
संजय कुमार सिंह
आज दि एशियन एज के पहले पन्ने पर अंदर के पन्ने की खबरों की सूचना में बताया गया है कि लोकसभा अध्यक्ष, ओम बिरला ने कहा है कि संसद की कार्यवाही का स्थगन जारी रहा तो इतवार को भी सदन की बैठक बुलाई जायेगी। यह अपने आप में खास बात है और पहले पन्ने पर हो सकती थी। इसके मुकाबले तमाम रूटीन की खबरें और प्रचार पहले पन्ने पर हैं लेकिन इस खास खबर को एशियन एज ने अंदर रखा है और यह बात पहले पन्ने पर बता भी दी है। आप जानते हैं कि अदाणी के मामले में चर्चा की मांग पर सदन की बैठक नहीं चल पा रही है। सरकार के अपने तर्क हैं और यह भाजपा के सत्ता में आने के बाद हुआ है कि विपक्ष अपनी मांग पर अड़ा है, संसद नहीं चल पा रही है तो उसके लिए विपक्ष को दोषी ठहराया जा रहा है जो उसका अधिकार है और यह दिखावा किया जा रहा है कि इस कारण संसद की कार्यवाही नहीं हो पा रही है। खबर नहीं छापकर यह संदेश देने की कोशिश चल रही है कि सब सामान्य है। कहने की जरूरत नहीं है कि चर्चा हुई होती तो इतना समय खराब नहीं होता और चर्चा नहीं हो रही है क्योंकि सरकार नहीं चाहती है लेकिन विपक्ष को बदनाम करने की अपनी योग्यता-क्षमता के दम पर सरकार यह सब कर रही है और अखबारों ने इसे पहले पन्ने पर रखना छोड़ दिया है।
यह सब तब है जब यह आरोप है कि सरकार ईवीएम (और चुनाव आयोग) की मदद से गलत तरीके से सत्ता में है और जब ईवीएम से मतदान शुरू हुए थे तो उसका विरोध करने वाली भाजपा अब उसका बचाव करती है। दूसरी ओर हर चुनाव के बाद कुछ नई कहानी सामने आती है। यहां तक कि 2019 के चुनाव नतीजे से संबंधित एक निजी विश्वविद्यालय के अनुसंधान और उसके सरकार विरोधी नतीजों की खबर लीक हो गई तो इतना हंगामा मचा कि उस रिपोर्ट का पता नहीं चला, जो अनुसंधान कर रहे थे उनकी नौकरी चली गई और विश्वविद्यालय ने उससे पल्ला झाड़ लिया। लोकसभा चुनाव में जब भाजपा की सीटें कम हुईं तो प्रधानमंत्री ने पूछा कि ईवीएम जिन्दा है या मर गया और इसे खुद सार्वजनिक रूप से बताया। इन सबके बाद हरियाणा में भाजपा की जीत अप्रत्याशित थी। कश्मीर में वही हुआ जो अपेक्षित था। अब महाराष्ट्र चुनाव में फिर भाजपा की जीत अप्रत्याशित है और झारखंड में जो सत्ता में था वही जीता। इससे भी ईवीएम पर लगने वाले इस आरोप को दम मिलता है कि अधिकारियों की मिलीभगत से छेड़छाड़ हो सकती है। बाकी भाजपा और उसके समर्थक अपने काम से साबित कर देते हैं कि उन्हें ईवीएम से लाभ मिल रहा है। महाराष्ट्र के एक गांव में ईवीएम की जांच के लिए बैलट पेपर से पुनर्मतदान रोकने के लिए कर्फ्यू लगा दिये जाने और उसपर भाजपा की प्रतिक्रिया से भी इसकी पुष्टि होती है। खबर में भाजपा प्रवक्ता ने गांव में गांव के उम्मीदवार से ज्यादा वोट भाजपा उम्मीदवार को मिलने का समर्थन किया था उसके पक्ष में दलील दी थी पर यह नहीं छपा था कि पुनर्मतदान होने में क्या दिक्कत हो सकती थी या इतने भर के लिए कर्फ्यू लगाने का मतलब नहीं है।
