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मजीठिया मजीठिया मजीठिया, कान पक गया सुन-सुनकर

समाचार पत्र या पत्रिकाओं में काम करनेवाले कर्मचारियों के लिए सबसे जरुरी है उनका तनावमुक्त होकर काम करना। लेकिन ससुरा जबसे इ मजीठिया का लफड़ा लगा है, अखबारी लोगों की मानसिक शांति ऐसे गायब हो गयी है, जैसे मोदीजी के बदन से उ दस लाख वाला सूट। कर्मचारी दफ्तर इस उम्मीद से आता है कि आज तो मजीठिया के बारे में पता लगा ही लेंगे… और इस बात से मायूस होकर घर लौट जाते हैं कि आज तो भड़ास और जनसत्ता पर भी मजीठिया को लेकर कुछ अपडेट नहीं हुआ..। किसी के पास थोड़ी भी जानकारी होती है, जो बाकी लोग उसके आगे-पीछे डोलने लगते हैं। सुबह ऑफिस में हाजिरी के लिए पंच करने से लेकर दोपहर लंच करने तक और शाम को दो रुपये वाली मंच खाते हुए घर निकलने तक मजीठिया मजीठिया मजीठिया इतनी बार सुन लेता हूँ कि कान पक जाता है।

समाचार पत्र या पत्रिकाओं में काम करनेवाले कर्मचारियों के लिए सबसे जरुरी है उनका तनावमुक्त होकर काम करना। लेकिन ससुरा जबसे इ मजीठिया का लफड़ा लगा है, अखबारी लोगों की मानसिक शांति ऐसे गायब हो गयी है, जैसे मोदीजी के बदन से उ दस लाख वाला सूट। कर्मचारी दफ्तर इस उम्मीद से आता है कि आज तो मजीठिया के बारे में पता लगा ही लेंगे… और इस बात से मायूस होकर घर लौट जाते हैं कि आज तो भड़ास और जनसत्ता पर भी मजीठिया को लेकर कुछ अपडेट नहीं हुआ..। किसी के पास थोड़ी भी जानकारी होती है, जो बाकी लोग उसके आगे-पीछे डोलने लगते हैं। सुबह ऑफिस में हाजिरी के लिए पंच करने से लेकर दोपहर लंच करने तक और शाम को दो रुपये वाली मंच खाते हुए घर निकलने तक मजीठिया मजीठिया मजीठिया इतनी बार सुन लेता हूँ कि कान पक जाता है।

हर अखबारी दफ्तर का दूसरा आदमी, आठ घंटे में न्यूनतम पांच बार यही पता लगाने की कोशिश करता है कि मजीठिया का क्या हुआ ?? या कहें की आधा समय इसी विषय पर शोध करने में खपा देता है कि मजीठिया मिलेगा या नहीं..? पाहिले एरियर मिलेगा कि सैलरिया डबल होगा..? दफ्तर में अफवाहों के बाजार में अब चीजें इतनी सस्ती हैं, कि हर कोई कहीं से भी बोरा भर के सूचनाएँ उठा लाता है। कोई कहेगा – कंपनी ने सब तैयारी कर ली है, बस कुछ ही दिन में खाते में एरियर का पैसा गिरेगा और सैलरी सीधे डबल.. यकीन मानिये ऐसी बातें सुनते ही सीना छप्पन इंच का हो जाता है और मन ताजमहल खरीदने का सपना देखने लगता है। फिर कोई दूसरा आकर कहेगा – भूल जाइये मजीठिया-वजीठिया। कंपनी में एक से एक होशियार बैठे हैं। ठेंगा नहीं मिलनेवाला है। ऐसे वाक्यों को सुन कर ताजमहल खरीदना का सपना चकनाचूर होकर पाउडर बन जाता है। मन करता है तपाक से कह दूँ – बुरे शब्द कहनेवाला.. तेरा मुंह काला।

फलाने और चिलाने से मिलनेवाली सूचनाओं की तो बात ही मत कीजिये। ये होगा.. वो होगा.. दिस.. दैट.. वगैरह-वगैरह। कोई ताजा पे-स्लिप देखकर दुखी है, तो कोई इस बात से कि पिछला तीन महीना वाला बासी पे-स्लिप काहे नहीं मिला है अब तक। आलम यह है कि चपरासी तक अपने अपने एरियर की राशि का हिसाब-किताब कर चुके हैं। साथी-संगियों में जो सबसे ज्यादा सवाल पूछा जाता है, वो यही कि मजीठिया का कुछ खबर..?? असल में यह सवाल सही आदमी तक पहुँच ही नहीं रहा है। अपने अनुसार तो सीधे सम्बंधित विभाग में जाइये और डायरेक्ट पूछिये कि सर, फलाना और चिलाना से हमको ये सूचना मिली है.. हम ढिमकाना से कंफर्म करें, इससे बढियां आप ही बता दीजिये का होगा, का नहीं..?? वैसे इस सवाल का सही और सटीक जवाब मेरे अनुसार दो और लोग दे सकते हैं। एक उन निडर, वीर और बहादुरों की टोली, जिन्होंने कोर्ट-कचहरी-वकील करके कंपनी की नाक में दम कर दिया है। और दूसरे वो लोग, जो अपने नाजुक कंधे पर कंपनी का भारी-भरकम बोझ, हमारे दाना-पानी के लिए उठाये हुए हैं.. क्योंकि हम जैसे घर-परिवार से लाचार, अखबार के लोग इस उम्मीद पर चादर तान के सोये हुए हैं कि – होइ हे सोई जो राम रूचि रखा (अल्टीमेटली होना वही है जो उनको मंजूर है, फिर हम चिंता कहे करें..)

– इति श्री रेवा खंडे मजीठिया कथायम प्रथमों अध्याय समाप्त.. (एक बार शंख बज गया)

नोट – सात अध्याय के बाद आरती होगा। सब चेंज पैसा लेकर आइयेगा.. तब परसादी मिलेगा

अंकिता तलेजा के एफबी वॉल से

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