अजय कुमार सोनी-
“लाल श्याम शाह-एक आदिवासी की कहानी…”। वरिष्ठ पत्रकार Sudeep Thakur (सुदीप ठाकुर) जी द्वारा लिखित यह किताब मैंने लगभग तीन वर्ष पूर्व मंगवाई थी लेकिन अब तक पढ़ नहीं पाया था।
शायद इसलिए कि यह किताब किसी सामान्य आदिवासी की काल्पनिक कहानी की तरह होगी। अब जब दो दिनों से पैर में मोच है, लगातार बारिश है और घर पर हूँ तो सोचा इस किताब को ही पढ़ा जाए।
शुरुआत के तीन चार पन्नों के बाद ही जरुरत महसूस हुई कि इस किताब को हाइलाइटर रख कर पढ़ना चाहिए क्यूंकि ऐसी बहुत सी बातों का ये किताब दस्तावेजी सबूत है जो आज की पीढ़ी को जानना आवश्यक है।
किताब के शुरुआत में ही ऐसी तमाम जानकारियां मिली जो मुझे पता ही नहीं थीं। और इस किताब के माध्यम से ही यह पता चला कि लाल श्याम शाह कौन थे। इस किताब से ही पता चला कि मध्यप्रदेश की राजधानी कभी नागपुर भी हुआ करता था और इस किताब से ही पता चला कि बांगलादेशी विस्थापितों को बसाने के लिए तात्कालीन नेहरू सरकार को कितने पापड़ बेलने पड़े।
किताब में लाल श्याम शाह की जिंदगी की दास्तान और मध्य भारत के उस इलाके में हो रहे समाजिक, आर्थिक और राजनीतिक घटनाक्रमों की कहानी साथ-साथ चलती है। सिर्फ मध्य भारत ही नहीं, आजादी के बाद देश में उभरती नयी-नयी समस्याओं और जटिलताओं की भी इसमें ढेर सारी सूचनाएं हैं जो आज की पीढ़ी को पढ़नी चाहिए।
पुस्तक का पहला अध्याय ‘विभाजन की त्रासदी और दंडकारण्य’ इस तरह के अनेक तथ्यों को उद्घाटित करता है। विभाजन के बाद पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) से आए शरणार्थियों/विस्थापितों को पश्चिम बंगाल ही नहीं, दिल्ली के बाद दंडकारण्य में भी बसाया गया। आज के छत्तीसगढ़, ओडिशा और मध्य प्रदेश के किन सुदूर और सघन वन क्षेत्रों में इन्हें मुश्किलों और चुनौतियों के बीच बसाया गया इसका पूरा ब्योरा आपको इस किताब में पढ़ने को मिलेगा।
फिलहाल कुछ ही पन्नों के बाद इस पोस्ट को लिखा जाना जरुरी था, इसलिए लिख दिया। प्रयास रहेगा कि पूरी किताब पढ़ने के बाद एक विस्तृत समीक्षा लिखी जाए। (हांलाकि फिर मैं अलाल हो जाता हूँ)
फिलहाल के लिए तो इतना ही कि यह किताब सभी युवाओं को पढ़नी चाहिए। वो भी हाइलाइटर के साथ और तथ्यों को संजोने के लिए एक अलग डायरी लिए हुए।