ऐसी सरकार कांग्रेस पर भ्रष्ट होने का आरोप लगाकर उसे प्रचारित करके सत्ता में आई है और 10 साल में साबित नहीं कर पाई है। दूसरी ओर विरोधियों को नये मामलों में फंसाना जारी है और पुराने मामलों में जो डर जाये उसका प्रत्यक्ष, परोक्ष समर्थन लेने के साथ वाशिंग मशीन में धोकर पार्टी में शामिल कर लिये जाने तक की कार्रवाई चल रही है। ऐसी सरकार अदाणी की रक्षा कर रही है और उनपर आरोप है कि उनकी कंपनियों में एक-दो नहीं, 20,000 करोड़ रुपये का निवेश है। यह राशि किसकी है का पता नहीं चल रहा है। इसपर सवाल उठाने वाले राहुल गांधी और महुआ मोइत्रा की संसद की सदस्यता दूसरे मामले में गई। आम आदमी पार्टी के संजय सिंह को भी जेल जाना पड़ा लेकिन पैसे किसके हैं उसका खुलासा नहीं हुआ है। यह स्थिति तब है जब नरेन्द्र मोदी सत्ता में आने से पहले कहा करते थे कि भारत में भ्रष्टाचार से कमाया गया पैसा स्विस बैंक में है (जो 100 दिन में वापस ले आउंगा और सबको 15 लाख मिलने के बराबर होगा) और शेल कंपनियों के जरिये भारतीय कंपनियों में निवेश कर दिया जाता है।
इस बिना पर भारत में लाखों (करीब चार लाख) शेल कंपनियां बंद कराने का दावा किया गया लेकिन बाद में कह दिया गया कि 2013 के कंपनी कानून में शेल कंपनियां पारिभाषित ही नहीं हैं और जो कंपनियां बंद हुईं वो काम नहीं करती थीं या भिन्न नियमों का पालन नहीं किये जाने के कारण बंद हुई हैं। ऐसी ही कंपनियों को अक्सर शेल कंपनी माना जाता है। जो भी हो, लाखों कंपनियां बंद हुईं, विदेश से काला धन नहीं आया, 15 लाख नहीं मिले और हिन्डनबर्ग की रिपोर्ट आई। उसमें जो मुद्दे थे उसपर कार्रवाई नहीं हुई और 20,000 करोड़ रुपये के निवेश को नजरअंदाज किया गया। उन्हीं दिनों पता चला कि पूर्व सेबी प्रमुख एनडीटीवी की नौकरी कर रहे थे और उन्हें शिकायतों की जानकारी नहीं थी या याद नहीं था। सुप्रीम कोर्ट ने एक तरह से मामला सेबी पर ही छोड़ दिया या उसपर भरोसा किया। तब हिन्डनबर्ग की रिपोर्ट आई कि सेबी ने कार्रवाई नहीं की क्योंकि उनके अदाणी समूह से रिश्ते हैं। मामला रिश्तों पर मोड़ दिया गया जबकि सबको पता है कि सेबी ने 20,000 करोड़ के मामले में कार्रवाई नहीं की। और यही सेबी या सेबी प्रमुख का दोष है। दूसरी ओर उनका बचाव जगजाहिर है। जेपीसी की बैठक में सेबी प्रमुख माधवी पुरी बुच को बुलाने पर ही विवाद था और वे आने के लिए कहकर नहीं आईं।
ऐसे में मेरा कोई नहीं है, मैं किसके लिए भ्रष्टाचार करूंगा कहकर सत्ता में आये नरेन्द्र मोदी जो कर रहे हैं वह सामने है और अखबार उसे बताना तो दूर, छिपा रहे हैं। दूसरी ओर, खबर है कि चौतरफा दबाव का असर हुआ है और सेबी के कारण बताओ नोटिस के जवाब में अदाणी के उपक्रमों ने सेटलमेंट के लिए आवेदन किया है। इस आशय की खबर कल इकनोमिक टाइम्स में छपी थी और कतरन साझा करते हुए मशहूर अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने एक्स पर लिखा था, अदाणी हिन्डनबर्ग मामले में