से क्या गरीबी मिट जाएगी? नहीं मिटेगी। लेकिन धर्म गरीबी मिटाने के लिए नहीं है। धर्म अमीर बनाने के लिए भी नहीं है। डुबकी लगाने से पाप मिटेंगे या नहीं मिटेंगे – ये सवाल अपनी जगह है। लेकिन डुबकी लगाने से मन की पीड़ा जरूर कम होगी। डुबकी लगाते समय जाने-अनजाने हुई गलतियों और अपराधों के लिए श्रद्धालु क्षमा मांगते हैं। क्षमा मांगने से मन का संताप कम होता है।

इसका महत्व वो लोग नहीं समझ सकते जिनका यकीन धर्म और ईश्वर में नहीं है। इसका महत्व सिर्फ उन्हीं लोगों के लिए है जिनकी आस्था धर्म में है। ईश्वर में है। और धर्म के सिद्धांतों में है। जीवन और मरण का चक्र, पाप और पुण्य का बही खाता साधारण मनुष्यों के लिए है। वो साधारण मनुष्य जो मुश्किलों से घिरने पर असहाय होता है तो स्वयं को अपने आराध्य को समर्पित कर देता है। इस विश्वास के साथ कि वो उसे इस भंवर से बाहर निकालेगा। भंवर से बाहर मनुष्य अपने पुरुषार्थ से बाहर आता है या फिर दैवीय हस्तक्षेप से ये तय कौन करेगा और कैसे करेगा – खासकर तब जब इसका कोई निर्धारित पैरामीटर नहीं है। पैमाना नहीं है।

कर्म से भाग्य बदलता है। कर्म में ईश्वर और जन्म दोनों जुड़ा है। जीवन भी जुड़ा है। मेरा विश्वास ‘कर्म फल’ पर नहीं है। मुझे यह बात भी अजीब लगती है कि परमात्मा से निकल कर आत्मा को अंत में परमात्मा में ही मिलना होता है। ऐसा है तो फिर इस जीवन चक्र की जरूरत क्या है? ईश्वर का एकांकीपन से उकताना और फिर माया के जरिए एक से अनेक में बंटना भी मुझे समझ में नहीं आता। ईश्वरीय माया मुझे झूठी लगती है। लेकिन बात मेरे या आपके यकीन की नहीं है। बात उन करोड़ों, अरबों लोगों के यकीन की है जो धर्म, ईश्वर और गुरू को अंतिम सत्य मान कर अपना जीवन जीते हैं।

उनका जीवन गंगा में डुबकी लगाने से सरल नहीं हो जाता। मगर उन्हें ऊर्जा जरूर मिलती है। इससे उन्हें मानसिक सांत्वना भी मिलती है। संतोष मिलता है कि उन्होंने अपने और अपने पूर्वजों के पापों का प्रायश्चित कर लिया है। या फिर उन्होंने अपनी मुश्किलों को हल करने के लिए अपने ईश्वर से प्रार्थना कर दी है। और इस विश्वास से प्रार्थना की है कि वो हल जरूर निकालेगा।

भगदड़ से बढ़ी चुनौती

महाकुंभ में भगदड़ और 30 लोगों की मौत की खबर चिंताजनक है। लेकिन ये भी सत्य है कि इस हादसे से ईश्वरीय सत्ता में लोगों के विश्वास पर कोई फर्क नहीं पड़ने वाला। धर्म की संरचना में कर्म का खेला अद्भुत है। हादसे के साथ ही कर्म का सिद्धांत लागू हो गया। मृत्यु निर्धारित थी। जीवन और मृत्यु – दोनों पर अधिकार ईश्वर का होता है। वही समय और तरीका तय करता है। इसलिए इस हादसे के तुरंत बाद करोड़ों लोगों ने गंगा में डुबकी लगाई। अपने और अपनों के लिए प्रार्थना की।

