लखीमपुर की घटना में किसके बीच खेला जा रहा है शह और मात का खेल?

Krishan pal Singh-

लखीमपुर खीरी की घटना में फिलहाल मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने सब उलट पुलट कर दिया है। केन्द्रीय गृह राज्यमंत्री अजय मिश्रा टेनी अपनी शौर्य प्रतिभा के कारण अमित शाह के नयनों के तारे हैं, बड़े दुलारे हैं यह तो स्पष्ट था लेकिन अभी तक के घटनाक्रम से यह भी माना जा रहा था कि योगी तक शाह का लिहाज करके अजय मिश्रा के प्रति अपने पूर्वाग्रहों को एक तरफ करके वक्त की नजाकत समझते हुए उनके सपूत आशीष मोनू को बचाने में कसर नहीं छोड़ने वाले।

अजय मिश्रा भी इस बात से कहीं न कहीं आश्वस्त थे इसीलिए उनका बेटा जब एसआईटी के सामने बयान देने के लिए लखीमपुर की पुलिस लाइन्स में पहुंचा तो उसमें हेकड़ी भरी हुई थी लेकिन वहां उसके साथ जो हुआ उससे उसके बाप तक के छक्के छूट गये होंगे। आशीष की गिरफ्तारी को लेकर सूत्रों के हवाले से जो खबरें वायरल कराई गई हैं उससे अजय मिश्रा सरे चैराहा बेपरदा किये जाने जैसी स्थिति में अपने को पा रहे होंगे। यह दूसरी बात है कि इसके बावजूद अजय मिश्रा के भविष्य को लेकर केन्द्र में अभी तक कोई जुम्बिश नजर नहीं आ रही है। लेकिन अब योगी पाक साफ हो चुके हैं और भलाई बुराई के केन्द्र में मोदी-अमित शाह अटक गये हैं।

अजय मिश्रा का प्रोफाइल देखें तो उनमें कोई ऐसी खूबी नहीं है जिससे उनको इस कदर प्रमोट किये जाने का औचित्य समझा जा सके। 1990 से उनके खिलाफ मुकदमें दर्ज होने शुरू हो गये थे जिसकी वजह से पहले उनकी छवि मवाली के तौर पर रही। 2009 में उनका राजनीतिक अवतार हुआ जब वे निर्दलीय तौर पर लखीमपुर में जिला पंचायत अध्यक्ष चुन गये। इसके बाद 2012 में उनकी राजनीतिक मान्यता तब थोड़ी और सुदृढ़ हो गई जब उन्होंने निघासन क्षेत्र से सपा की लहर में भाजपा के टिकट पर विधानसभा का चुनाव जीत लिया। किस्मत जब मेहरबान होती है तो तरक्की के सिलसिले जुड़ते चले जाते हैं। इसी तर्ज पर 2014 के लोकसभा चुनाव में वे सांसद चुन गये तो उनकी राजनीति में और निखार आ गया। हालांकि इसके बाद उन्होंने अपनी जगह 2017 में अपने इसी लाड़ले बेटे को निघासन से विधानसभा का टिकट दिलाने की कोशिश की पर उनकी दाल नहीं गल पायी।

सन 2000 में अजय मिश्रा के विरूद्ध एक 24 वर्षीय युवक प्रभाकर गुप्ता की हत्या का मुकदमा दर्ज हुआ था। इसकी सुनवाई के दौरान अदालत में उन पर जानलेवा हमला भी हुआ जिसमें वे बाल-बाल बच गये। 2003 में तत्कालीन जिला जज ने अपने रिटायरमेंट के दिन उक्त हत्या के मुकदमें में उन्हें बरी करने का पुण्य लाभ उठाया और सेवा से विदा हो गये। पीड़ित पक्ष ने इसके खिलाफ हाईकोर्ट में अपील की जिसमें साढ़े तीन वर्षो से फैंसला सुरक्षित बना हुआ है। करत-करत अभ्यास……..की तर्ज पर मुकदमों को लड़ते हुए कानून के विद्यार्थी रहे अजय मिश्रा कानूनी दावपेचों में भी माहिर हो गये जिसकी बानगी उक्त प्रसंगों में देखी जा सकती है। इसके अलावा उनकी हिस्ट्रीशीट खुली थी उसे भी उन्होंने अपने इस हुनर से बंद करा लिया।

