Connect with us

Hi, what are you looking for?

Local News Community

प्रिंट

आज के अखबार : नहीं बताते कि सैफ असुरक्षित थे और ‘सुरक्षा’ पुलिस को नहीं, राजनीति व राज्य को देनी थी

संजय कुमार सिंह

अभिनेता सैफ अली खान पर हमले की खबर आज द टेलीग्राफ और टाइम्स ऑफ इंडिया में लीड है। टाइम्स ऑफ इंडिया ने मुंबई की इस घटना को दिल्ली के अपने संस्करण में छह कॉलम में छापा है तो द टेलीग्राफ ने कोलकाता के अपने एडिशन में बैनर बनाया है। कहने की जरूरत नहीं है कि बुलडोजर न्याय और कथित लव जेहाद के खिलाफ अभियान के इस दौर में ‘घर में घुसकर हमला’ सामान्य अपराध नहीं है और देश में अगर कोई समस्या है तो सब को ठीक करना सुप्रीम कोर्ट का काम नहीं है। अलग काम के लिए अलग एजेंसीं, संस्था और निकाय हैं तथा सबको अपना-अपना काम करना चाहिये। जब देश के तमाम संवैधानिक संस्थाओं पर कब्जे के उदाहरण दिख रहे हैं तो इस घटना को हिन्दी के अखबारों में ज्यादा महत्व दिया जाना चाहिये था। वैसे भी, सैफ की लोकप्रियता हिन्दी फिल्मों से ही है। हमले की इस घटना में एक करोड़ रुपये मांगने की सूचना जरूर है लेकिन सबको पता है कि वसूली ऐसे नहीं होती है। इसलिए मामला जो भी हो, किसी सिरफिरे की करतूत है वसूली का तो नहीं है और निजी सुरक्षा वाली बहुमंजिली इमारत में घुसकर हमला कोई साधारण वारदात नहीं है। ऐसे में हिन्दी अखबारों जिम्मेदारी थी कि वे बताते कि ऐसा क्यों हुआ होगा और समाज को इससे बचने की सलाह देते। पहले खास मौकों पर विशेष संपादकीय लिखे जाते थे। अब वो सब नहीं होता है। आज हिन्दी के कुछ ज्यादा अखबारों की चर्चा करूंगा। इस खास मुद्दे का कवरेज देखने और बताने के लिए आज मुझे बाजार में हिन्दी के जो भी अखबार मिले सब खरीद लाया।

टाइम्स ऑफ इंडिया ने पहले पन्ने पर आधा विज्ञापन होने के बावजूद इससे संबंधित खबर और अंदर की खबरों सूचनाएं पूरे छह कॉलम में दी है। बाकी दो कॉलम में आठवें वेतन आयोग की खबर है जो दिल्ली चुनाव की घोषणा होने के बाद मतदान से कुछ हफ्ते पहले की गई है। अगर यह गलत नहीं है और हो पाया है तो सिर्फ इसलिए कि सभी संस्थाओं में सरकार के समर्थक बैठा दिये गये हैं और इसका उदाहरण अनिल मसीह को सजा नहीं होना ही नहीं है। मोहन भागवत के खिलाफ कार्रवाई की मांग भी नहीं है। यही नहीं, इंडियन एक्सप्रेस की खबर के अनुसार, इलाहाबाद हाई कोर्ट के न्यायमूर्ति शेखर यादव ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को लिखा है कि वे विश्व हिंदू परिषद के कार्यक्रम में दिए अपने बयान पर कायम हैं। उन पर आरोप हैं कि उन्होंने इस कार्यक्रम में मुसलमानों के खिलाफ टिप्पणी की थी। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने उनको तलब किया था और कहा था कि जस्टिस यादव को ऐसे बयानों से बचना चाहिए। 17 दिसंबर को वो भारत के मुख्य न्यायाधीश संजीव खन्ना की अध्यक्षता वाले कॉलेजियम के समक्ष पेश हुए थे। इसके बाद इलाहाबाद हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश अरुण भंसाली ने भी उनसे जवाब मांगा था।

