‘आजतक’ के पत्रकार नवीन कुमार को दिल्ली पुलिस ने बुरी तरह पीटा, मीडियाकर्मी स्तब्ध

Ravish Kumar : बहुत दुखद है। दिल्ली पुलिस को क्या हो गया है। इतनी सी बात पर नवीन कुमार को इतना मारा ? कोई तो बताएगा कि वह क्या है. ख़ासकर तब जब लॉक डाउन है। इसमें पत्रकार को छूट है तो वो बताएगा ही पत्रकार है इसलिए निकला है। इतनी बात पर इतना मारा गया। शर्मनाक है। पुलिस को क्या हो गया है। आज तक के नवीन कुमार के साथ जो हुआ है पढ़कर मन दुखी हो गया है। आप भी पढ़िए नवीन ने अपने साथ हुए घटनाक्रम पर क्या कुछ लिखा है-

Navin Kumar : प्यारे साथियों, इस तरह से यह पत्र लिखना बहुत अजीब सा लग रहा है। लेकिन लगता है कि इस तरह से शायद मेरा दुख, मेरा क्षोभ और वह अपमान जिसकी आग मुझे ख़ाक कर देना चाहती है उससे कुछ हद तक राहत मिल जाए। एक बार को लगा न बताऊं। यह कहना कि पुलिस ने आपको सड़क पर पीटा है कितना बुरा एहसास है। लेकिन इसे बताना जरूरी भी लगता है ताकि आप समझ सकें कि आपके साथ क्या कुछ घट सकता है। वह भी देश की राजधानी में।

कोरोना से लड़ाई में मेरे सैकड़ो पत्रकार साथी बिना किसी बहाने के भरसक काम पर जुटे हुए हैं। मैं भी इसमें शामिल हूं। आज दोपहर डेढ़ बजे की बात है। मैं वसंतकुंज से नोएडा फिल्म सिटी अपने दफ्तर के लिए निकला था। सफदरजंग इन्क्लेव से होते हुए ग्रीन पार्क की तरफ मुड़ना था। वहीं पर एक तिराहा है जहां से एक रास्ता एम्स ट्रॉमा सेंटर की तरफ जाता है। भारी बैरिकेडिंग थी। पुलिस जांच कर रही थी। भारी जाम लगा हुआ था। मेरी बारी आने पर एक पुलिसवाला मेरी कार के पास आता है। मैंने नाम देखा ग्यारसी लाल यादव। दिल्ली पुलिस। मैंने अपना कार्ड दिखाया और कहा कि मैं पत्रकार हूं और दफ्तर जा रहा हूं। मेरी भी ड्यूटी है। उसने सबसे पहले मेरी कार से चाबी निकाल ली। और आई कार्ड लेकर आगे बढ़ गय। आगे का संवाद शब्दश: तरह था।

कॉन्स्टेबल ग्यारसी लाल यादव – माधर&^%$, धौंस दिखाता है। चल नीचे उतर। इधर आ।

मैं पीछे पीछे भागा। उसने दिल्ली पुलिस के दूसरे सिपाही को चाबी दी। मेरा फोन और वॉलेट दोनों बगल की सीट पर रखे थे। मैंने कहा आप ऐसा नहीं कर सकते। अपने अधिकारी से बाद कराइए।

कॉन्स्टेबल ग्यारसी लाल यादव – मैं ही अधिकारी हूं माधर^%$।

मैंने कहा आप इस तरह से बात नहीं कर सकते। तबतक उसने एक वैन में धकेल दिया था। मैंने कहा मोबाइल और वॉलेट दीजिए। तबतक दो इंस्पेक्टर समेत कई लोग वहां पहुंच चुके थे। एक का नाम शिवकुमार था, दूसरे का शायद विजय, तीसरे का ईश्वर सिंह, चौथे का बच्चा सिंह।

मैंने कहा आप इस तरह नहीं कर सकते। आप मेरा फोन और वॉलेट दीजिए।

तब इंस्पेक्टर शिवकुमार ने कहा ऐसे नहीं मानेगा मारो हरामी को और गिरफ्तार करो।

इतना कहना था कि तीनों पुलिसवालों ने कार में ही पीटना शुरू कर दिया। ग्यारसी लाल यादव ने मेरा मुंह बंद कर दिया था ताकि मैं चिल्ला न सकूं। मैं आतंकित था।

आसपास के जिन गाड़ियों की चेकिंग चल रही थी वो जुटने लगे तो पुलिस ने पीटना बंद कर दिया। मैं दहशत के मारे कांप रहा था। मैंने अपना फोन मांगा। तो उन्होंने मुझे वैन से ही जोर से धक्का दे दिया। मैं सड़क पर गिर पड़ा। एक आदमी ने मेरा फोन लाकर दिया। मैंने तुरंत दफ्तर में फोन करके इसके बारे में बताया।

मैंने सिर्फ इतना पूछा कि आपलोग किस थाने में तैनात हैं। इंस्पेक्टर शिव कुमार ने छूटते ही कहा तुम्हारे बाप के थाने में। ग्यारसी लाल यादव ने कहा- हो गया या और दूं। उन्हीं के बीच से एक आदमी चिल्लाया- सफदरजंग थाने में हैं, बता देना अपने बाप को।

कार में बैठा तो लगा जैसे किसी ने बदन से सारा खून निचोड़ लिया हो। मेरा दिमाग सुन्न था। आंखों के आगे कुछ नजर नहीं आ रहा था। समझ नहीं पा रहा था कि इतने आंसू कहां से आए।

