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राजेश अवस्थी आत्महत्या मामला : पत्रकारिता में आने वाली नई पौध से कुछ जरूरी अपील!

दिनेश पाठक-

यह संयोग ही है कि कल से आज तक जितनी बार फोन पर फेसबुक एप खोला राजेश अवस्थी जी के असमय जानें कि खबर किसी न किसी रूप में नुमाया हुई। मैं उनसे कभी मिला नहीं हूँ और न ही उनके साथ कभी काम किया है लेकिन पत्रकारिता जैसे पेशे में एक बहुत लंबा समय गुजारने की वजह से सहज उनकी स्थितियों को महसूस कर पा रहा हूँ।

रात साथी, मित्र, भाई Sanjay Srivastava जी की पोस्ट देखी, जिसमें उन्होंने लिखा है कि अवस्थी जी लखनऊ से मेरठ आये और यहीं के होकर रह गए। पत्रकारिता में लंबा समय देने के बावजूद वे चीफ सब एडिटर के पद से रिटायर हो गए। संजय जी ने यह भी लिखा है कि आजकल ज्यादातर पत्रकारों की सैलरी 40-50 हजार महीना के बीच सिमटी हुई है।

इस मँहगाई के जमाने में 40-50 हजार महीना कमाने वाला व्यक्ति औसत शहर में बमुश्किल रोटी तो खा लेगा लेकिन इमरजेंसी के लिए वह आमतौर पर खाली हाथ ही होता है।

मैंने पत्रकारिता में छोटे से स्टाफ रिपोर्टर से लेकर रेजिडेंट एडिटर तक की भूमिका अदा की है। हिंदुस्तान जैसे बड़े अखबार में रहा। कहने की जरूरत नहीं है कि इतने पैसे मिल जाते थे कि कर्ज लेने की जरूरत नहीं पड़ी। बच्चों की पढ़ाई-लिखाई भी हुई। लेकिन जैसे ही दोनों बच्चों ने एमबीए में एडमिशन लिया, कर्ज मुझे भी लेना पड़ा।

मुझे आज की अपनी नई पौध से कहना यह है कि अगर आपको पत्रकारिता ही करना है तो करिये। शौक से करिये लेकिन कुछ जरूरी काम जरूर करिये।

  • कम उम्र में एक हेल्थ इंश्योरेंस ले लें। साल-दर-साल जैसे-जैसे कुछ पैसे बढ़ें थोड़ा प्रीमियम बढ़ाकर कवर भी बढ़ाते रहें। संकट के समय यह बेहद मददगार टूल साबित होगा।
  • एक टर्म इंश्योरेंस अपनी क्षमता के अनुरूप ले लें। यह भी काम का साबित होगा।
  • अपनी इनकम का 80 फीसद खर्च कर दें लेकिन 20 फीसदी हिस्सा जरूर बचाकर एसआईपी, इंश्योरेंश आदि में निवेश करते रहें।
  • पत्रकारिता के झूठे औरा को अपने पास न आने दें। कोई फायदा नहीं है।
  • जीवन की डोर बहुत छोटी है। सेहत का ध्यान रखें। घर का बना भोजन करें।
  • पत्रकारिता का शौक जैसे ही पूरा हो जाये, और मौका मिले तो किसी और पेशे में शिफ्ट कर लें। कुछ नया सीखते रहेंगे तो यह काम आसान हो जाएगा।

मेरे सुझाव को अन्यथा न लें। अनुभव के आधार पर लिखा है। मैंने अखबार, डिजिटल और बहुत कम समय के लिए टीवी में एडिटर के रूप रहा। मुझे फिलहाल जिंदगी से कोई शिकायत नहीं है।

मैंने 47 साल की उम्र में हिंदुस्तान अखबार के एडिटर की कुर्सी छोड़ी थी। निकाला नहीं गया था। मुझे यह एहसास हो गया था कि पत्रकारिता अब मेरे लिए नहीं नहीं है। मैंने अपने लिए नया रास्ता चुना।

आज मैं लगभग 59 को होने वाला हूँ। स्वस्थ हूँ। खुश हूँ। बीते 10-11 साल से शाम को आठ बजे तक भोजन कर लेता हूँ। सुबह नौ बजे नाश्ता कर लेता हूँ। 10 बजे सो जाता हूँ। सुबह 6-7 बजे तक ही उठता हूँ। पत्रकारिता से कम मेहनत करके आप किसी भी दूसरे काम में अपनी जरूरत पूरी कर सकते हैं।

मैं पत्रकारिता में अपने मन से आया था और खुद से बाहर निकल कर अपने मन का काम कर रहा हूँ। अलग अलग सेक्टर में काम करते हुए अपनी जरूरतें पूरी कर ले रहा हूँ।

मैंने आत्मप्रशंसा में अपनी कहानी नहीं बताई। सुझाव अनुभव के आधार पर दिए। प्रभु की इच्छा पर अपना वश नहीं है लेकिन हम सतर्क तो रह ही सकते हैं।

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