बात कुछ अजीब सी है, लेकिन यह सौ फीसदी सच है। करोड़ों के साम्राज्य वाले लोकमत मीडिया ग्रुप के नागपुर ऑफिस में आजकल ऐसे ही हालात बने हुए है। लोकमत मराठी, लोकमत टाइम्स अंग्रेजी और लोकमत समाचार अपने लगभग तीन सौ संपादकीय कर्मचारियों को दोपहर की एक चाय की सुविधा प्रदान करता है, लेकिन बेहद असम्मानजनक तरीके से।
कैंटीन का कर्मचारी दोपहर के लगभग चार बजे संपादकीय विभाग में चाय लेकर आता है। फिर चाय लेने के लिए संपादकीय कर्मचारियों को कतार में लगाना होता है। इस दौरान संपादकीय कर्मचारी न केवल अपमानित महसूस करते है, बल्कि कैंटीन कर्मी की झिड़की भी सुनने को मजबूर होते है। अब कैंटीन कर्मी ने एक नया फरमान जारी किया है कि जिसे चाय पीना है, वे अपना-अपना कप भी साथ लेकर आए।
महत्वपूर्ण बात यह है कि तीनों अखबारों के संपादकों और कुछ वरिष्ठ लोगों को उनके टेबल या डेस्क पर चाय सर्व की जाती है, बाकी संपादकीय कर्मचारी तो गरीब की गाय है। उन्हें काम के दौरान डेस्क पर चाय उपलब्ध कराना तो दूर की बात, उन्हें न तो प्रबंधन सम्मान देना चाहता है, न ही डेस्क पर उनकी सीट पर चाय सर्व करना चाहता है। उन्हें तो कतार में लग कर ही चाय मिलेगी, वर्ना चाय पीनी हो तो पियो या भाड़ जाओ का रवैया प्रबंधन का है।
अब सवाल उठता है कि पत्रकारिता दिवस पर सिर्फ एक गुलदस्ता भेंट कर फोटो खिंचवाने वाला मानव संसाधन विभाग क्या कर रहा है? जवाब है कि समूचे मानव संसाधन विभाग के अफसरों समेत कर्मचारियों का ध्यान समस्याओं को हल करने से ज्यादा पार्किंग में खड़े दोपहिया वाहनों की फोटो खींचकर इनहाउस वॉट्सएप ग्रुप पर पोस्ट कर हिदायत देने पर ज्यादा है। इसके अलावा परिसर में स्थित आम के पेड़ से गिर रहे आम कौन-कौन उठा रहा है? यही देखना रह गया है।
बहरहाल, चाय की बात करते है कि लोकमत ग्रुप अपने सम्माननीय पत्रकारों को एक अदद सम्मान की चाय उन्हें उनके वर्क स्पेस पर नहीं पिला सकता क्या? जबकि ऑफिस में इतने चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी भी है, जो काम के घंटों के दौरान मोबाइल पर रील देखते नजर आते है, उनके जरिए भी सभी संपादकीय डेस्क पर कर्मचारियों में चाय वितरण की व्यवस्था की जा सकती है, लेकिन प्रबंधन यह इच्छाशक्ति भी नहीं दिखाना चाहता। संपादक भी पहल नहीं करना चाहते, क्योंकि उनका रवैया तो मेरा काम बनता….वाला है।
भड़ास को एक कर्मचारी द्वारा भेजे गए इनपुट पर आधारित
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हद्द है। कैंटीन से चायवाला आता है और सब इंतज़ार में रहते हैं। अब इसमें लाइन की क्या बात हो गई… प्लास्टिक और कागज के कप बंद कर दिए हैं कैंसर की आशंका की खबर के बाद। अब ये भी कोई विषय है अफवाह का। लोगों ने कहा कि डिस्पोजेबल बंद होना चाहिए… बंद किया तो नए सवाल। नॉन इश्यू है।