लोकसभा चुनाव जीतने के बाद अजय मिश्रा जब अमित शाह के संपर्क में आये होंगे तो उनके इतिहास ने लगता है कि अमित शाह को बेहद प्रभावित किया। अमित शाह ने नरेन्द्र मोदी की सरपरस्ती में राजनीति में सिफर से शिखर तक का रास्ता जिस तरह तय किया है उससे वे भलिभांति वाकिफ हो चुके हैं कि राजनीतिक सफलता में दबंगी के गुण की कितनी अहमियत है। चूंकि अजय मिश्रा अब एक संवैधानिक पद पर बैठे हैं इसलिए उनके संदर्भ में दबंग का विशेषण अनगढ़ लगता है इसीलिए हमने ऊपर की पंक्तियों में इसे तराशकर शौर्य प्रतिभा के नफासत रूप में इसे प्रस्तुत किया है।

बहरहाल कद्रदान अमित शाह मौके की तलाश में रहे कि कब अजय मिश्रा को ऊंचाई तक ले जाकर पार्टी का फायदा करायें। इसी बीच अजय मिश्रा 2019 में भी लोकसभा का चुनाव दूसरी बार जीत गये तो अमित शाह को उन्हें लेकर इस तरह का मंसूबा पूरा करने में और सहूलियत हो गई। इस वर्ष जुलाई में उत्तर प्रदेश में ब्राह्मणों की नाराजगी दूर करने के बहाने से उन्होंने न केवल अजय मिश्रा को केन्द्रीय मंत्रिमंडल में जगह दिला दी बल्कि उन्हें अपना ही कनिष्ठ साथी भी बना लिया जबकि ब्राह्मणों को मलहम लगाने लायक अजय मिश्रा का कद भी नहीं था जिन्हें मंत्री बनाये जाने के समय उनके निर्वाचन क्षेत्र के बाहर प्रदेश की राजनीति में शायद कोई जानता भी नहीं होगा। आपराधिक मुकदमें वाले व्यक्ति को गृह विभाग दिलाने से उन पर उंगलियां उठी तो इस तरह की उंगलियों की परवाह करना उनका स्वभाव नहीं रहा है।

अजय मिश्रा की निगाह अभी भी निघासन में 2022 के चुनाव में आशीष को विधानसभा का टिकट दिलाने पर थी अगर पिता पुत्र राजनीतिक व्यक्ति होते तो वे राजनीतिक तरीके से इसके लिए बिसात बिछाते पर शक्ति का प्रतीक माने जाने वाली खाकी का आका बनने के बाद मद के कारण उनकी मूल प्रवृत्ति और ज्यादा उछाल मार गई और यही लखीमपुर कांड की वजह बना। अपने पैतृक गांव बनवीरपुर में पिता की स्मृति में होने वाले दंगल को एक बड़ा राजनीतिक शो बनाकर उसमें बेटे आशीष की विधानसभा चुनाव के लिए लांचिंग की तैयारी अजय मिश्रा ने की थी पर किसानों ने रंग में भंग कर दिया। उनकी यह जुर्रत न अजय मिश्रा को सहन हुई और न ही आशीष को। बात-बात पर दूसरों को सबक सिखाने के लिए ललकारने वाले पिता पुत्र तामसी आवेश में जो कर बैठे वही उनकी थार जीप से शांतिपूर्ण ढ़ंग से पैदल जा रहे किसानों को कुचलने का सबब बन गया।

योगी सरकार ने अजय मिश्रा को बड़े छलावे में रखा। पहले आशीष को छूने से डरने का दिखावा इस सरकार की पुलिस करती रही। इसी बीच एक इंटरव्यू में योगी ने कहा कि वे दबाव में किसी को गिरफ्तार नहीं करेंगे जो कि आशीष के संदर्भ में कथन था। इसलिए अजय मिश्रा और निश्चिंत हो गये। इसके बाद जब आशीष को समन किया गया तो भी अजय मिश्रा इसलिए सतर्क नहीं हुए क्योंकि उन्हें लगा कि सुप्रीम कोर्ट के दबाव की वजह से यह नाटक किया जा रहा है वरना आशीष को सीआरपीसी की दफा 160 में क्यों बुलाया जाता। इस दफा में मुल्जिम नहीं गवाह आहूत किये जाते हैं। फिर पहले दिन आशीष पूंछतांछ के लिए पेश नहीं हुए तो भी पुलिस ने कोई कड़ाई नहीं की और अगले दिन के लिए समन चस्पा करवाकर जैसे छुटटी पा ली। नतीजतन अजय मिश्रा और भ्रम में रहे।

