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उत्तराखंड

स्वतंत्र पत्रकार मेघा प्रकाश और उनकी ‘डाउन टू अर्थ’ पत्रकारिता : डेथ ऑफ़ ‘देहरा’!

अमरेंद्र किशोर-

15 सितम्बर की रात फेसबुक पर एक पोस्ट उभरा, जिसका हिंदी अनुवाद है, “आसमान आज रात गरज रहा है। तेज़ गड़गड़ाहट के साथ बिजली चमकी। कुछ मिनटों तक यह गर्जना महसूस हुई, और फिर कुछ ही देर बाद फिर से वही हुआ। अफ़सोस, मैं इसे रिकॉर्ड नहीं कर सकी! बालकनी में खड़ी होकर देखती हूँ तो आकाश भयावह लगता है। चमगादड़ें हवा में फड़फड़ाती दिख रही हैं। और अब बारिश शुरू हो चुकी है। कल भी लगभग इसी समय मूसलाधार वर्षा हुई थी।’

पोस्ट में आगे लिखा गया था कि ‘अब यह घाटी उतनी निद्रालीन नहीं रही, पर मेरी कामना है कि इस घड़ी सो रहे सभी लोग शांति और सुरक्षित नींद पाएँ।’

पोस्ट की लेखिका हैं मेघा प्रकाश (Megha Prakash) जो देहरादून की एक द्विभाषी स्वतन्त्र पत्रकार हैं। बेहद उत्साही और दूरदर्शी हैं, वह इस वजह से क्योंकि उत्तराखण्ड में निरंतर कई सालों से कुदरत आपदा होने के पहले मेघा भविष्यवाणी करती रही हैं कि अमुक जगह ज़लज़ला की आशंका हैं।

मेघा से मेरा जुड़ाव इसी विकास पत्रकारिता की वजह से है, एक युवा की इस हद की प्रतिबद्धता का परिणाम है पर्यावरणीय हितों और सरोकार से जुड़े उनके सैकड़ों लेख, उनकी रिपोर्ट और टिप्पणियां, हिंदी और अंग्रेजी में। हिमालय की बेकद्री और नदियों की फजीहत करने वाली सरकार की परियोजनाओं पर मेघा की कड़ी नजर होती है। वह खुलकर इन बातों का विरोध करती हैं, बेलाग लिखती हैं, बेलौस बोलती हैं।

हिमालय और गंगा जैसी कई नदियों को लेकर सक्रिय हेमंत और मल्लिका भनोत से मैं मिल चुका हूँ, दोनों पर्यावरण एक्टिविस्ट हैं। दोनों का इंटरव्यू भी किया है। आदरणीय सुंदरलाल बहुगुणा, चंडी प्रसाद भट्ट से लेकर अनिल जोशी से साक्षात्कार के दौरान उन सभी की चिंताएं तो दिखती हैं किंतु मेघा की बातें डराती हैं।

गत 16 तारीख की देर रात डाले गए पोस्ट को लेकर उन्हें तत्काल फोन करना ठीक नहीं लगा। फिर अगले दिन उन्होंने लिखा, ‘प्रकृति चेतावनी देती है, संकेत देती है। मैंने इसका आभास एक दिन पहले ही कर लिया था। आज सुबह आँख खुलते ही खबर मिली कि देहरादून के सहस्त्रधारा क्षेत्र (कारलीगाड़) में बादल फटने जैसी घटना हुई है। बारिश अब भी मूसलाधार जारी है।’

‘दून की नदियाँ जाम और बंधी हुई हैं। शहर की तटीय प्रणाली अपने आप ही सफाई अभियान में जुटी है। सोंग ने देहरादून से मालदेवता को जोड़ने वाली मुख्य सड़क का लगभग 100 मीटर हिस्सा बहा दिया है। बिंदाल, रिस्पना, टोंस और अन्य नदियाँ उफान पर हैं, प्रचंड रूप में। झाखन नदी पुल के ऊपर से बह रही है।’ उन्होंने लिखा।

यह करारा व्यंग्य था कि ‘यह घटना नदियों की गरिमा लौटा देगी—जहाँ उन्हें सरकारी अभिलेखों में “बरसाती नाला” कहा जाता रहा, वहीं अब वे मीडिया सुर्खियों में “नदियाँ” कहलाएँगी। विडंबना यह है कि जब लोगों से पूछा गया तो वे इन जलधाराओं के नाम तक नहीं जानते थे, जबकि उन्हीं पर बैठे थे! अब जानेंगे!!’

पिछले कई सालों से डाउन टू अर्थ down to earth में मेघा के लिखे रिपोर्ट्स पढ़ता रहा हूँ। उनकी भाषा में तल्खी नहीं लेकिन सच लिखने की उनकी जिद्द भी है, यह मुमकिन तभी होता है जब पत्रकार ज़मीनी रिपोर्ट जुटाए।

मेघा की रिपोर्ट महज ख़बर नहीं होती बल्कि इसे FIR कहें तो अतिशयता नहीं। एक बानगी, इस रिपोर्ट के जरिये, ‘एनएचएआई की महत्वकांक्षी परियोजना दिल्ली-देहरादून एक्सप्रेसवे के हाल पर चिंता और सवाल दोनों उठते हैं? इस हफ्ते हुई बारिश की वजह से मोहंड राव नदी पर खड़े पिलर मलबे में धंस गये हैं। कुछ पिलर के बेस पानी के तेज बहाव की चपेट में आ चुके हैं। निर्माणाधीन परियोजना के बारिश में इस हाल को देखकर पर्यावरणविदों की चिंताएं सही साबित होती नज़र आ रही हैं। रीनू पॉल जी ने इस मुद्दे पर जनहित याचिका भी दायर की थी।

क्या यह परियोजना चारधाम सड़क परियोजना की तरह आपदा को निमंत्रण तो नहीं? नदियों से छेड़छाड़ और इनके ईदगिर्द हो रहे निर्माण कार्यों से हुई क्षति अभी हालही में हिमालयी राज्य हिमाचल प्रदेश में भी देखने को मिली।’

तसल्ली रखिये, मेघा अर्बन नक्सली नहीं है, हिमालय की बेटी है, जिस गोद मे पली बढ़ी है, उसी गोद का मान रखने, उसकी हिफ़ाजत की उसे चिंता है।

हिमालय की बड़ी, मध्यम, छोटी और सूक्ष्म जलधाराओं को लेकर सचेत मेघा भविष्य में कुछ हौलनाक सच सामने रखेगी, लगता है। हिमालय में और है क्या? जलधाराओं के चलते वह औषधिप्रस्थ है, और देवभूमि भी।

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