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साहित्य

कवि बाबा नागार्जुन ने साथ चल रही लड़की की तरफ छड़ी उठाकर कहा- “ये चुड़ैल लग रही है!”

नागार्जुन के अधिकांश काव्य का बाल यौन उत्पीड़न की उनकी तथाकथित भयावह विकृति से कोई सीधा या परोक्ष सम्बन्ध स्थापित नहीं होता!

पंकज चतुर्वेदी-

नागार्जुन प्रसंग… नागार्जुन को मैंने अपने जीवन में सिर्फ़ तीन बार देखा। पहली बार जेएनयू की एक सड़क पर शायद 1992 से 93 के बीच, जब वह कावेरी छात्रावास के सामने से मेरे गुरु एवं कवि केदारनाथ सिंह के घर जा रहे थे, जो उसके लगभग बग़ल में था। उनका जन्म 1911 में हुआ था और निधन 5 नवम्बर, 1998 को। ज़ाहिर है कि 1992 के आसपास उनकी उम्र 80 वर्ष के ऊपर थी। उस समय उनके रूप में मैंने छड़ी टेककर चल रहे एक अत्यन्त बूढ़े, कमज़ोर और काँपते हुए व्यक्ति को देखा, जो एक ओर एक छात्रा और दूसरी ओर एक शोध-अध्येता का सहारा लेकर चल पा रहे थे और सुनने में भी असमर्थ हो गए थे। बहुत ज़ोर से चिल्लाकर कुछ कहो, तो ही सुन पाते थे।

मैंने उन्हें पहचानकर नमस्कार किया, क्योंकि किशोरावस्था से उनकी फ़ोटो देखता आ रहा था और उनकी कविताओं का बहुत गहरा प्रभाव मुझ पर पड़ा था, उनका प्रशंसक था; लेकिन मैंने उनसे कुछ कहने की कोशिश नहीं की और न ही यह चाहा कि वह मुझे जान जाएँ। आख़िर मैं था ही क्या कि नागार्जुन को अपना परिचय देता!

ख़ैर…उस मुलाक़ात की एक ही बात याद है। दैहिक जर्जरता के बावजूद उनकी आँखों में जीवन्तता थी और चेहरे पर हँसी और शरारत। साथ चल रही छात्रा की ओर छड़ी से इशारा करके दूसरी ओर चल रहे शोध-अध्येता से उन्होंने पूछा : “ये कैसी लग रही है?”

वह जवाब देने के पहले सकपका गया, क्योंकि इस आकस्मिक प्रश्न के लिए तैयार नहीं था। फिर झटके से सँभलते हुए उसने कहा : “अच्छी लग रही है, बाबा!”

अब नागार्जुन उसे छड़ी दिखाकर बोले : “झूठ बोलते हो! मैं इसी छड़ी से तुम्हारी पिटाई करूँगा।” एक उन्मुक्त हँसी हँसते हुए उन्होंने जोड़ा : “ये चुड़ैल लग रही है।” फिर वह उन दोनों के साथ आगे बढ़ गए। दोनों मिथिला के थे और ऐसा लगता था कि पहले से उनके आत्मीय थे।

मैं हतप्रभ रह गया। सच कहूँ, तो उनके दर्शन का वह पहला अनुभव मुझे अच्छा नहीं लगा। मैंने सोचा, किसी लड़की के दिल को दुखाने वाली ऐसी बात नहीं कहनी चाहिए। यह मानवीय नहीं है। तीन दशक से ज़्यादा समय बीत गया, पर यह घटना भूल नहीं पाता हूँ।

चूँकि नागार्जुन के रचनात्मक साहित्य के कारण उनके प्रति गहन आत्मीयता और सम्मान का भाव मुझमें रहा, इसलिए इस बीच एक उदाहरण से अपने मन को समझाने की कोशिश करता रहा : यह कि घर आई मौसी की बेटियों को मेरी माँ किसी ख़ास मनःस्थिति में कभी-कभी चुड़ैल कह दिया करतीं और इसे सुनकर वे हँसती रहती थीं। अगरचे यह भी मेरे लिए आश्चर्यजनक था, मगर अपनी माँ के सन्दर्भ में निश्चय ही कह सकता हूँ कि इसका कोई अभिधात्मक आशय नहीं था और वह गहरे प्यार में इस शब्द का इस्तेमाल करती थीं। क्या पता, नागार्जुन ने भी प्यार में ऐसा कहा हो!

