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उत्तर प्रदेश

मंत्री, प्रवक्‍ता और इंजीनियर की ईमानदारी, माल सबमें बराबर बंटा!

अनिल कुमार-

बेईमानी हम जैसे लोगों की रग रग में बसा होता है. मैं तो खुद भी एक नंबर का बेईमान हूं. बराबर बांटने में कभी भरोसा नहीं करता. पर, नेता, मंत्री, अधिकारी, इंजीनियर आज के समय में भी बेहद ईमानदार हैं, और बंटवारा भी बराबर-बराबर करने में भरोसा करते हैं. नेता, मंत्री, अधिकारी, इंजीनियर आज के समय में अमीर और ताकतवर इसी वजह से हैं कि वो बराबर-बराबर बांटने में भरोसा करते हैं. बेईमानी के काम में भी पूरी ईमानदारी बरतते हैं, जबकि मेरे जैसे लोग ईमानदारी के काम में भी बेईमानी कर लेते हैं, बराबर बांटने में भरोसा नहीं करते, इसलिये आज भी गरीब के गरीब ही रह गये हैं. जबकि बराबर बंटवारा करने वाले नेता-मंत्री-इंजीनियर-अधिकारी ही नहीं, पत्रकार भी कोठी-वोठी बनवा लेते हैं. सांसद-विधायक बन जाते हैं.

जैसा कि आपको पता ही होगा कि यूट्यूब चैनल के बाद ट्रांसफर और पोस्टिंग ही ऐसा उद्योग है, जिसमें काम करने के लिये बड़ा पूंजी निवेश नहीं करना पड़ता है और आमदनी भी मोटा शुरू हो जाता है. हमारे भ्रष्‍ट सूत्र ने बताया कि एक विभाग के इंजीनियर साहब गुप्‍त तरीके से अपना तबादला मोटा माल पैदा कर सकने वाली एक कुर्सी पर कराना चाहते थे. जुगाड़ खोज-खोज के परेशान हो गये थे. इसी बीच उनसे एक पार्टी के प्रवक्‍ता टकरा गये. चूंकि उनका पत्रकारों को डील करने का काम था, लिहाजा उनने पत्रकारों की तरह ही लंबा फेंका कि बायें हाथ का खेल है, करा देंगे ट्रांसफर, लेकिन डेढ़ खोखा लगेगा. इंजीनियर साहब मान गये. साहब को लगा कि इतने बड़े और भारी भरकम नेता कह रहे हैं तो फिर करा ही डालेंगे.

इंजीनियर साहब को लगा कि अब कोई ‘बाप का पीला’ भी उनका ट्रांसफर होने से रोक नहीं पायेगा. उनने बिना खेत बेचे, थूक लगाकर गिन डाले डेढ़ करोड़. बोले तो डेढ़ खोखा. वैसे, डेढ़ करोड़ नगद का वजन कित्‍ता होता है, हमको नहीं मालूम. खैर, प्रवक्‍ता महोदय पुण्‍य कमाकर परलोक सुधारने के लिये तो ट्रांसफर की जिम्‍मेदारी ली नहीं थी, बल्कि खुद का इहलोक सुधर जाये इस कारण से तबादला उद्योग में उतरे थे. लिहाजा उनने आधा खोखा अपने खोते में खोंस लिया. बाकी का एक खोखा गुप्‍त तरीके से मंत्रीजी को पकड़ा दिया. मंत्रीजी ने आश्‍वस्‍त किया कि किसी भी अवस्‍था में यह काम हो जायेगा. प्रवक्‍ता महोदय खुशी खुशी घर लौट आये कि काम भी हो जायेगा, और बिना कुछ खास मेहनत के अंटी भी टाइट हो गई. इससे चोखा काम क्‍या ही होगा भला?

हमारे बहुत ही परम भ्रष्‍ट सूत्र बताते हैं कि जिन साहब को ट्रांसफर करना था, उनके हाथ कुछ नहीं लगा था. खाली हाथ ठनठन गोपाल थे. अब तबादला हो और हाथ भी खाली रह जाये तो क्‍या वह आईएएस अधिकारी ऋत्विक रोशन का गाना, ‘’खाली हाथ आये हैं, खाली हाथ जायेंगे’’ गाने के लिये बने थे? नहीं ना? लिहाजा, मंत्री जी के कहे के बाद भी तबादला नहीं हुआ. वैसे भी, सही जगह तबादले के अलिखित संविधान में यह बताया गया है कि बकरा कटेगा तो सबमें बंटेगा. यहां तो बकरा दो ही लोग बांट रहे थे, जिसे मटन बनाना था, उसके हाथ एक भी बोटी नहीं लगी थी. लिहाजा बताते हैं कि साहब ने चूल्‍हा पर ही शूशू कर दिया कि ना रहेगी आग ना पकेगा मटन. देहाती में हमलोग कहते हैं कि ना खेलब ना खेले देब, खेलवे बिगाड़ब. साहब ने भी ठीक यही किया.

