
जनता के नकारे को राज्य सभा का सदस्य नरेन्द्र मोदी की सरकार ने बनाया है बाकायदा निर्वाचित नकारा कैसे हुआ?
संजय कुमार सिंह
आज मेरे सभी अखबारों में कल संसद की कार्यवाही न हो पाने पर प्रधानमंत्री ने जो कहा वह लीड या सेकेंड लीड है। द हिन्दू और द टेलीग्राफ में यह सेकेंड लीड है। इनमें द हिन्दू की लीड का शीर्षक है, शिन्दे के लिए मुख्यमंत्री की कुर्सी मांगते हुए सेना ने बिहार मॉडल का उल्लेख किया। द टेलीग्राफ की लीड का शीर्षक है, भाजपा दृढ़ निश्चय फडनविस ही होंगे (मुख्यमंत्री)। आप जानते हैं कि पिछली बार भाजपा ने शिवसेना के साथ मिलकर चुनाव लड़ा था पर शिवसेना ने उसके साथ मिलकर सरकार बनाने से इनकार कर दिया। इस कारण जो सब हुआ वह फिर से बताने की जरूरत नहीं है। एक मुख्यमंत्री को ज्यादा विधायक होने के बावजूद उपमुख्यमंत्री बनाया गया और दल बदलकर समर्थन देने वाले को मुख्यमंत्री बनाया गया। इसमें पैसों का लेन-देन हुआ या विधायक खरीदे गये – अथवा नहीं या अपनी ही पार्टी को मुख्यमंत्री की कुर्सी के लिए तोड़ा या ईडी के डर या भाजपा अथवा संघ से प्रेम में यह सब अभी मुद्दा नहीं है। मुद्दा यह भी नहीं है कि इसमें संवैधानिक व्यवस्थाओं का क्या हुआ। सुप्रीम कोर्ट का फैसला क्या आया। चुनाव फिर से हुए और अब पुरानी बातों का मतलब नहीं है हालांकि, प्रधानमंत्री के लिए अभी भी न सिर्फ 1947 और 1975 की इमरजेंसी प्रासंगिक है बल्कि वे नेहरू और गांधी की बात भी ऐसे करते हैं जैसे अभी वे भी उनके प्रतिद्वंद्वी हों। हालांकि, यह सब अभी मुद्दा नहीं है।
कुल मिलाकर, आज खबर है कि महाराष्ट्र में भाजपा को सरकार बनाने में फिर पहले जैसी मुश्किल आ रही है। चुनाव के समय यह कह दिये जाने के बावजूद कि मुख्यमंत्री पद के भाजपा के उम्मीदवार देवन्द्र फडणविस ही होंगे। शिन्दे के पास कोई विकल्प नहीं था। इसलिए मुझे उम्मीद थी कि जनता भाजपा को इतनी सीटें देगी कि वह स्वतंत्र रूप से सरकार बना सके या फिर तोड़ फोड़ कर भी सरकार नहीं बना पाये। लेकिन भाजपा के मामले में यह अब आसान नहीं रह गया है और गठबंधन की राजनीति में जरूरी नहीं है कि कोई दल स्वयं सरकार बनाने लायक सीटों पर चुनाव भी लड़ सके जीतना तो बहुत बाद की बात है। ऐसे में दलों को तोड़ना भी ‘राजनीति’ है और शिन्दे ऐसा करके फंस चुके हैं। उनकी पार्टी छोटी हो चुकी है और उनके साथ जो विधायक हैं उनकी संख्या जरूरत के अनुसार नहीं हुई या मांग ज्यादा हुई तो भाजपा के पास दूसरे दल से दूसरी शर्तों पर समझौता करके सरकार बनाना शामिल है। पुरानी भ्रष्ट व्यवस्था में यह सब होता था तो उसे भ्रष्टाचार कहा जाता था पैसे देकर विधायक खरीदे जाते थे और समर्थन के बदले मंत्री बनाया जाता था, कमाऊ मंत्रालय दिये जाते थे। अब सब ठीक होने का दिखावा है और ऐसा समझा दिया गया है कि यही सर्वश्रेष्ठ राजनीति है और भाजपा ही सार्वश्रेष्ठ पार्टी। इस तरह भाजपा सत्ता में बने रहने के लिए ना सिर्फ विपक्ष से लड़ रही है, सहयोगियों से भी लड़-भिड़ कर उन्हें हमेशा के लिए कमजोर और अपहिज बना रही है। स्वार्थ में लोगों को समझ नहीं आ रहा है और लोग झूठ बोल रहे हैं, झेल रहे हैं और अखबार यह सब नहीं के बराबर बता रहे हैं बल्कि छिपा भी रहे हैं।
