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सुख-दुख

पत्रकार राजेश अवस्थी सुप्रीम कोर्ट के जज होते तो 65 वर्ष तक नौकरी करते, और पीएम होते तो…

सुरेंद्र किशोर-

आर्थिक दुर्दशाग्रस्त पत्रकार की आत्म हत्या की पृष्ठभूमि में देश के ईमानदार पत्रकारों की रक्षा कौन करेगा?

मेरी पक्की आय 1231 रुपए मासिक (पीएफ पेंशन) है, परिवार का साथ नहीं होता तो क्या मैं भी अवस्थी की राह पर चले जाने को मजबूर हो जाता? पता नहीं!

सुप्रीम कोर्ट के जज की सेवा निवृति की आयु 65 साल है। आज भारतीयों की जीवन प्रत्याशा करीब 78 साल है। 1947 में जीवन प्रत्याशा 32 साल थी तो सरकारी सेवा से तब लोग 55 साल की उम्र में रिटायर करते थे। आज उस अनुपात में अवकाश ग्रहण की आयु क्यों नहीं बढ़ रही है?

मैं सन 2005 में अखबार की सेवा से रिटायर कर गया। पर आज भी मैं उतने ही घंटे काम करता हूं क्योंकि मैं अब भी शारीरिक रूप से सक्षम हूं। भाजपा ने तो अपने लोगों के लिए अधिकतम आयु रखी है–75 साल। उसके बाद ही सलाहकार मंडल! पर सरकारी सेवक 60 साल की उम्र में ही रिटायर कर दिए जाते हैं।

पत्रकार अवस्थी ने जब आत्म हत्या की, उस समय उनकी उम्र 65 साल थी। यदि वे सुप्रीम कोर्ट के जज होते तो 65 साल तक नौकरी करते। फिर तो उनके सामने आत्म हत्या करने की नौबत ही नहीं आती। क्योंकि तब तक वे अपनी पारिवारिक जिम्मेवारियां पूरी कर चुके होते।

अवकाश प्राप्त पत्रकारों की पेंशन, प्रोविडेंट फंड से जुड़ी होती है। मुझे भी 1231 रुपए हर माह मिल जाते हैं। इसमें कोई बढ़ोतरी नहीं। मुझे जो राशि सन 2005 में मिलनी शुरू हुई थी, वही राशि आज भी मिलती है। मैंने 27 साल तक पीएफ वाली नौकरी की है। बिहार सरकार की ओर से मिल रही पेंशन के लिए आवदेन पत्र तैयार कर रहा हूं। देखना है कि मुझे पेंशन लायक समझा जाता है या नहीं!

मुझे मालूम था कि पत्रकारों को 58 साल के बाद ‘‘कार सेवक’’ यानी ‘‘स्वयंसेवक’’ यानी ‘‘फ्रीलांसर’’ बनना पड़ेगा। इसीलिए मैंने बहुत पहले से ही अपना संपन्न पुस्तकालय-सह संदर्भालय विकसित करना शुरू कर दिया था।

उसके सहारे मैं फ्रीलांसर व पुस्तक लेखन के काम सफलतापूर्वक कर लेता हूं। पर, एक अखबार से जुड़े दलित-उपेक्षित प्राणी का नाम है–फ्रीलांसर। एक अखबार के प्रबंधन ने बीस साल पहले मेरे प्रत्येक लेख का जो 1000 रुपए तय किया था, वही राशि आज भी मिलती है, बढ़ी नहीं। अखबारों के बाकी लोगों के वेतन-भत्ते में इस बीच कितनी बढ़ोतरी हुई होगी, उसकी कल्पना कर लीजिए। इसलिए भी मैं गांव की अपनी खेती को विकसित कर रहा हूं ताकि कुछ अतिरिक्त आय हो सके।

प्रधान मंत्री पीवी नरसिंह राव के शासन काल में अनोखी पीएफ पेंशन योजना शुरू हुई। इसमें बढ़ोतरी का कोई प्रावधान ही नहीं। न्यूनतम हजार रुपए मासिक। क्या इस पेंशन योजना का नाम किसी ने अब तक गिन्नीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में दर्ज करवाया या नहीं! नहीं करवाया तो करवा ही दीजिए।

प्रधान मंत्री नरसिंह राव पर शेयर दलाल हर्षद मेहता से एक करोड़ रुपए ले लेने का आरोप लगा था। इससे उनकी काफी बदनामी हुई। उनकी बदनामी को प्रचारित करने में मीडिया का भी हाथ था। क्या इसीलिए श्रमजीवी पत्रकारों के लिए इतनी कम पेंशन राशि राव साहब ने तय करा दी ताकि वे उस अनोखे प्रधान मंत्री को जीवन भर याद रखें?

हां, राव साहब ने सांसदों के लिए, अपवादों को छोड़कर उनके प्रत्येक कार्यकाल के लिए एक करोड़ रुपए की अघोषित व्यवस्था जरूर करा दी। यानी मेरी नाक एक करोड़ के लिए कटी तो तुम्हारी भी उतनी ही राशि के लिए कटे। नरसिंह राव ने वित्त मंत्री मनमोहन सिंह के सख्त विरोध के बावजूद एक करोड़ रुपए सालाना का सांसद फंड शुरू किया। तब सरकारी कमीशन की राशि 20 प्रतिशत थी।

यानी अपवादों को छोड़कर प्रत्येक सांसद के पूरे कार्यकाल में एक करोड़ रुपए का इंतजाम। पर अब तो वह फंड 5 करोड़ रुपए सालाना का है। उस पर केंद्रीय मंत्री जीतन राम मांझी का बयान आ चुका है–कहते हैं कि सारे सांसद कमीशन लेते हैं, मैं भी लेता हूं। हालांकि मेरी खबर है कि कुछ सांसद आज भी नहीं लेते।

बिहार सरकार ने पत्रकारों के लिए जो पेंशन योजना शुरू की, उसमें कड़ी शर्त है–कहीं अन्य से कोई राशि मिल रही है तो पत्रकार पेंशन नहीं मिलेगी। यह बंधन पूर्व विधायक जो पूर्व शिक्षक भी रहे, पर लागू नहीं है। वे दोनों जगहों से पेंशन लेते हैं।

जो एक दिन के लिए भी विधायक बना, उसे भी पूरी पेंशन मिलती है। पर 19 साल तक पत्रकार रहने के बावजूद बिहार सरकार उसे पेंशन नहीं देगी। उस 20 साल पूरा करना पड़ेगा।

मेरे एक मित्र पत्रकार को पत्रकार पेंशन इसलिए नहीं मिली क्योंकि उन्हें जेपी सेनानी पेंशन मिलती है। 2005 की फरवरी में बिहार विधान सभा का चुनाव हुआ था। वह विधान सभा विधिवत गठित होने से पहले ही भंग हो गई। पर उसके पूर्व सदस्य भी पेंशन पाते हैं। यह सब समानता के अधिकार के संवैधानिक प्रावधान के खिलाफ है।

राजेश अवस्थी की आत्म हत्या के बाद मैं यह सब लिखने को बाध्य हो गया। इससे नाराज होकर भले बिहार सरकार पेंशन वाले मेरे आवेदन पत्र को खारिज कर दे। मुझे मंजूर होगा, पर राजेश अवस्थी व उनके आश्रितों की पीड़ा मुझ पर फिलहाल हावी है। मैं अवस्थी में खुद को देखता हूं।

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