क्या समझते हैं कि लालू के वक़्त जज मॉर्निंग वॉक पर नहीं जाया करते थे। क्या समझते हैं कि लालू फ़ैसले मैनेज नहीं कर सकते थे। दूसरे तमाम नेताओं की तरह अपने ऊपर से मुकदमे हटा नहीं सकते थे क्या? कितने ही प्रदेश के मुख्यमंत्री हैं, जिन्होंने ख़ुद पर से आपराधिक मुकदमे खुद ही खत्म कर लिए, तो क्या लालू यह नहीं कर सकते थे…

सुरेंद्र सिंह राजपूत-
उँगली नीतीश थे और शरीर लालू।कितनी आसानी से लालू को खलनायक बना दिया गया और खलनायक को नायक बनाकर पूजते रहे। पन्द्रह-बीस सालों में क्या हासिल किया बिहार ने, मीडिया ने लालू कार्यकाल को बनाया बीमारू और मीडिया ने ही नीतीश को कहा विकास पुरुष, खैर हमें नीतीश से कोई लेना देना नहीं क्योंकि ऐसे लोगों से क्या ही उलझें, आज कुछ, कल कुछ, परसो कुछ, न ज़ुबान का ठिकाना और न ही किरदार का कोई ठिकाना। कुर्सी के लिए किसी को भी पाया बना लेने वालों पर बात ही बेईमानी है।
हम आते हैं लालू यादव पर, उनके ऊपर चवन्नी छाप भी उठकर भ्रष्टाचारी का आरोप लगा देते हैं। वह भी चारा चोर कहकर खी खी खी करते हैं जिनमें राजनैतिक अक़्ल एक रत्ती से भी कम है। यह मासूम लोग हैं, इन्हें टीवी में बैठा एंकर बता देता है फलाने चोर हैं, यह चोर चोर बकने लगते हैं, टीवी का एंकर कह देता है कि फलाने महान हैं, विकास पुरुष हैं, यह उसके नाम ले लेकर लहालोट होते हैं। यह कभी भी पलट कर अपने इर्द गिर्द नही देखते हैं।
लालू के ज़माने में हुए अपराध को देखते वक़्त सूक्ष्मदर्शी इस्तेमाल करते हैं और वर्तमान सत्ता के अपराध झाँकने में अपनी मटर जैसी आँखे इस्तेमाल करते हुए पर्दा डाल देते हैं। ज़रा बिहार के अगल बगल के मुख्यमंत्रियों को भी देखें, उन्होंने अपने राज्यों में बिहार से ज़्यादा काम किया है, जबकि वह आते जाते रहे हैं। यूपी को ही ले लें, नीतीश के समकक्ष मुलायम सिंह यादव, मायावती या राजनाथ सिंह, सबने इनसे बेहतर काम कम वक्त में किया है। अखिलेश यादव के पाँच साल के काम तो नीतीश अगले पचास साल में भी नहीं कर पाएँगे। नीतीश एक ढोल थी जो सिर्फ लालू लालू लालू कह कर बज रही थी। लालू को गरियाओ और सत्ता पाओ। लालू को गले लगाओ और सत्ता पाओ, यानी सत्ता सिर्फ एक नाम से मिलती, लालू और लालू।
लालू कभी नैतिकता में नीचे नही गिरे, कभी घिनौनी राजनीति नहीं की, कभी अपशब्द नहीं बोले, बस देशज अंदाज़ में तफरीहन बातें की। गलतियाँ उतनी ही की, जितनी हमारे देश के तमाम विख्यात नेता करते रहे और काम भी उतना ही किया। आज लालू लंबी जेल की सज़ा काटकर ज़मानत पर हैं, यही प्रमाण है उनकी वैचारिक प्रतिबद्धता का और उस सत्ता के डर का जो हुक़ूमत, लालू की आंख देख सहम जाती है।
क्या समझते हैं कि लालू के वक़्त जज मॉर्निंग वॉक पर नहीं जाया करते थे। क्या समझते हैं कि लालू फ़ैसले मैनेज नहीं कर सकते थे। दूसरे तमाम नेताओं की तरह अपने ऊपर से मुकदमे हटा नहीं सकते थे क्या? कितने ही प्रदेश के मुख्यमंत्री हैं, जिन्होंने ख़ुद पर से आपराधिक मुकदमे खुद ही खत्म कर लिए, तो क्या लालू यह नहीं कर सकते थे। सब कर सकते थे मगर नहीं किया गया। सलाखों को कुबूल किया, तभी न्यायालय पर आपको भरोसा है। हमने बहुत से गुंडों को बहुत ऊंचे पद पर बैठे देखा है, आप भी देख रहे हैं, तब भी आपको लगता है कि लालू गलत थे?