इस बार के चुनाव के बाद अगर भाजपा सरकार बनाने की स्थिति और कोशिश में है तो तथ्य यह भी है इसके लिए समय कम है और अगर फैसला नहीं हो पाया तो मजबूरन राष्ट्रपति शासन लगाना पड़ सकता है और अगर ऐसा हुआ तो भाजपा की स्थिति और मजबूत होगी। उसके लिए विधायकों को खरीदना और पार्टी में तोड़-फोड़ करना ही नहीं ईडी और सीबीआई का दुरुपयोग भी आसान होगा। मीडिया के लिये यह सब मुद्दा नहीं होगा और अंततः भाजपा की सरकार बनेगी और जब पिछली सरकार चलती रही तो इस बार भी कोई दिक्कत नहीं आनी है बशर्ते बैसाखियां डटी रहीं। मोटे तौर पर भाजपा की राजनीति और उसका प्रभाव ऐसा है जिसे अखबार खुल कर नहीं बताते हैं कितने लोग समझ पाते हैं और कितने नहीं वह भी अलग मुद्दा है। मेरा मानना है कि ज्यादातर अखबार भाजपा के समर्थन में लगे हैं और इसमें उन्हें देश दुनिया से कोई मतलब नहीं है। समझने की जरूरत यह है कि महाराष्ट्र को दो हिस्से में बांट दिया जाये तो एक हिस्से में भाजपा की सरकार आराम से बन सकती है और बिहार को नहीं बांटा गया होता तो शायद नीतिश कुमार का समर्थन केंद्र की सरकार बनाये रखने के काम नहीं आता। और भाजपा को नीतिश के समर्थन की जरूरत ही नहीं होती। इस तरह भाजपा ने राजनीति में अपनी सुविधा के लिए क्या सब किये हैं वह भी एक मुद्दा है। भाजपा की हिन्दुत्व की राजनीति में छोटे हिन्दू राज्य और अलग हिन्दू राष्ट्र फायदेमंद है। आपको नहीं लगता है कि भाजपा इसके लिए काम करेगी तो आप ऐसा मानने के लिए स्वतंत्र हैं।
दिलचस्प यह भी है कि महाराष्ट्र में सरकार बनाने में भाजपा को जिन मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है उसे बताने वाली खबर को दूसरे अखबारों में प्रमुखता नहीं मिली है। हिन्दी अखबारों में उमर उजाला और नवोदय टाइम्स में यह खबर पहले पन्ने पर नहीं है। एक तरफ तो भाजपा को मीडिया का ऐसा समर्थन मिल रहा है दूसरी ओर, प्रधानमंत्री संसद में सरकार के विरोध पर कहते हैं, जनता से खारिज लोग ले रहे हैं हुड़दंगबाजी का सहारा। नवोदय टाइम्स ने इसे सिंगल कॉलम में छापा है जबकि अमर उजाला में लीड का शीर्षक है, पहले दिन ही कामकाज ठप, पीएम बोले – जनता ने जिन्हें नकारा, उनकी संसद कंट्रोल करने की कोशिश। कहने की जरूरत नहीं है कि संसद के दोनों सदनों में संचालन का काम उसके अध्यक्ष करते हैं और इस बार भाजपा की सीटें कम होने के बावजूद भाजपा ने ओम बिरला को ही अध्यक्ष बनाया है जिनकी कार्यशैली अलोकतांत्रिक है इसपर किसी को संदेह नहीं होना चाहिये और न भी हो तो कंट्रोल उन्हीं का रहता है। संसद में वही लोग पहुंचते हैं जिन्हें जनता चुनती है, वो चाहे जिस पार्टी के सदस्य हों। यही बात राज्य सभा के मामले में है। वहां भी अध्यक्ष भाजपा के नेता ही हैं और कई बार वे भाजपा के चीयरलीडर के रूप में काम करते दिखते हैं। भाजपा की नीतियों का अंध समर्थन करते हुए एक निजी शिक्षण संस्थान के समारोह में कह चुके हैं, ‘बच्चों में एक और नई बीमारी है- विदेश जाना’। यह देश में खुले निजी संस्थानों के पक्ष में माहौल बनाने की कोशिश तो है ही विदेश जाने के कारणों पर पर्दा डालने की कोशिश भी है जो उपराष्ट्रपति से अपेक्षित नहीं है। इनके रहते, प्रधानमंत्री जनता के नकारे लोगों द्वारा कंट्रोल करने की कोशिश की बात कर रहे हैं जबकि जनता जिन्हें नकार देती है वो चुनाव हार जाते हैं। राज्य सभा के सदस्य नहीं हो सकते हैं बशर्तें सरकार उन्हें ही मनोनीत न कर दे जैसे विधानसभा चुनाव हारने के बाद भाजपा के कम से कमएऐक सदस्य को किया जा चुका है।