09 अक्टूबर को इसी गफलत में आशीष निर्धारित समय से बीस मिनट पहले लकदक कपड़ों में लखीमपुर की पुलिस लाइन में एसआईटी के सामने पहुंचा जहां दरवाजे पर उसकी अगवानी की गई ताकि उसके साथ अंदर जो होने वाला है उसका वह अंदाजा न कर सके। उसके साथ लखीमपुर सदर के विधायक भी थे उन्हें गेट के बाहर से ही चलता कर दिया गया। आशीष ने सबसे पहले एक पेन ड्राइव एसआईटी के डीआईजी उपेन्द्र अग्रवाल के सामने पटकी जिसमें लगभग 200 वीडियो क्लिप थी जिसमें उसकी उपस्थिति दंगल स्थल पर नजर आ रही थी। पहले वह बड़े स्मार्ट तरीके से पेश आ रहा था लेकिन एसआईटी ने उस पर फंदा कसने के लिए पूरा जाल बुन रखा था। जैसे ही आशीष को यह एहसास हुआ उसके होश उड़ गये और माथे पर लगातार पसीना चुंहचुहाने लगा।

एसडीएम के सामने उसके बयान दर्ज करवाये गये जिसको 164 के कलम बंद बयान का दर्जा माना जाता है। एसआईटी ने उससे पूंछा कि यह तो ठीक है कि आप ज्यादातर समय दंगल में व्यवस्था कराते रहे लेकिन किसानों के कुचले जाने का जो समय है उस पौन घंटे में आपकी लोकेशन कहां रही यह तो ये वीडियो नहीं बता रहे। इसके लिए तो आपको ही मुंह खोलना पड़ेगा। इस सवाल पर आशीष की बोलती बंद हो गई। पुलिस ने पर्याप्त होम वर्क किया था। घटना के समय उसके मोबाइल की लोकेशन घटना स्थल के समीप के टावर के आसपास थी। इस बात के इलैक्ट्रोनिक साक्ष्य पुलिस ने हाथ में ले रखे थे। और भी कई परिस्थितिजन्य साक्ष्यों की चर्चा पुलिस ने की। यानि पुलिस उसके साथ किसी भी तरह की मुरब्बत दिखाने के मूड में नहीं रही।

सूत्रों के हवाले से पुलिस की पूंछतांछ के प्रमुख बिन्दुओं को लीक करके योगी सरकार ने यह इमेज बना ली है कि उसकी पुलिस इस मामले में पूरी निष्पक्षता और निर्भीकता से काम कर रही है। साथ ही आशीष को तब गिरफ्तार किया गया है जब उसके घटना में लिप्त होने के प्रथम दृष्टया पर्याप्त सुबूत पुलिस के हाथ में आ गये जिसका कोई तोड़ आशीष के पास नहीं था। किसानों की वाहवाही की हकदार भी योगी सरकार बन गई है। यू भी घटना के बाद का उसका पहला एक्शन भी किसानों के लिए भरोसे का रहा। आनन फानन उसके अधिकारियों ने राकेश टिकैत की मध्यस्थता में किसानों से हुई वार्ता में उनकी न्यायिक जांच कराने की मांग मान ली थी। मृतकों के परिजनों को 45-45 लाख का मुआवजा और परिवार के एक-एक सदस्य को नौकरी देने का ऐलान भी कर दिया था। उसका आशीष को गिरफ्तार करने का ताजा एक्शन इस क्रम की अगली कड़ी है न कि अप्रत्याशित कदम। नतीजतन संदेश यह व्याप्त हो सकता है कि केन्द्र सरकार भले ही किसान विरोधी हो पर राज्य सरकार उनकी हमदर्द है। योगी के विरोधी उप मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य का कैरियर भी इस संदेश की चपेट में आ गया है जिन्होंने यह जानते हुए भी कि किसान अजय मिश्रा के कार्यक्रम के विरोधी हैं उनके यहां जाने की जिद नहीं छोड़ी। यहां तक कि एलआईयू ने उनके कार्यक्रम से कानून व्यवस्था की स्थिति बिगड़ने का अंदेशा जाहिर किया तो भी केशव मौर्य नहीं माने।

इस व्यूह रचना में बेटा ही नहीं बाप भी अपनी खैर मानने को मजबूर दिख रहा है। अजय मिश्रा को भले ही अमित शाह ने पहले अभयदान दे दिया हो पर अब उनके लिए इस पर कायम बने रहने में बड़ी दुश्वारी नजर आ रही है। राजनीतिक सूझबूझ की कमी से ही अजय मिश्रा ने खामोशी के साथ अपने बेटे को बचाने का जतन करने की बजाय ढ़ोल नगाड़े पीटे यानी बयान बाजी की जिसमें वे झूठे साबित हो गये हैं। यहां तक कि दफा 201 की कार्रवाई का खतरा उनके ऊपर मंडरा रहा है। जाहिर है कि भाजपा का केन्द्रीय नेतृत्व इस मामले में एक सीमा से अधिक हठधर्मिता नहीं दिखा सकता और अंततोगत्वा उसे अजय मिश्रा को राजनीतिक तौर पर हलाल करना ही पड़ेगा।

K.P. Singh
Jalaun (U.P.)
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