इधर, बेचारे इंजीनियर साहब सपने बुनते रहे कि आसामी कुर्सी पर तबादला हो जायेगा तो एक कोठी मनाली में लेंगे, दूसरी गंगटोक में. तीसरी कोठी को लेकर थोड़ा कन्‍फ्यूज थे कि इंग्‍लैंड में लें या स्विटजरलैंड में? इधर, दिन, हप्‍ता, पखवाड़ा, महीने, दो महीने गुजरते रहे, इंजीनियर साहब जहां के तहां ही रहे. तबादला सीजन भी निकल गया. गाड़ी आगे ही नहीं बढ़ी. इंजीनियर साहब को लगने लगा कि उन्‍होंने गलत जमीन पर डिजाइन बनाने में पैसा खर्च कर दिया है. उनने अब प्रवक्‍ता महोदय से कहा कि जनाब हमें तबादला नहीं कराना, हमारा पैसा वापस करिये. प्रवक्‍ता साहब भी दबाव में आ गये कि भोले बाबा की सवारी बनकर मंत्री जी ने तो गजब का गच्‍चा दे दिया. उनने मंत्री जी से एक खोखा वापस मांगने का अभियान शुरू किया.

हमारे चिरकुट सूत्र बताते हैं कि मंत्रीजी से पैसा वापस मांगना मतलब सांड़ का दूध दूहने से भी ज्‍यादा मुश्किल काम माना जाता है. उनका सिद्धांत है, ‘’जिनका लेना कभी ना देना, क्‍या फिर जग में आना है.’’ जब प्रवक्‍ता महोदय दुखी हो गये तो अपने एक साथी को दुख बताया. साथी प्रवक्‍ता ने कहा कि वह सांड़ दूहेंगे, लेकिन उसके लिये फीस लगेगी. बताते हैं कि फिर बंटवारा हुआ. सांड़ दूहे जाने की कोशिश लगातार जारी रही, लेकिन एक भी रुपया वापस नहीं हुआ. दोनों प्रवक्‍ता थक हार गये, लेकिन सांड़ से एक बूंद दूध नहीं निकाल पाये. इन लोगों ने इंजीनियर साहब को सारी बात बताई कि सांड़ साहब पूरा चारा खा गये हैं और बदले में दूध भी नहीं दे रहे हैं. यहां तक कि गोबर भी नहीं कर रहे हैं कि गोइठा पाथ पूथ कर कुछ रकम जुटाया जाये.

मेरे पालतू सूत्र बताते हैं कि मेहनत और खून-पसीने की कमाई डूबने से दुखी इंजीनियर साहब खुद ही मंत्रीजी के पास पहुंच गये. उनकी कोठियों की उम्‍मीद तो टूटी ही, लोगों का खून-पसीना चूसकर जुटाई गई रकम भी हाथ से जाती रही. उनने मंत्रीजी को अपना दुखड़ा सुनाया, मंत्रीजी चौक गये कि हमसे भी बेईमानी. इंजीनियर साहब से लिया डेढ़ खोखा, दिया केवल एक खोखा. मंत्री का ईमानदारी पर से ही भरोसा उठ गया, पर इंजीनियर साहब का दुखी शक्‍ल देखकर उन्‍हें दया आ गई. बताते हैं कि उन्‍होंने आधा खोखा इंजीनियर साहब को वापस कर दिया. साथ ही कहा कि आधा खोखा प्रवक्‍ता महोदय से वापस ले लेना. इंजीनियर साहब खुश तो हुए कि चलो उनने किसी तरह सांड़ से एक बूंद तो दूध लिया है, दो बूंद भी किसी तरह दूध लेंगे.

अब खबर यह है कि तीनों पार्टी यानी इंजीनियर साहब, प्रवक्‍ता महोदय और मंत्रीजी के पास आधा-आधा खोखा हो गया है. जिसको भी यह खबर पता चली, इन लोगों की ईमानदारी की मिसाल दे रहा है कि तीनों पार्टी ने आपस में बराबर बराबर बांट लिया है, ना तो किसी को एक रुपया ज्‍यादा मिला है, और ना ही किसी को एक रुपया कम. खबर है कि अब अन्‍य प्रवक्‍ता भी तमाम विभागों में इसी तरह का इंजीनियर तलाश रहे हैं. हालांकि हमारे परम चिरकुट सूत्र बताते हैं कि इंजीनियर के तबादला की जगह पार्टी के ही मीडिया विभाग के एक सज्‍जन तो एक हिस्‍ट्रीशीटर को छुड़ाने के लिये पांच लाख की डील कर ली थी, लेकिन एसपी ने सारे अरमानों पर पानी फेर दिया. इस हिस्‍ट्रीशीटर वाली कहानी को अगले एपिसोड में कहेंगे. हालांकि खबर है कि इस कहानी के बाद प्रवक्‍ताओं में एकता बढ़ गई है. अब वह आपस में मिलकर रहेंगे.

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