एक बार लालू के सर लगे इल्ज़ाम को देखिएगा, रुपयों की गिनती कर लीजिएगा और यह भी देखिएगा उतने रुपये में आज का सत्ताधीश कितने विधायक खरीदकर चुनी हुई सरकार गिराता है।
वह बेहया लोग लालू पर सवाल उठाते हैं, जो विधायक खरीदने वाले के सामने सर झुकाया करते हैं। ईमानदार हो तो सर उठाकर उसको भी इतना ही कोसो जो लालू के सर मढ़े भ्रष्टाचार की कीमत में केवल एक या डेढ़ विधायक ही खरीद पाता, जबकि उसने बीसों को खरीदा है। सोचो कितना खर्च किया होगा। सरकारें गिराई हैं, पार्टियां तोड़ी हैं, क्या यह सब ईमानदारी से हुआ है। इन विधायक चोरों को पर्दे में छिपाकर। उन्हें ज़बरदस्ती चाणक्य का दर्जा देते हुए, ज़रा भी शर्म नहीं आती दोगले आपको।
लालू का जेल में रहना और लालू को बदनाम करना, दोनों से किसकी चुनावी दुकान चलती है। लालू जेल में हैं, यह भी उनकी ईमानदारी है। बहुत पहले लिखा था कि राहुल को इस भारत में अगर आज किसी से राजनीतिक दीक्षा लेनी चाहिए, वह सिर्फ लालू प्रसाद यादव हैं। राहुल ने तो आगे बढ़कर लालू जी को गले लगा लिया, उनके साथ देखकर तबियत खिल उठती है।
मैं खुद हमेशा ख़ुद को कोसता हूँ कि लालू को मापने में हमने इतना अगर मगर क्यों किया। क्यों लालू को जाँचने में हमने उनकी सुनी जो अपनी जुबान कहीं किसी शाखा से उधार लाए थे।
लालू जी का जन्मदिन है, हम इसका प्रायश्चित करते हैं कि हमने उस समय मुँह नहीं खोला जब खोलना चाहिए था। लालू का सलाखों में जाना हमारा खुद का क़ैद हो जाना था, एक ही तो आवाज़ थी, जो बिना तराज़ू लिए बोलती थी।
बस ख़ुशी इतनी है कि लालू जी को हमने कभी खलनायक नहीं माना। कभी उनकी लीडरशिप में खामी नहीं देखी और कभी उन्हें कमज़ोर, मजाकिया या फ़िज़ूल नहीं जाना, हमेशा यह तो माना कि वह अद्वितीय हैं।
अन्ना के झाँसे के वक़्त लालू ही एक आवाज़ थे जो संसद से सड़क तक बोल रहे थे कि यह आंदोलन सही नहीं है। लालू उस वक़्त ही नब्ज़ पकड़ चुके थे मगर सरकार मदमस्त थी लालू को ही घेरने में, उनकी आवाज़ अनसुनी की गई। संसद में लालू के वे ऐतिहासिक भाषण आज भी मौजूद हैं, जो बता रहे है कि संसद सर्वोच्च है, क्योंकि जनता ने उसे चुना है। लालू एक दौर की राजनीति का पर्याय हैं और अपने विरोधी की ऑक्सीजन हैं, बिना लालू नाम लिए, वह आज भी क्लास मॉनिटर तक का चुनाव नहीं लड़ सकते…
लालू जी को जन्मदिन की मुबारकबाद और प्रार्थना कि वह अभी मज़बूती से और रहें, क्योंकि देश को उनकी जरूरत हैं। जिन्हें लालू के आरोप, सज़ा या परिवारवाद से दिक्कत है, वह हमें उस पार्टी का नाम बताएँ जिनमें यह अवगुण न हों, कम या ज़्यादा तराज़ू लेकर वह बैठे। लालू के राज में भी कुछ बहुत गलतियां रही होंगी मगर अच्छाइयां ज़्यादा थीं। हमने यह मान लिया है कि कुछ कमियों के साथ अच्छी चीजें फेंक नहीं दी जाती हैं। लालू प्रसाद इस माटी का हमको प्रसाद है, हम उनकी इज़्ज़त करते हैं, लालू कुछ भी हों, धोखेबाज़, चालबाज़, मक्कार नहीं हो सकते और लाशों पर राजनीति नहीं करते, बस इतना काफी है, उनके प्रति प्रेम के लिए, हाँ हम लालू से प्रेम करने लगे हैं…
जन्मदिन मुबारक, ईश्वर आपकी सफलता, समझ, अंदाज़ और सरलता आपके नीचे तक भी पहुँचाए और आपको स्वस्थ्य रखे। तेजस्वी आपका हमें उपहार है और वैचारिक प्रतिबद्धता आपका दिखाया रास्ता है, यह दोनों हमेशा बने रहें, आपको बहुत बहुत शुभकामनाएं…




Raghavendra
June 13, 2025 at 1:28 pm
Anakh rahte anhar aur Inko ayag bhi kaya eak aisa party sa Juda hai jisma na koi na leadership hai na koi mandarin ya syad bihar chunav mai jyada seat lena lena cha raha ho
Raghavendra