इन परिस्थितियों में प्रधानमंत्री ने जो कहा वह तथ्यात्मक रूप से न सिर्फ गलत है, निराधार भी है। यह सही है कि प्रधानमंत्री ने कहा है तो खबर है और इसीलिए नवोदय टाइम्स ने सिंगल कॉलम में छापा है लेकिन अमर उजाला और दूसरे अखबारों ने प्रधानमंत्री के झूठ का प्रचार किया है और भले उसे प्रधानमंत्री के झूठ का समर्थन करने का पूरा अधिकार हो पर वह इसका कोई कारण नहीं बताता है कि आम जनता को ऐसा क्यों करना चाहिये। या अविश्वसनीय लगने वाली बात पर यकीन क्यों करना चाहिये। आज अखबारों की खबरों से ही आगे मैं बताउंगा कि पूरा मामला दरअसल है क्या लेकिन सच्चाई तो यही है कि भाजपा भी विपक्ष में रही है तो ऐसे विरोध करती रही है और तब प्रधानमंत्री जिस पार्टी को भ्रष्ट कहते रहे हैं उसके प्रमुख सदस्यों को तो छोड़िये किसी भी सदस्य के खिलाफ भ्रष्टाचार का मामला साबित नहीं कर पाये हैं। वह भी एक दो साल में नहीं, दस साल बाद भी। यही नहीं, विरोध तो उनकी पार्टी ने ईवीएम का भी किया था और अब पूरी तरह यू-टर्न ले चुके हैं और कांग्रेस पर ही आरोप लगाते है। ऐसा वे जीएसटी और आधार के मामले में भी कर चुके हैं पर वह सब भी अब मुद्दा नहीं है क्योंकि प्रचारकों के अनुसार देश तरक्की पर है, विकास हो रहा है। अगर विकास का मतलब टोल रोड बनाना ही है तो कल मैं फास्टटैग वाली ऐसी ही एक सड़क पर चल रहा था जो देहरादून से दिल्ली तक पूरी भरी हुई थी और न होती तो क्या होता उसकी कल्पना की जा सकती है।

स्थिति यह है कि एक ट्रक दुर्घटना ग्रस्त होने के कारण चलने की स्थिति में नहीं था और उसका सामान उतारने का काम चल रहा था। इस कारण जो जाम लगा उसमें हजारों लोगों के आधे घंटे से ज्यादा खराब हुए, जो ईंधन फुंका सो अलग और इस स्थिति में ट्रक पर लदा माल जो गन्ना था भैंसा गाड़ियों से भेजा जा रहा था और इससे अलग असुविधा हुई होगी। इस अनुभव के आधार पर मैं कह सकता हूं कि विकास अगर हुआ है, तो वही, जो जरूरी था और ऐसा नहीं है कि जरूरी विकास हो ही गया है या वह बहुत संतोषजनक है। दस साल में किये रूटीन काम को विकास कहने और चुनाव में बंटने कटने का समर्थन – एक हैं तो सेफ हैं से करके चुनाव आयोग के समर्थन और सहायता से चुनाव जीतने का मतलब ना तो मनमानी करना है और ना विपक्ष पर झूठे आरोप लगाना। पर वह सब भी हो रहा है और अगर संवधैानिक संस्थाएं, पद व उसकी मलाई के कारण नियंत्रित हैं तो मीडिया विज्ञापनों और ईडी के जरिये नियंत्रित कर लिया गया है और उसे अपनी जिम्मेदारियों का भी अहसास नहीं रह गया है वरना संसद में हंगामे का शीर्षक वह भी हो सकता था जो द टेलीग्राफ ने लगाया है – (संसद के सत्र का) पहला दिन अदाणी के रक्षाकवच के विरोध में निकल गया। यह शीर्षक ऐसा है असल मुद्दे को बताता है और उपयुक्त है। लेकिन मुख्य मुद्दे को छिपाने के लिए प्रधानंमंत्री ने जो कहा है उसे ही प्रचारित किया जा रहा है। दि एशियन एज का शीर्षक है, 80-90 बार खारिज की गई पार्टियां संसद को रोकने की कोशिश कर रही हैं। मुद्दा यह है कि जनसंघ समेत भाजपा को कितनी बार खारिज किया गया है या इमरजेंसी के विरोध में सत्ता पाने वाले कांग्रेस अथवा इंदिरा गांधी के विरोधी कितने दिन सत्ता में रह पाये। दुबारा सत्ता में आने के लिए कितनी बार नकारे गये और क्या-क्या किया उसे कौन नहीं जानता है। तथाकथित भ्रष्ट पार्टी इस स्तर पर नहीं उतर रही है तो उसकी प्रशंसा कौन करेगा या नहीं उतरना ही गलत है तो इसकी आलोचना क्यों नहीं होती?