यही धर्म है। महाकुंभ में डुबकी लगाने का ये सिलसिला थमने वाला नहीं है। कोई भगदड़, कोई हादसा, कोई हमला मनुष्य को उसके ईश्वर से दूर नहीं कर सका है। कम से कम अतीत तो ऐसा ही रहा है। प्रयागराज इसका गवाह और प्रतीक दोनों है। इसलिए योगी आदित्यनाथ सरकार के सामने अभी मातम मनाने का समय ही नहीं है। अभी करोड़ों लोगों का स्वागत करना है। और महाकुंभ में स्नान के बाद उन्हें सकुशल विदा करना है। पहले ही ये बहुत बड़ी चुनौती थी। अब ये चुनौती और बढ़ गई है।

अनहोनी की आशंका और साजिश की चेतावनी थी इसलिए तैयारी भी थी

भगदड़ के बाद एक बड़ा तबका मौज ले रहा है। कुछ का कहना है कि धर्म को कारोबार बना दिया गया है। इनमें से कुछ चाहते हैं कि महाकुंभ में आने से लोगों को रोका जाए। कुछ भगदड़ के लिए सजा देना चाहते हैं। महाकुंभ में तैनात अफसरों को बर्खास्त कराना चाहते हैं। कुछ को उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का सिर चाहिए।

योगी का सिर मांगने वालों में कुछ धर्म के ठेकेदार भी हैं। मंच पर बैठ कर समानता का ज्ञान दे रहे हैं। दिख रहा है कि वो खुद मंच पर बैठे हैं। उनके दाएं और बाएं दो-चार भक्त खड़े हैं। प्रश्न पूछने वाला नीचे बैठा है। और वो बराबरी का ज्ञान दे रहे हैं। अगर उन्हीं को प्रश्न पूछने वाले के बराबर बिठा दिया जाए तो वो अपने सम्मान की बात करने लगेंगे। ये पाखंड है। कुछ दिन पहले उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री धर्म के इन्हीं ठेकेदार के सामने गए थे। तब इन्होंने पूर्व मुख्यमंत्री को भी अपने कदमो के नीचे बिठा दिया। भेद को बरकरार रखते हुए, श्रेष्ठता के अहंकार से बजबजाते हुए समानता के अधिकार पर प्रवचन देना कमाल का हुनर है।

आखिर वो कौन लोग हैं जो महाआयोजन को विफल बनाना चाहते हैं?

एक बड़ा तबका लगातार इस कोशिश में था कि ये महाआयोजन सफल नहीं हो। लेकिन योगी आदित्यनाथ भी लगातार इस कोशिश में हैं कि महाआयोजन सफल हो और कुछ नुकसान नहीं हो। मगर जब करोड़ों लोगों का हुजूम एक छोटे से क्षेत्र में उमड़ने लगे तो अनहोनी की आशंका बढ़ जाती है। सरकार में बैठे लोगों को भी ये आशंका थी। ये भी खबरें भी कि कुछ लोग इसे विफल बनाने की साजिश कर रहे हैं, इसलिए किसी भी अप्रिय हालात से निपटने की तैयारियां भी युद्ध स्तर पर की गईं थीं।

ये उन तैयारियों का ही नतीजा है कि जो नुकसान हो सकता था, वो नहीं हुआ। तब भी नहीं जब कुंभ क्षेत्र में एक जगह अचानक आग लगी और सिलेंडर फटने लगे। और कल भी जब करोड़ों लोगों का जत्था डुबकी लगाने को बढ़ चला था। भगदड़ को एक छोटे से हिस्से में रोक लिया गया। घायलों को तुरंत अस्पताल पहुंचाया गया। नुकसान हुआ और ये नुकसान नहीं होना चाहिए था। मगर प्रशासन मुस्तैद नहीं होता, अफसर दिन रात काम में नहीं जुटे होते तो नुकसान कितना होता इसका अंदाजा लगाना मुश्किल था।