जनवरी के प्रारंभ में भारत के मुख्य न्यायाधीश ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश अरुण भंसाली को एक पत्र लिखा था और इस मामले पर नई रिपोर्ट मांगी थी। इंडियन एक्सप्रेस में आज छपी श्यामलाल यादव की खबर के अनुसार, जस्टिस यादव ने मुख्य न्यायाधीश अरूण भंसाली को पत्र लिखकर कहा है कि वो अपने बयान पर कायम हैं। और उनके बयान से न्यायिक व्यवस्था के किसी भी सिद्धांत का उल्लंघन नहीं हुआ है। उधर, सैफ अली खान पर हमले की खबर नवोदय टाइम्स में फोल्ड से ऊपर तीन कॉलम में है। शीर्षक है, सैफ को घर में घुसकर चाकू से गोदा। इससे लग रहा है कि यह अपराध का कोई सामान्य मामला नहीं है। ना ही वसूली का लगता है। लेकिन ज्यादातर अखबारों ने आज यही बताया है कि हमलावर ने पहले एक करोड़ रुपये की मांग की और यह भी कि उनका बेटा उन्हें थ्रीव्हीलर से अस्पताल ले गया। एक अखबार ने यह भी बताया है कि रात के उस समय ड्राइवर नहीं था इसलिए बेटा थ्रीव्हीलर में ले गया। मैं जानना चाहता हूं कि वह गाड़ी चलाना नहीं जानता है या उसके पास ड्राइविंग लाइसेंस नहीं है या रात में गाड़ियां भी नहीं होती हैं। क्या उस स्थिति में भी किसी पड़ोसी को जगाया नहीं जा सकता था। पूछने और बताने के लिए और भी बहुत सी बातें हो सकती हैं लेकिन अखबार खुद जो बता रहे हैं उससे पता चलता है कि जो हालत हैं वो यूं ही नहीं हैं या इसमें उनका योगदान कम नहीं है।  

हिन्दुस्तान, नवभारत टाइम्स में आज यह खबर सेकेंड लीड है। लीड के बराबर, टॉप पर तीन कॉलम में। लीड आठवें वेतन आयोग की मंजूरी है। मुझे यह चयन ठीक लगता है। दोनों के शीर्षक में घर में घुसकर और घर में जानलेवा हमला लिखा गया है जो इस हमले की खास बात है। जनसत्ता में यह खबर टॉप पर दो कॉलम में है लेकिन सेकेंड लीड नहीं है। शीर्षक भी घर में चाकू से हमला मामले को कमजोर करता है। ऐसा लगता है कि परिवार के सदस्य नहीं तो किसी कर्मचारी नौकर ने किया होगा और यह अपराध की विशेषता नहीं बताता है। नवभारत टाइम्स में इस खबर के साथ एक खबर का शीर्षक है, मुंबई की सुरक्षा पर राजनीति तेज। मुझे लगता है कि यह मुंबई नहीं देश भर के नागरिकों की सुरक्षा पर राजनीति तेज करने का समय आ गया है। मुख्यमंत्री फडणविस ने कहा भी है, यह हमला एक गंभीर घटना है लेकिन इसके कारण मुंबई को असुरक्षित कहना गलत होगा। मैं फडणविस से सहमत हूं। असुरक्षित सिर्फ मुंबई नहीं है, पूरा देश है, हरेक नागरिक है। यह राजनीति के कारण है कि कब कौन किसकी राजनीति के करण किस सिरफिरे के निशाने पर आ जायेगा कहना और समझना मुश्किल है। कहने की जरूरत नहीं है कि सैफ पर हमले का माहौल तो काफी समय से बन रहा था और यह संयोग हो सकता है कि सैफ के हमलावर ने उसपर हमला करने के लिए मुंबई चुना। वरना कोई और कहीं और हमला कर सकता था। असुरक्षित मुंबई नहीं सैफ थे और सुरक्षा पुलिस को नहीं राजनीति को देनी थी जो नहीं दी गई या हमलावर को उकसाया जा सका।