मुझे पता है कि जिस व्यवस्था में हम सब जीते हैं वहां इस तरह की घटनाओं का कोई वजूद नहीं। मुझे यह भी पता है कि चौराहे पर किसी को पीट देना पुलिस की आचार संहिता में कानून व्यवस्था बनाए रखना का एक अनुशासन है। और मुझे यह भी पता है कि इस शिकायत का कोई अर्थ नहीं।

फिर भी मैं इसे इसलिए लिख रहा हूं ताकि यह दर्ज हो सके कि हमारे बोलने, हमारे लिखने और हम जिस माहौल में जी रहे हैं उसमें कितना अंतर है। हमारी भावनाएं कितने दोयम दर्जे की हैं। हमारे राष्ट्रवादी अनुशासन का बोध कितना झूठा, कितना मनगढ़ंत और कितनी बनावटी हैं।

यह सबकुछ जब मैं लिख रहा हूं तो मेरे हाथ कांप रहे हैं। मेरा लहू थक्के की तरह जमा हुआ है। मेरी पलकें पहाड़ की तरह भारी हैं और लगता है जैसे अपनी चमड़ी को काटकर धो डालूं नहीं तो ये पिघल जाएगी। अपने आप से घिन्न सी आ रही है।

यह सब साझा करने का मकसद आपकी सांत्वना हासिल करना नहीं। सिर्फ इतना है कि आप इस भयावह दौर को महसूस कर सकें। जब हमारी नागरिकता का गौरवबोध किसी कॉन्स्टेबल, किसी एसआई के जूते के नीचे चौराहे पर कुचल दी जाने वाली चीज है।

मैं शब्दों में इसे बयान नहीं कर सकता कि यह कितना अपमानजनक, कितना डरावना और कितना तकलीफदेह है। ऐसा लगता है जैसे यह सदमा किसी चट्टान की तरह मेरे सीने पर बैठ गया है और मेरी जान ले लेगा। और यह लिखना आसान नहीं था।

आपका साथी
नवीन

एनडीटीवी के रवीश कुमार और आजतक के नवीन कुमार की एफबी वॉल से.

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Comments on “‘आजतक’ के पत्रकार नवीन कुमार को दिल्ली पुलिस ने बुरी तरह पीटा, मीडियाकर्मी स्तब्ध

  • uttam agrawal says:

    नवीन कुमार की कहानी में असली पहलू छूट ही गया ,
    कांस्टेबल कैसे अचानक लंबे कतार में खड़ी एक कार पर ही हमला करेगा
    पुलिस गुंडई करती है ,लेकिन एक हद के बाद ,अचानक से कॉन्स्टबल क्यों चीखा की धौंस दिखा रहा है
    एक बनाई हुई कहानी पर पत्रकार वर्ग का समर्थन लेना देख कर वकीलों का बार असोसिएशन याद आ गया
    ये लोग खुद को जनता नही समझते
    न पुलिस न ये
    मुझे कोई अनुभव तो नही है
    लेकिन जब शुरआती दिनों में फेसबुक पर लिखना शुरू किया तो ऐसे कुछ पत्रकारों की दीवार पर लिखा
    हैरान हो जाता था
    जब पत्रकार और उनके मित्र पत्रकार मुझे बुरी तरह फटकार देते थे और जबरदस्त तंज करते थे कि उनके आगे ज्ञान न बांटे
    तब एहसास हुआ कि ये पत्रकार वर्ग सत्ता के नज़दीक रह कर खुद को ओहदेदार समझने लगते हैं
    शायद भड़ास का जन्म भी सत्ता और मीडिया के खेल को पर्दाफाश करने के लिए ही हुआ है
    उम्मीद है कि ऐसी स्टोरी करते वक़्त पूरी छानबीन की जाए ,सिर्फ एक फेसबुक पोस्ट से विचलित होकर आगे न करे

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  • Bhaiya Naveen Ji

    1. AAp ke channel ka sahyog aap ko prapt kyon nahi ho raha ?
    2. Hamare Bada Pradhan se sidhe sampark rakhne wale AAP KE CHANNEL KE veer or veerangna reporters kahan hai.
    3. Sri Amit Shah ko sidhe taur par is jyadti ke liye PURI Ji ne apna virodh darj karaya ya nahi . Kahin wo sarkari vigyapan ke bhar se dab to nahi gaye hain.

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  • मोहन says:

    कितनी बिडम्बना है कि पिटाई में कुछ साथी खबर खोज लेते है..नवीन कुमार को मै नहीं जानता लेकिन उनके वीओ शानदार होते है अगर वही है तो बेहद दुखी करने वाली घटना है..पत्रकारिता से पत्रकार इतना जलता क्यों मुझे समझ में नही आता पुलिस पुलिस है कभी लपेटे में आयेंगे तो पता चलेगा लेकिन भगवान करे ऐसा न हो जो कुछ हुआ बेहद खराब है लेकिन देश इस समय भयंकर त्रासदी के द्धार पर खड़ा है इस लिए हमे समर्थन करना ही पड़ेगा अपने लिए अपने परिवार के लिए अपने वतन के लिए लेकिन नवीन जी जो त्रासदी आप झेल रहे है आपका काम का तरीका अपके संस्थान के प्रति निष्ठा का इनाम आदमी नहीं ईश्वर देगा संतोष रखे …

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