संसद में इस तरह के आरोप लगाकर प्रधानमंत्री अगर माहौल बनाना चाहते हैं तो यही क्यों नहीं बताया जाये जैसे नवोदय टाइम्स ने बताया है – शीत सत्र में बढ़ा तापमान। टाइम्स ऑफ इंडिया का शीर्षक है, (संसद) सत्र को सहज बनाने की प्रधानमंत्री की अपील के कुछ ही घंटे बाद संसद में हंगामा। मुद्दा यह है कि संसद में विपक्ष है और 2024 में यह 2019 के मुकाबले मजबूत हुआ है तो प्रधानमंत्री क्यों चाहते हैं कि विपक्ष उनका विरोध नहीं करे, उनसे अदाणी पर सवाल नहीं करे और अमेरिका से जो खबर हैं उन्हें उन्हीं की तरह नजरअंदाज कर दे। विपक्ष अपना काम कर रहा है और उसे करने देना चाहिये। यही लोकतंत्र है और भाजपा ने भी विपक्ष में रहते हुए ऐसा ही किया है। हिन्दुस्तान टाइम्स का शीर्षक और संदेश तो बिल्कुल वही है जो प्रधानमंत्री चाहते हैं। हिन्दी में यह शीर्षक होगा, जनता का नकारा (हुआ) विपक्ष सदन को नियंत्रित करने की कोशिश कर रहा है। यह सब तब है जब, द हिन्दू की खबर के अनुसार, अदाणी मामले में हंगामे के बीच दोनों सदन स्थगित। मुझे लगता है कि यह शीर्षक सही है और 2014 से पहले की आजादी से पहले ऐसे मौकों पर सभी अखबारों में शीर्षक लगभग ऐसे ही होते थे। तब ना सोशल मीडिया था ना किसी प्रधानमंत्री या पार्टी की ट्रोल सेना होती थी। अब बेशर्मी और नंगई की पूरी आजादी है।
आज सिर्फ इंडियन एक्सप्रेस ने अपनी लीड से बताया है, अदाणी पर चर्चा के लिए विपक्ष का नोटिस खारिज, प्रधानमंत्री ने बाधाओं की आलोचना की। इससे और द हिन्दू के शीर्षक से आप समझ सकते हैं कि माजरा क्यो है। ऐसे में मेरे एक मित्र की सलाह है कि मोदी से देश को बचाने का एक ही तरीका है कि उनकी आलोचना बंद कर दी जाये। वे आलोचना का भी फायदा उठा ले जाते हैं और स्थिति बदनाम हुए तो क्या नाम न हुआ जैसी हो गई है। मुझे लगता है कि अगर ऐसा हुआ तो वे बेलगाम तानाशाह हैं और 10 साल में उन्होंने अपने अनुकूल ऐसी स्थितियां बना ली हैं और विरोध का फायदा हो ना नहीं, जरूरी है। कम से कम बैसाखियों को बताने के लिए। अगर वे हर बार अनुकूल जनादेश प्राप्त कर ले रहे हैं, अनुकूल न हो तो भी उसका उपयोग अपने हित में कर पा रहे हैं तो बहुत सारे मामलों की जांच ही नहीं होगी, प्रधानमंत्री और उनके समर्थकों के खिलाफ कार्रवाई की जरूरत हो तो वह भी नहीं होगी और प्रधानमंत्री इस कोशिश में लगे रहेंगे कि वे इतिहास में बेदाग दर्ज रहें। सोचना जनता को है और आम जनता में प्रचारक भी हैं।