राजनीति क्रूर होती है। योगी आदित्यनाथ के विरोधियों को अवसर मिला है। वो इस अवसर का भरपूर लाभ उठा रहे हैं। लेकिन यहां वो एक भूल कर रहे हैं। वो धर्म के नाम पर धर्म के रक्षकों की बलि मांग रहे हैं। इसमें उनको मुंह की खानी पड़ेगी।

पूरा देश देख रहा है कि कैसे चंद महीनों में सारी तैयारी की गई है। प्रयागराज में इस बार देर तक पानी ठहरा था। सितंबर महीने में गंगा का पानी से चढ़ गया था। अक्टूबर से लेकर जनवरी तक महज चार महीने में श्रद्धालुओं के ऐतिहासिक स्वागत की नींव तैयार की गई। महाकुंभ के जरिए दुनिया भर में हिंदू धर्म और संस्कृति के विराट प्रदर्शन की योजना अकेले उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की नहीं थी। इस योजना में केंद्र की भी भूमिका रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की भूमिका रही है। हिंदू धर्म के लगभग सभी बड़े संगठन शामिल रहे हैं।

ये आयोजन हमारी और आपकी कल्पना से बड़ा आयोजन है। और जब भी ऐसा कोई आयोजन होता है अनिश्चितता बढ़ जाती है। अनहोनी की आशंका बढ़ जाती है। मैं ऐसे एक आयोजन में प्रत्यक्ष तौर पर शामिल रहा हूं। हरिद्वार में लाखों लोग जुटे थे। भगदड़ मच गई। हमारी सबसे बड़ी और पहली कोशिश थी कि घायलों को इलाज पहुंचाने के साथ अफवाहों को रोका जाए ताकि नुकसान नहीं हो। फिर कुछ घंटे में हालात काबू में आये तो नुकसान का लेखा-जोखा तैयार किया गया। मरने वालों की संख्या 16 थी। रात होने तक चार और शव बरामद हुए। मंथन इस पर हुआ कि बढ़ा आंकड़ा घोषित करें या नहीं करें।

हमने तय किया कि आंकड़े घोषित किए जाएंगे। हादसा हमारे वश में नहीं था। मगर शव छुपाकर हम अपराध करते। हमने ये अपराध नहीं किया। आयोजन करने वाली संस्था के मुखिया ने रात में ही डीएम, एसपी को बुला कर सारा ब्यौरा दिया। फिर तुरंत प्रेस रिलीज तैयार करके सारे फैक्ट्स अपडेट के साथ मीडिया के सामने रखे गए। दो दिन तक तनाव रहा। लेकिन धीरे-धीरे स्थिति सामान्य हो गई।

उस भगदड़ के तुरंत बाद ये खबरें भी आईं कि भगदड़ मची नहीं, कुछ लोगों ने आयोजन को विफल बनाने के लिए साजिशन अफरा-तफरी फैलायी। लेकिन ये जांच का विषय था। यहां भी जांच शुरू हो गई है। जांच से ही ये सपष्ट होगा कि भगदड़ स्वत: मची या मचाई गई। ये हादसा था, या फिर कोई साजिश थी। अगर साजिश थी तो उन लोगों को छोड़ा नहीं जाना चाहिए जिन्होंने अपने सियासी लाभ के लिए अराजकता फैलाने की कोशिश की है।

पूरे देश से, विदेश से लोग जुट रहे हैं, हजारों मील की यात्रा करके पहुंच रहे हैं, वो सभी इस विश्वास के साथ आ रहे हैं कि योगी आदित्यनाथ की सरकार ने उनके स्वागत की भव्य तैयारियां की हैं। और उनका ईश्वर उनके साथ है। जो ईश्वर पर विश्वास के साथ महाकुंभ के पावन अवसर पर गंगा में डुबकी लगाने पहुंच रहे हैं, वो महाकुंभ की भव्यता और योगी आदित्यनाथ की सरकार का समर्पण भी देख रहे हैं। इसलिए इस हादसे को आधार बना कर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के खिलाफ जो कोई भी ओछी राजनीति कर रहा है, उसे मुंह की खानी पड़ेगी।

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