बाद में वह प्रो. मैनेजर पाण्डेय के घर भी गए और वहाँ क्या कह रहे थे, ज़्यादा समझ में नहीं आया और ख़ास कुछ याद भी नहीं पड़ता। उनकी अवस्था ऐसी थी कि बातों में स्पष्टता और तारतम्य नहीं रहता था। बस इतना साफ़ था कि मेज़बान उन्हें मानते बहुत थे, शायद इसलिए भी वह काफ़ी ख़ुश थे और उसी ख़ुशी में उन्होंने कहा : “मैनेजर, जलेबी मँगाओ!” जेएनयू जैसी जगह में जिस तरह मिनटों में उन्होंने देशज ठाठ का जलवा क़ायम किया, उससे मुझे सुखद अचरज हुआ।

इसके बाद 1994 में नयी दिल्ली में उन्हें भारत भूषण अग्रवाल पुरस्कार समारोह की अध्यक्षता करते हुए देखा-सुना और आख़िरी बार वहीं हिन्दी अकादमी द्वारा आयोजित एक कवि-सम्मेलन में मंच पर देखा। तब तक वह और अशक्त हो गए थे। दमे के मरीज़ थे ही। खाँसी आने पर मंच से उठकर प्रसाधन-कक्ष तक जाने की उनकी सामर्थ्य नहीं रह गई थी। इसलिए बलग़म थूकने के लिए अपने पास कोई काग़ज़ रखे हुए थे। मुझे वह सब देखकर अजीब-सा लगा और मैंने मन में सोचा, बीमारी की हालत में उन्हें वहाँ नहीं आना चाहिए था। मैं ग़लत भी हो सकता हूँ।

मंगलेश डबराल ने अपने किसी लेख या डायरी में दर्ज किया है कि उसी दौरान एक बार नयी दिल्ली में विश्व पुस्तक मेले में नागार्जुन को हिन्दी साहित्य संसार से अपरिचित एक नवयुवक ने देखा था। उसके साहित्यिक मित्र ने उसे बताया कि ‘ये हिन्दी के एक बड़े कवि हैं।’ नागार्जुन अस्त-व्यस्त और कुछ अराजक-से वेश-विन्यास में रहते थे, जिससे दुर्बलता के अलावा उनकी विपन्नता भी झाँकती थी। उन्हें देखकर उस नवयुवक को बहुत विकर्षण हुआ। उसने अपने दोस्त से कहा : “अगर हिन्दी का कवि ऐसा ही होता है, तो मैं ज़िन्दगी में और चाहे जो बनूँ, हिन्दी कवि तो नहीं ही बनना चाहूँगा।” इस प्रसंग को एक ‘होलटाइमर’ या पूर्णकालिक कवि की आर्थिक विपन्नता से जोड़ते हुए मंगलेश जी ने हिन्दी साहित्य की एक विडम्बना के रूप में रेखांकित किया है।

बहरहाल। दिल्ली छूट जाने के बाद मेरा कभी नागार्जुन से सामना नहीं हुआ। समाचार मिला कि अन्तिम समय में वह दरभंगा ज़िले में अपने गाँव तरौनी चले गए और गम्भीर रूप से बीमार होकर महीनों शय्याग्रस्त रहे। एक पत्रिका में पढ़ा कि उन दिनों बड़े-बड़े लोग उनसे मिलने वहाँ गए, जिनमें भाकपा माले के राष्ट्रीय महासचिव विनोद मिश्र भी थे।

1998 में कवि वीरेन डंगवाल कानपुर में हिन्दी दैनिक ‘अमर उजाला’ के स्थानीय सम्पादक के रूप में काम कर रहे थे। एक दिन मैं उनसे मिलने गया, तो बहुत दुख-भरे स्वर में उन्होंने यह ख़बर सुनाई : “नागार्जुन नहीं रहे!” दुख मुझे भी हुआ, लेकिन ज़्यादा नहीं, क्योंकि एक तो उनसे मेरे गहन व्यक्तिगत सम्बन्ध नहीं थे, इसलिए उनसे जुड़ी स्मृतियाँ बहुत विरल थीं; दूसरे, मैंने सोचा कि शय्याग्रस्त अवस्था में जो तकलीफ़ वह सह रहे थे, उससे मुक्ति ख़ुद उनके लिए अनुचित नहीं रही होगी।

