रजत शर्मा-
कुणाल कामरा ने शिंदे को गद्दार कहा, चोर कहा. लेकिन ये तो उद्धव ठाकरे और संजय राउत सौ-सौ बार कह चुके हैं. रोज़ कहते हैं. शिन्दे ने उद्धव की कुर्सी छीनी. उनकी पार्टी छीनी. पार्टी का सिंबल छीन लिया. इसलिए उद्धव बार-बार उन्हें ‘खोखा चोर’ कहते हैं. और जब-जब मौका मिलता है, शिंदे भी, उद्धव ठाकरे को असली गद्दार कहते हैं. धोखेबाज़ कहते हैं. इसीलिए शिंदे को तो ऐसी बातों का बुरा मानने का कोई अधिकार नहीं है.
ये सही है कि कुणाल कामरा कई बार शालीनता की सीमा, पार करते हैं. लेकिन ऐसी बातों से डील करने के लिए, कानून है, अगर Kunal Kamra ने बोलने की आज़ादी का गलत फायदा उठाया, तो इसकी शिकायत कोर्ट में की जानी चाहिए. लेकिन शिंदे के supporters को, कानून हाथ में लेने की इजाज़त कैसे दी जा सकती है? आज महाराष्ट्र में शिंदे की शिवसेना सरकार में है इसीलिए शिंदे के सपोर्टर्स को तोड़फोड़ करने का license तो नहीं दिया जा सकता.
प्रियंका दुबे-
कुणाल कामरा के संदर्भ में :
कुछ वर्ष पहले प्रशांत कनौजिया नामक दिल्ली के एक पत्रकार को उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का “अपमान” करती हुई एक ट्वीट करने के लिए गिरफ़्तार किया गया था. अब शायद प्रशांत नेता बन गए हैं, लेकिन तब पत्रकार थे.
हमारे अपने रिपोर्टर्स सर्किल में जब हमें (मुझे और मेरे मित्रों को) पूरा मामला पता चला तो हमने प्रशांत की गिरफ्तारी के ख़िलाफ़ सार्वजनिक स्टैंड लिया और सार्वजनिक रूप से उनका समर्थन किया. लेकिन अंदर आपस में हम जो बात करते थे उनमें हम बहुत निराश होते थे. हमें लगता था कि वह ट्वीट बिल्कुल ग़ैर-ज़रूरी थी और उससे कोई जनहित नहीं सध रहा था.
हमारा (और किसी भी अच्छे पत्रकार का) यह मानना था कि गौरव जनहित में प्रकाशित अपने काम के लिए गिरफ़्तार होने में है, यह फालतू की सोशल मीडिया चिरकुटई करने में नहीं. इस तरह की ग़ैर-ज़िम्मेदाराना ट्वीट्स से बचा जा सकता था. इससे अच्छा होता कि प्रशांत जनता के पक्ष में लिखी किसी तथ्यों पर आधारित watertight रिपोर्ट के लिए गिरफ़्तार होते तो हम भी शान से सड़क पर उतरते.
आपस में सब यही कहते कि बताओ अब यह दिन आ गए हैं कि इन फालतू की ट्वीट्स को डिफेंड करना पड़ रहा है. लेकिन सार्वजनिक रूप से किसी को पता भी नहीं चला कि साथी पत्रकार यह सब भी सोच रहे हैं. सार्वजनिक रूप से हमने सिर्फ़ प्रशांत की गिरफ़्तारी का विरोध किया और उनके फ्रीडम ऑफ़ स्पीच का समर्थन किया.
ऐसा इसलिए था क्योंकि ज़्यादातर सीरियस पत्रकारों का (और मेरा भी) यही मानना है कि ट्वीट के लिए गिरफ़्तार तो नहीं कर लोगे न? भले ही ट्वीट कुछ भी हो, अपमान करने वाली हो या कुछ भी हो, जब तक वह अहिंसक है – तब तक आप किसी पर इतना out of proportion रिएक्शन नहीं कर सकते. सरकार की इस heavy-handedness और भयंकर रूप से ग़ैर आनुपातिक प्रतिक्रिया ने हमें मजबूर किया कि हम प्रशांत की गिरफ्तारी का विरोध करें और हमने किया भी.
हमारा समय इतना bitter और अति में चलता हुआ हो चुका है कि यहाँ हर कोई नींबू की चोरी पर कमिश्नर को बुला रहा है. अनुपात नाम की चिड़िया हमारे समय से उड़ चुकी है. इसलिए असहमत होते हुए भी कई बार लोकतंत्र और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की खातिर उन चीज़ों का भी सपोर्ट करना पड़ता है जिसने मेरे अपने भी reservations हों. क्योंकि reservations होना, अप्रिय होना या कुछ नापसंद होना एक बात है. उसके लिए आप गुंडई तो नहीं मचाएँगे न! और बात-बात पर होने वाली इन एफ़आईआरों का विरोध तो होना ही चाहिए.
हमारे यहाँ अब कोई चीज़ escalate हो नहीं पाती क्योंकि वो पैदा ही भयंकर escalated फॉर्म में हो रही है. नॉर्मल तीर कमान का सीन ही नहीं है. जनता मामला शुरू ही ब्रह्मास्त्र से कर रही है. कुछ भी पसंद नहीं आया तो सीधे गुंडागर्दी- तोड़ फोड़ – केस मुक़दमा. थोड़ा अप्रिय को सहने की आदत सबको विकसित करनी चाहिए वरना इन मूर्खताओं का कभी अंत नहीं होगा.
और हाँ, जब भी मूर्खतापूर्ण (लेकिन अहिंसक) अभिव्यक्ति और उस अभिव्यक्ति पर हुए हिंसक हमलों में से चुनना होगा तो मैं हमेशा (मूर्खतापूर्ण ही सही, लेकिन) अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का समर्थन करूँगी. अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का समर्थन लोकतंत्र का समर्थन है.
राजदीप सरदेसाई इस मसले पर क्या कह रहे हैं? नीचे सुनिए…



