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सुख-दुख

मीडिया कंपनियों को सीनियर्स को शालीनता से ‘गुडबॉय’ करने का तरीका अभी नहीं आया है!

पंकज शुक्ला-

मीडिया में काम करने वाले बहनों और भाइयों, दुनिया बहुत मतलबी है। अपना दिल मज़बूत रखिए। जिस कंपनी के लिए आप रात-दिन एक किए हैं। घर में मातम हो, खुशी हो, आपको कंपनी की पड़ी रहती है। वही कंपनी आपको अपना मतलब पूरा होते ही या आपकी सैलरी लाखों में होते ही किसी दिन दूध में मक्खी की तरह निकाल फेंकेगी।

बिना किसी चेतावनी के, बिना किसी एम्पैथी के। पिछले साल अरुण को झटका लगा। इस साल विभा की बारी आ गई। दोनों काम में ख़ुद को झोंक देने वाले लोग रहे। दिन को दिन नहीं समझा। रात को रात नहीं।

कंपनी ने शायद बस इतना समझा होगा कि अब इनकी जगह इतने पैसे में तो चार नए लोग रखे जा सकते हैं। और, किसी दिन फाइनेंस और एचआर मिल बैठे। कंपनी के किसी डायरेक्टर को उनके सालों की साधना नहीं दिखी होगी और फरमान हो गया निकासी का।

भारतीय कंपनियों, ख़ासतौर से मीडिया कंपनियों को, सीनियर्स को शालीनता से ‘गुडबॉय’ करने का तरीका अभी नहीं आया है। कोई 20 साल पहले इसके लिए लांछन लगा देना। अच्छे भले काम में खोट निकालने लगना। सार्वजनिक बैठकों में बुलाना बंद कर देना। जानबूझकर इग्नोर करना शुरू हुआ।

ऐसे हथकंडे आज भी अपनाए जा रहे हैं। कर्मचारी पलटकर हाईकोर्ट जाने की बात कहने लगे तो अब लांछनों में कमी आ रही है। अब बेइज़्ज़ती नया हथियार है।

मीटिंग के लिए घंटों इंतज़ार कराना या दफ़्तर में गप्पें मारकर निकलने के बाद सीनियर कर्मचारी को बैठक के लिए एयरपोर्ट के डिपार्चर पर बुलाकर बेइज़्ज़त करना, उसके कंपनी के लिए किए गए योगदान की एक बार भी प्रशंसा न करना, बात बात पर इतना बेइज़्ज़त करना कि बंदा ख़ुद ही कंपनी छोड़ जाए, ये सारे कंपनियों के नए टोटके हैं। और, इन टोटकों ने ही सीनियर्स की जान लेनी शुरू कर दी है।

कंपनियां ये नहीं सोचती कि जिस शख़्स ने अपने जीवन के 20-25 साल एक ही कंपनी को दे दिए, दूसरी कंपनी के बारे में सोचा तक नहीं, उससे विदा लेनी है, तो उसकी योजना बना लो। बंदे को बुलाकर बात कर लो। स्पष्ट ऑप्शन दिए जा सकते हैं कि आपकी सैलरी अब जितनी हो चुकी है, कंपनी उतना अफोर्ड नहीं कर सकती, क्या आप अपनी सैलरी 30-40 फ़ीसदी कम कर सकते हैं?

या कि उसे एक स्पष्ट समयसीमा दे दी जाए कि अगले छह महीने या एक साल में हम आपका फेयरवेल करना चाहेंगे, आप अपना उत्तराधिकारी तब तक कंपनी में तैयार कर लें और अपने निजी जीवन का भी उसी अनुसार बंदोबस्त शुरू कर दें।

मीडिया कंपनियां नहीं चल रही हैं, अपने कर्मों से। फिक्की के सेमिनार में अरुण पुरी ने जो कुछ कहा, वह अभी ताज़ा ही है। जिस एंकर के पर्सनल पोर्टल पर डाले गए वीडियो पर लाखों व्यूज़ आते हैं, उसे चैनल के पोर्टल पर उंगलियों पर गिने जा सकने वाले व्यूज़ मिल रहे हैं। वहीं टेक्स्ट में है। नॉस्ताल्जिया न्यूज़ वेबसाइट पर पढ़ने लोग नहीं आ रहे। निजी पेजों पर व्यूज़ डॉलर बरसा रहे हैं।

तो दिक्कत कहां है? मुनाफ़ा क्यों कम हो रहा है, मीडिया कंपनियों का? क्यों लोग पत्रकारों को पसंद कर रहे हैं और कंपनियों को नापसंद? क्यों विज्ञापन देने वालों का मीडिया पर से भरोसा उठ रहा है और क्यों मीडिया कंपनियों को ख़बरें और अवॉर्ड बेचकर पैसे जुटाने पड़ रहे हैं?

हर अखबार अपने स्थापना दिवस पर अपन पहला संपादकीय शान से पाठकों को पढ़ाता है, लेकिन क्या प्रबंधन की मौजूदा पीढ़ी भी, उसे कभी दिल से पढ़ती है? सारा गुणाभाग बस यहीं अटका है और कर्मचारियों पर प्रबंधन की ‘कृपा’ भी! समस्या हर आत्मसम्मानी पत्रकार के लिए सबसे बड़ी यही है कि वह ‘कृपा’ पर जीना नहीं चाहता, तो बचा क्या..! चलो दिलदार चलो, चांद के पार चलो.., जै जै..!

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