सुप्रीम कोर्ट के समक्ष बिल्कुल यही मुद्दा था। सेबी ने सुप्रीम कोर्ट से कहा कि उन्हें अदाणी के स्टॉक में निवेश करने वाले मॉरीशस आधार वाले फंड के स्वामियों का पता नहीं चला। अगर ये जैसा हिन्डनबर्ग ने अपनी रिपोर्ट में कहा था, अदाणी से जुड़े थे तो यह निवेश नियमों का उल्लंघन करता है। अदाणी ने अब यह मान लिया है कि यह उनका निवेश था पर सेब और सुप्रीम कोर्ट अदाणी के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की। मेरा मानना है कि ऐसे निवेश का पता चलने के बाद सामान्य कार्रवाई यह होती कि इस पैसे को जब्त कर लिया जाता। जुर्माना, सजा, कार्रवाई सब बात की बातें हैं। पर बाद में जो सब हुआ उससे लगता है कि माधवी पुरी बुच को सेबी का प्रमुख इसीलिये बनाया गया था पर वह अलग मुद्दा है। इकनोमिक टाइम्स की कल की खबर का अंतिम हिस्सा अंदर के पन्ने पर सात कॉलम में छपा है और इसका शीर्षक है, 30 इकाइयों को नोटिस। खबर के अनुसार ये नोटिस गौतम अदाणी, उनके भाई विनोद, राजेश और वसंत, भतीजा प्रणव और रिश्तेदार प्रणव अरोरा व इनकी इकाइयों के नाम जारी किये गये हैं।
जहां तक 20,000 करोड़ के इस काले या अघोषित स्वामी वाले धन की बात है उसे अदाणी का मानकर उनके पास रहने देना सामान्य कृपा नहीं है। यह राशि कितनी है और क्या कर सकती है उसे बताने के लिए यह समझिये कि 500 करोड़ रुपये के कर्ज के बहाने एनडीटीवी अदाणी के पास चली गई। एक करोड़ रुपये की राशि को किसी आम सरकारी बैंक में सबसे कम ब्याज वाले खाते में भी रखा जाये तो न्यूनतम ब्याज प्रति माह 50 हजार रुपये होगा। हिन्दी बोलने-पढ़ने और हिन्दी में काम करने वाले मध्यम वर्गीय परिवार की औसत आय इससे ज्यादा नहीं है और ना आम जीवन जीने के लिए इससे ज्यादा की जरूरत है। ऐसे में इतने पैसे से कितनी बड़ी सोशल मीडिया सेना बनाई जा सकती है या प्रचारकों की टोली कितनी बड़ी होगी या कितने दिलीप मंडलों को प्रचारक बनाया जा सकता है उसकी कल्पना कीजिये और समझिये कि मीडिया का यह हाल क्यों है। यही काले धन की ताकत है और इन्हीं सब कारणों से इसम समय चल रहे समय को अघोषित इमरजेंसी कहा जाता है। यह कोरी कल्पना नहीं है। बैंगलोर में रहने वाले अधिवक्ता और लेखक अरविन्द नारायण की किताब, इंडियाज अनडिक्लेयर्ड इमरजेंसी – कांस्टीट्यूशनलिज्म एंड द पॉलिटिक्स ऑफ रेसिसटेंस का होना साबित करता है कि अघोषित इमरजेंसी का मामला यूं ही नहीं है। इसके लिखित और ठोस आधार हैं जो न सिर्फ किसी आम लेखक बल्कि कानून के जानकार के लिखे पुस्तक के रूप में मौजूद हैं। यह 2021 की दूसरी छमाही में तैयार होकर 2022 से बाजार और चर्चा में है। अगर आप इस बारे में नहीं जानते हैं तो इसीलिए कि नरेन्द्र मोदी और उनके प्रचारक 1975 की इमरजेंसी को नहीं भूलने देते हैं पर वह अलग मुद्दा है।
