अमित चतुर्वेदी-
राजदीप सरदेसाई ने एक सनसनीखेज खुलासा किया है। राजदीप को कैंसर हो गया था और उनकी सर्जरी हुई, और उसके बाद मोदी जी को जब इसका पता चला तो मोदी जी ने राजदीप सरदेसाई को फ़ोन करके न केवल उनका हालचाल लिया बल्कि राजदीप को हेल्थ टिप्स भी दिए।
ये राजनैतिक शिष्टाचार की पराकाष्ठा है, क्यूंकि राजदीप सरदेसाई के ऊपर मोदी विरोधी पत्रकार का ठप्पा लगा हुआ है। और ऐसे में प्रधानमंत्री का उन्हें ख़ुद फ़ोन करना और आधे घंटे तक बात करना, ये अपने आप में अभूतपूर्व है।
हालांकि राजदीप सरदेसाई के मोदी जी से बहुत पुराने संबंध हैं, ये सबंध उस ज़माने के हैं जब मोदी जी आडवाणी जी की रथ यात्रा के सारथी हुआ करते थे और आडवाणी जी के रथ पर उनके साये की तरह सवार रहा करते थे, राजदीप ने उस समय यानी 1990 में उनकी रथयात्रा कवर की थी।
राजदीप सरदेसाई और मोदी जी उसके बाद अच्छे दोस्त की हैसियत से कई वर्षों रहे लेकिन 2002 के दंगों के बाद राजदीप सरदेसाई की रिपोर्टिंग के बाद उनके सबंधों में खटास आने लगी।
बाद में चुनाव की रैली कवर करने के समय मोदी जी के रथ में सवार राजदीप सरदेसाई को मोदी जी के पैरों के पास बैठना पड़ा और उसके बाद से उनकी कभी बात भी नहीं हुई। लेकिन राजदीप के बीमार होने की खबर मिलने के बाद मोदी जी का उन्हें फ़ोन करना और उनकी सेहत के लिए इतना फ़िक्रमंद होना ये बताता है कि प्रधानमंत्री न केवल बेहद informed रहते हैं बल्कि राजनैतिक द्वेष और कड़वाहट के ऊपर मानवता को ज़्यादा तरजीह देते हैं।
खैर जो भी हो, ये बात अपने आप में इतनी बड़ी है कि न केवल राजदीप सरदेसाई और उनका परिवार, बल्कि जो भी इस बात को जानेगा वो प्रधानमंत्री का मुरीद हुए बिना नहीं रह पाएगा।
मनोज मलयानिल-
हाल ही में सोशल मीडिया के ज़रिए यह जानकारी सामने आई कि वरिष्ठ पत्रकार राजदीप सरदेसाई कैंसर से जूझ रहे थे, लेकिन महीनों चले उपचार के बाद अब पूरी तरह स्वस्थ हो चुके हैं। यह बात किसी और ने नहीं, बल्कि खुद राजदीप ने सार्वजनिक तौर पर साझा की थी।
यह जानने के बाद स्वाभाविक ही मन में खयाल आया कि शायद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को उनकी कुशलक्षेम पूछनी चाहिए थी, आख़िरकार एक दौर था जब दोनों के बीच संवाद, मतभेदों के बावजूद, सहजता से होता था।
लेकिन आज सोशल मीडिया पर एक पत्रकार से बातचीत में राजदीप ने खुद यह बताया कि प्रधानमंत्री मोदी ने न सिर्फ़ उन्हें फ़ोन किया, बल्कि करीब आधे घंटे तक विस्तार से बातचीत की।
राजनीतिक और वैचारिक मतभेदों से परे किसी कठिन समय में इस तरह का मानवीय व्यवहार यह याद दिलाता है कि लोकतंत्र केवल विचारों की लड़ाई नहीं, बल्कि संवेदनशीलता और मानवीयता का भी आधार है। आलोचना और असहमति के बावजूद संवाद और करुणा कभी अप्रासंगिक नहीं होते।
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