उनके न रहने के 22 साल बाद, शायद 2020 में सोशल मीडिया पर एक मित्र ने आपबीती साझा की कि बीसवीं सदी के आख़िरी दशक में जब वह सात साल की थीं, नागार्जुन ने उनका यौन उत्पीड़न किया था। हिन्दी संसार स्तब्ध रह गया। सबकी तरह मुझे भी बहुत आघात लगा। सदमे की बात यह नहीं है कि ऐसा नहीं हो सकता, बल्कि यह है कि ऐसा सम्भवतः हुआ था।

अब सवाल है कि इस जानकारी के आलोक में उनके रचे साहित्य को कैसे देखा जाए? इसका कोई आसान उत्तर मेरे पास नहीं है। प्रो. मैनेजर पाण्डेय की एक मूल्यवान स्थापना है : “रचनाकार का निजी जीवन वहीं तक पाठक के लिए महत्त्वपूर्ण है, जहाँ तक कि उसकी रचनाओं को समझने या उनकी व्याख्या करने में उससे मदद मिलती हो।”

मुश्किल यह है कि नागार्जुन के अधिकांश काव्य का बाल यौन उत्पीड़न की उनकी तथाकथित भयावह विकृति से कोई सीधा या परोक्ष सम्बन्ध स्थापित नहीं होता, इसलिए उसकी समझ या व्याख्या इससे न प्रभावित होती है, न बदलती है। अब इस आधार पर कोई यह फ़ैसला कर ले कि वह व्यक्ति अच्छे नहीं थे, इसलिए उनकी रचनाओं को हम नहीं पढ़ेंगे और व्यक्ति के ही समान उनकी रचनाओं से भी विरक्ति या वितृष्णा हो गई है; तो और बात है।

इस बिन्दु पर यह सवाल ज़रूर उठता है कि आपके लिए व्यक्ति प्राथमिक है या रचना? मसलन, मेरे लिए उनकी रचनाएँ ही प्राथमिक हैं और उनके व्यक्ति से मेरा न के बराबर सम्बन्ध रहा। एक मानी में यह अच्छा ही हुआ, क्योंकि उनकी रचनाओं की श्रेष्ठता मेरे लिए अक्षुण्ण है और उनसे मेरा लगाव भी। चूँकि उनके व्यक्ति से मेरा कभी कोई परिचय या लगाव रहा ही नहीं; इसलिए यक़ीन कीजिए कि उनके ‘डिफ़ेंस’ में ये बातें मैं हरगिज़ नहीं कर रहा हूँ।

नागार्जुन इस दुनिया से लगभग तीन दशक पहले जा चुके हैं। बाल यौन उत्पीड़न का इल्ज़ाम उनकी मृत्यु के 22 बरस बाद उन पर लगा। इसकी जो सज़ा समाज उनके व्यक्ति को दे सकता था, उससे वह हमेशा के लिए चूक गया है। हाँ, यह सज़ा उनके साहित्य को भी दी जा सकती है, बशर्ते कि इस विकृति का उससे कोई सम्बन्ध बनता हो; लेकिन केवल उनके नाम के कारण उसे ख़ारिज या बहिष्कृत करने से यह जान लीजिए कि व्यक्ति नागार्जुन का अब कोई नुक़सान होने वाला नहीं है और न ही उनकी रचनाओं की प्रशंसा और कीर्ति से व्यक्ति नागार्जुन का कोई लाभ होना है।

अन्ततः मेरा प्रस्ताव यह है कि जो पाठक व्यक्ति नागार्जुन के बजाय उनकी रचनाओं की उत्कृष्टता से प्रभावित हैं, उन्हें सन्देह से न देखा जाए। उसी तरह, जो पाठक व्यक्ति नागार्जुन को सब कुछ मानते हुए उनकी रचनाओं से विमुख होने और उनका बहिष्कार करने को विवश हैं, बेशक उन्हें ऐसा करने का अधिकार है, मगर अपने फ़ैसले को फ़तवे की तरह जारी करने का हक़ शायद नहीं है।

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