यहां दिलचस्प है कि नरेन्द्र मोदी पर जब अदाणी को संरक्षण देने का आरोप है और यह भी कि माधवी पुरी बुच के नेतृत्व में सेबी अदाणी के खिलाफ कार्रवाई नहीं कर रहा है तो 27 सितंबर के सेबी के इस नोटिस का प्रचार क्यों नहीं किया गया। मुझे लगता है कि यह नोटिस पक्षपात तो बताता ही है और औपचारिकता के अलावा इससे कुछ होना नहीं है उलटे अगर आवेदन के अनुसार सेटल कर दिया जाता है तो मामला अदाणी और जिसका पैसा है उसके हित में निपटा दिया जायेगा और यह पैसा असल में किसका है यह मुद्दा खत्म हो जायेगा। 2014 से पहले बोफर्स और दूसरे मामले में इंडियन एक्सप्रेस की खबर अगले दिन कई अखबारों में छपती थी। अब ऐसी खबरों का फॉलो अप नहीं होता। आज यह खबर बिजनेस वाले अखबारों में ही है और 27 सितंबर को अगर 30 कंपनियों या इकाइयों को नोटिस जारी हुआ तो खबर नहीं बनी यह भी साधारण नहीं है। यह अलग बात है कि इसका मकसद लीपा पोती करना हो सकता है और इसलिए प्रचारित नहीं किया गया हो पर खबर छिपी रही यह तो महत्वपूर्ण है ही।
ऐसे में आज दि एशियन एज की लीड का शीर्षक है, संभल की हिन्सा पर संसद में हंगामा क्योंकि अखिलेश की राय में यह भाजपा की ‘साजिश’ है। हेडलाइन मैनेजमेंट नहीं होता तो यह खबर दूसरे अखबारों में भी लीड हो सकती थी। यहां यह भी उल्लेखनीय है कि 1991 के पूजा स्थल कानून के बावजूद संभल में सर्वेक्षण की इजाजत दिये जाने पर तरह-तरह की चर्चा है और इसलिए भी अखिलेश यादव के आरोप का महत्व है और यह बड़ी खबर है। द टेलीग्राफ ने भी इसे पहले पन्ने पर छापा है। लेकिन आज ही सरकार की तरफ से चीन सीमा पर एलएसी के आस-पास तनाव कम होने की खबर है। खबर के अनुसार विदेश मंत्री एस जयशंकर ने लोकसभा में इसपर बयान दिया। हिन्दुस्तान टाइम्स में यह खबर पहले पन्ने से पहले के अधपन्ने पर लीड है। प्रचार वाली इस और ऐसी दूसरी खबरों के कारण आज एक खबर पिट गई है जो हिन्दुस्तान टाइम्स में लीड है। इसका शीर्षक है, बांग्लादेश ने भारतीय राजदूत को समन किया। यह अगरतला में बांग्लादेश दूतावास में कुछ लोगों के जबरन घुस जाने पर है। द टेलीग्राफ की खबर के अनुसार इस मामले में सात लोगों को गिरफ्तार किया गया है और दो पुलिस वालों के खिलाफ भी कार्रवाई हुई है।
द हिन्दू में इससे संबंधित खबर, अगरतला दूतावास पर हमले के लिए बांग्लादेश ने भारतीय प्रतिनिधि को समन किया – सकेंड लीड है और फर्स्ट लीड वही जो जयशंकर ने कहा है। टाइम्स ऑफ इंडिया अभी महाराष्ट्र से बाहर नहीं निकला है और आज की इसकी लीड का शीर्षक है, फडणविस के आकर मिलने के बाद शिन्दे उप मुख्यमंत्री होने के लिये तैयार हो गये। यहां विदेश मंत्री का बयान सेकेंड लीड है। इंडियन एक्सप्रेस में भी आज जयशंकर और महाराष्ट्र की खबर क्रम से लीड और सेकेंड लीड है। यहां सिंगल कॉलम में एक खबर है, उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान से कहा, क्या किसानों से कोई वादा था, यह पूरा क्यों नहीं हुआ? आप जानते हैं कि किसानों से किसका वादा था, कब किया गया था और किसने किस स्थिति में किया था। उस समय के कृषि मंत्री पर क्या आरोप थे और मौजूदा