दुखद यह है कि हमले के बाद भी हिन्दी अखबारों ने इस मामले को गंभीरता नहीं दी है। बेशक यह खबर पहले पन्ने पर है। यह सैफ अली खान की लोकप्रियता के कारण है उनके साथ जो हुआ उसके कारण नहीं है। उदाहरण के लिए दुर्घटना में घायल होना और हमले में घायल होना खबर के लिहाज से अलग है और हमले में घायल होना बड़ी बात है। इस लिहाज से खबर को पहले पन्ने पर तो होना ही था। इसलिए मेरा मानना है कि फोल्ड के नीचे सामान्य डबल कॉलम की खबर के रूप में छापने वाले संपादक या तो खबर नहीं समझते हैं या देश की राजनीति नहीं समझते हैं। वैसे बहुत संभावना है कि राजनीति भी समझते हैं और इसीलिए दो कॉलम में छापा है। इससे कम महत्व देना उनके वश का होता तो वो भी करते और तब अपनी पत्रकारिता के साथ राजनीति भी करते। राष्ट्रीय सहारा में यह खबर तीन कॉलम में फोल्ड से नीचे है। शीर्षक, ‘सैफ अली खान पर चाकू से हमला’ है। इस खबर का एक अंश जो हाईलाइट किया गया है, वह इस प्रकार है – लूटपाट की नीयत से घुसा था हमलावर। इसका मतलब यह भी है कि यह घर में घुसकर मारने का मामला नहीं है और हमला तो पकड़े जाने पर हुआ। संभव है, यही सच हो पर जो स्थितियां हैं उसमें जांच के पहले यह राय रखना भी राजनीति है और संभव है राजनीतिक दबाव में जांच का नतीजा भी यही आ जाये। 

अमर उजाला में यह खबर फोल्ड के नीचे तीन कॉलम में है। शीर्षक है, अभिनेता सैफ के घर में घुसकर चाकू से हमला, छह वार किये, अस्पताल में भर्ती। दैनिक जागरण की खबर का शीर्षक फोल्ड से ऊपर है। शीर्षक है, अभिनेता सैफ पर घर में चाकू से हमला, खतरे से बाहर। खबरों को प्राथमिकता देने का आलम यह है कि इसके नीचे चार कॉलम में छपी खबर का शीर्षक है, अदाणी के खिलाफ रिपोर्ट जारी करने वाली हिन्डनबर्ग रिसर्च बंद। हिन्डनबर्ग रिसर्च बंद होने की खबर नवभारत टाइम्स में सैफ की खबर के नीचे दो कॉलम मं है। शीर्षक है, अदाणी को ‘अटैक’ करने वाली हिन्डनबर्ग रिसर्च बंद। हिन्दुस्तान में पहले पन्ने पर आधा विज्ञापन है। आज इस खबर को महत्व मिलने का कारण यह हो सकता है कि इस संस्था ने अदाणी की अच्छी खबर ली थी। हालांकि, इंडियन एक्सप्रेस के शीर्षक से लगता है कि संस्थान के मालिकों ने अपने काम (और नतीजों) से संतुष्ट होकर संस्थान और धंधे को बंद करने का निर्णय किया है फिर भी कई अखबारों में भारत में अदाणी की खबर लेने वाले संस्थान के बंद होने की खुशी छिपाये नहीं छिप रही है। हालांकि, इंडियन एक्सप्रेस का शीर्षक का भाग है, … कुछ साम्राज्यों को हिलाया जिन्हें हिलाने की जरूरत हमने समझी। 

आइये अब अंग्रेजी अखबारों में सैफ की खबर देंखे। इंडियन एक्सप्रेस में यह चार कॉलम में टॉप पर है। लीड दो कॉलम में इसरो की खबर है और आठवें वेतन आयोग को मंजूरी – पहले पन्ने पर नहीं है। हिन्दुस्तान टाइम्स में यह पहले पन्ने से पहले के अधपन्ने पर तीन कॉलम में है। द हिन्दू में यह खबर तीन कॉलम में है। शीर्षक है, घर में घुसकर किये गये हमले के बाद सैफ अली खान की हालत स्थिर। द टेलीग्राफ ने अपनी लीड खबर के साथ ऐसे पुराने मामलों की सूची छापी है। इससे साफ है कि फिल्म कलाकार वैसे भी सुरक्षित नहीं हैं और उनसे वसूली होती रहती है। दि एशियन एज में आज इस खबर की फोटो ही है। खबर अंदर होने की सूचना है। पहले पन्ने पर घर में चाकू मारे जाने और अब सुरक्षित होने की सूचना है।

CosmoQuick: AI Recruitment For Media Jobs
Click to comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

भड़ास लीगल टीम : Bhadas Legal Team

भड़ास मेल: [email protected]

Latest 100 भड़ास

विज्ञापन