विमल कुमार-
हिंदी की वरिष्ठ लेखिका ममता कालिया और नवजागरण काल साहित्य की अध्येयता एवम जेएनयू में प्रोफेसर गरिमा श्रीवास्तव ने आज युवा कवि शालू शुक्ल के पुरस्कार समारोह में इशारों-इशारों में यह बता दिया कि पुरस्कृत कवि काफी कमजोर हैं और एक कमजोर किताब को शीला सिद्धान्तकार स्मृति सम्मान दिया गया।

लखनऊ की गृहणी शालू शुक्ल को आज 17वें शीला सिद्धान्तकार स्मृति पुरस्कार से उनके कविता संग्रह “तुम आना बसंत “के लिए दिया गया। अगर निर्णायक किसी कमजोर कृति को पुरस्कार देते हैं तो यह रचनाकार का दोष नहीं बल्कि चयन समिति का दोष है।
गौरतलब है कि यह सम्मान अनुपम सिंह और शालू शुक्ल को दिये जाने की घोषणा की गई तो अनुपम ने यह पुरस्कार लौटा दिया था। आज वह समारोह में आई भी नहीं थी।
क्या यह माना जाए कि किसी निर्णायक विशेष ने शालू शुक्ल को यह पुरस्कार देने का दवाब बनाया था।
आखिर जब यह पुरस्कार एक ही कवि को आम तौर पर दिया जाता है तो संयुक्त रूप से इसे क्यों दिया गया।
आम तौर पर वक्ता समारोह में पुरस्कृत कवि की कविताओं की आलोचना नहीं करते पर ममता जी और गरिमा ने बेबाक ढंग से अपनी बातें रखी पर शालू की कुछ कविताओं की तारीफ भी की पर प्रेम कविताओं से ऊपर उठने और प्रेम की जटिलताओं को समझने की भी सलाह दी।
यह सम्मान अनुराधा सिंह सुलोचना दास जैसी परिपक्व कवयित्रियों को पहले मिल चुका है। कुछ साल पहले भी वरिष्ठ कवि मदन कश्यप ने इस समारोह के मंच से निर्णायक पद से इस्तीफा दे दिया था।
हिंदी की वरिष्ठ लेखिका ममता कालिया ने श्रीमती शालू शुक्ल को उनके काव्य संग्रह “तुम आना वसंत ” के लिए यह सम्मान प्रदान किया। हिंदी के चर्चित आलोचक ज्योतिष जोशी ने पुरस्कार के प्रशस्ति पत्र का वाचन किया। जवाहरलाल नेहरू विश्विद्यालय में प्रोफेसर गरिमा श्रीवास्तव ने शालू शुक्ल की कविताओं पर अपना वक्तव्य दिया।
शालू शुक्ल ने अपना एक संक्षिप्त वक्तव्य दिया और दो कविताओं का पाठ किया।
समारोह की अध्यक्षता ममता कालिया ने की। समारोह में शीला जी पर एक वृतचित्र को भी दिखाया गया। इसका निर्देशन रामजी यादव ने किया जबकि यह फ़िल्म हिंदी के प्रसिद्ध आलोचक कर्ण सिंह चौहान की, लेखकों पर फिल्मों की योजना के तहत बनी है।
25 मिनट की फ़िल्म में शीला जी का इंटरव्यू भी है और नित्यानंद तिवारी केदारनाथ सिंह मंगलेश डबराल पंकज सिंह अनामिका रेखा अवस्थी आशा जोशी की, शीला जी की कविताओं पर टिप्पणियां भी हैं।
उत्तरप्रदेश के कानपुर में जन्मी शीला जी दिल्ली में अनुवाद ब्यूरो की एक अधिकारी थीं। 60 वर्ष की उम्र में उनक़ा कैंसर से निधन हो गया था। विद्रोही स्वभाव की शीला जी ने प्रयाग संगीत सम्मेलन से विशारद भी किया था और वे सितार वादक भी थीं और सितार की शिक्षिका थीं। उनके तीन चार कविता संग्रह भी छपे थे। उनकी 500 कविताओं के संचयन का लोकार्पण केदारनाथ सिंह ने किया था। हर साल उनकी स्मृति में यह पुरस्कार किसी युवा कविता को उनके संग्रह पर दिया जाता है।