व्यवस्था में इसे पूरा करना किसकी जिम्मेदारी और योग्यता-क्षमता है। फिर भी सवाल कृषि मंत्री से पूछा जाना और कोई जवाब नहीं होना ज्यादा बड़ी खबर है। यह सब तब जब नवोदय टाइम्स की खबर के अनुसार, किसानों को प्रेरणा स्थल से हटाया गया और जेल भेज दिया गया है। गिरफ्तार किसानों में महिलायें भी शामिल हैं। जाहिर है, उपराष्ट्रपति ने खुद को किसानों का शुभचिन्तक दिखाने की कोशिश की पर किसानों को कोई लाभ नहीं हुआ।
अंग्रेजी अखबारों में कोलकाता के टेलीग्राफ की लीड बांग्लादेश की है। इसका एक हिस्सा तो बता ही दिया। मूल खबर, चिन्मय कृष्ण दास को जमानत नहीं मिलने और इसका कारण अदालत में उनके लिए वकील न होने तथा इस कारण डराने-धमाकाने के आरोप तथा मानवाधिकार उल्लंघन की खबर है। सीधे-सीधे हिन्दू-मुसलमान नहीं किया गया जो अंग्रेजी अखबारों में लगभग नहीं होता है। अमर उजाला की लीड का शीर्षक है, “मोहम्मद युनूस हैं बांग्लादेश में हिन्दुओं के कत्लेआम के मास्टरमाइंड : शेख हसीना”। यह दिलचस्प है कि उत्तर प्रदेश के इस प्रमुख अखबार में संभल का मामला (जो दि एशियन एज में है) पहले पन्ने पर नहीं है और बांग्लादेश या शेख हसीना के आरोप के आधार पर खबर लीड है। बाकी खबरें भी सरकारी प्रचार वाली हैं। हालांकि, अगरतला मामले में यहां चार पुलिस वालों के खिलाफ कार्रवाई की खबर है। लेकिन बांग्लादेश ने राजदूत को तलब किया – नहीं है। एक और खबर का शीर्षक है, महाराष्ट्र में भाजपा विधायक दल की बैठक आज, शपथग्रहण कल। यही नहीं, लीड के ऊपर छह कॉलम क खबर का शीर्षक है, अंग्रेजों के कानून से मुक्ति…. भ्रष्टाचार-आतंकवाद के खिलाफ मजबूत होगी लड़ाई। उपशीर्षक है, पीएम मोदी ने तीन नये आपराधिक कानूनों के सफल कार्यान्वयन को राष्ट्र को किया समर्पित, संविधान के आदर्शों को साकार करने की दिशा में ठोस कदम बताया। नवोदय टाइम्स की लीड का शीर्षक है, संसद चली, हंगामा भी चला। रोज की इन खबरों और इनकी इस प्रस्तुति से आप समझ सकते हैं कि सरकार कैसे चल रही है उसकी प्राथमिकताएं क्या हैं, अखबार क्या बताते हैं और क्या छिपाते हैं। इसी क्रम में आज नवोदय टाइम्स की एक खबर के अनुसार, शहीद की विधवा को पेशन के खिलाफ अपील पर केंद्र सरकार को 50 हजार का जुर्माना किया गया है और यह सुप्रीम कोर्ट ने किया है। खबर के अनुसार, केंद्र सरकार ने सशस्त्र बल न्यायाधिकरण के आदेश के खिलाफ अपील की थी। यह मामला जम्मू कश्मीर में आतंकवाद रोधी गश्त के दौरान शहीद हुए एक सैनिक की विधवा को उदारीकृत पारिवारिक पेंशन (एलएफपी) देने का आदेश दिये जाने का है। किसी (सैनिक की हिन्दू) विधवा को पेंशन के मामले में एक न्यायाधीकरण के आदेश को केंद्र सरकार द्वारा चुनौती देने की मानसिकता और सोच ही इस सरकार की प्राथमिकताओं को संदेह के घेर में डालती है और यह सवाल उठता है कि यह सरकार आखिर करना क्या चाहती है और कैसे? निष्पक्ष मीडिया यह काम अच्छे से कर सकता था पर उसे पंगु बना दिया गया है।


