अभिषेक श्रीवास्तव-
इधर बीच कुछ अच्छी फिल्में ओटीटी पर आई हैं। वीकेंड है, तो सोचा सिनेप्रेमी दोस्तों से साझा किया जाय।
पहले निशानची देखिए। दोनों पार्ट। अनुराग कश्यप की आत्मा वैसे तो गैंग्स ऑफ वासेपुर में फंसी पड़ी है, लेकिन फिल्म को वे दोहराव और बोरियत से निकाल पाने में कामयाब रहे हैं। समस्या केवल एक है कि समय की तासीर इतनी तेजी से बदली है कि आज के एनिमल-प्रेमी दर्शकों को कस्बाई प्रेम और हिंसा पच नहीं पाती। वासेपुर इसलिए चली कि उसमें सब कुछ था और शायद प्रयोगात्मक भी। प्रयोग यहां भी है। विजय लाल यादव अंग्रेजी में बिरहा गा रहे हैं (डियर कंट्री, तस्वीर में बिरहा से एक शॉट)। गाते गाते वे टेरी लगाते हैं तो मन खुश हो जाता है, लेकिन अफसोस कि नए दर्शक की सेंसिटिविटी इसे पकड़ नहीं पाती। अनुराग कश्यप ने शानदार स्टारकास्ट के साथ वाकई एक अच्छी फिल्म दी है, नहीं चली ये अलग बात है।
हिंदी में और कुछ खास नहीं है देखने के लिए। Delhi Crimes का नया सीजन औसत है। कल रात Family Man का तीसरा सीजन आया है, ठीक ही लग रही है। कुछ लोगों ने बारामूला का जिक्र किया था। अव्वल तो मानव कौल को यह फिल्म करने की जरूरत नहीं थी, उनकी जगह कोई और चल जाता क्योंकि उनके मुंह से एक भी संवाद स्थानीय भाषा में नहीं है। उनका विशिष्ट अभिनय इस फिल्म में निकल कर आ ही नहीं सका है। कहानी आधे के बाद लचर है। आज के कश्मीर पर इससे बेहतर या इससे खराब फिल्म नहीं बन सकती, इसलिए माफ है।
अंग्रेजी में दो शानदार फिल्में हैं। एक जूलिया रॉबर्ट्स की After the Hunt है, जिसे महिला हिंसा के बदलते मुहावरे के संदर्भ में देखा जाना चाहिए। स्लो है, संजीदा है, मनोवैज्ञानिक है। इसके संवाद दर्शन और दार्शनिकों के उद्धरणों से लदे हुए हैं। इसलिए सतर्क होकर देखेंगे तो रस आएगा। दूसरी अंग्रेजी सीरीज है The Beast in Me, जिसका नायक (या खलनायक) देखने में हूबहू एलन मस्क जैसा है। उसकी बातें और जीवनशैली भी मस्क जैसी लगती है। बोधिसत्व की अवस्था (यदि होती हो तो) और निरंकुश हिंसा के बीच जो साम्य है, उसका बेहतरीन उदाहरण यह चरित्र है।
Frankenstein अब तक बहुत से लोग देख ही चुके होंगे। हां, आप में से यदि कुछ लोगों ने कभी एंथनी हॉपकिंस की The Father न देखी हो तो जरूर देख लीजिए, प्राइम पर मौजूद है। मैंने तीसरी बार देखी। और सबसे जरूरी, आपमें से जिसकी दिलचस्पी डिस्टोपियन फिल्मों में है वे Pluribus जरूर देखें। एप्पल टीवी पर है। इसके तीन एपिसोड आ चुके हैं। हर हफ्ते शुक्रवार को नया आता है। आज चौथा आ गया है। मैं देखने जा रहा हूं। फिर बची खुची फैमिली मैन निपटानी है। मार्को पोलो भी आधे में पड़ी है।
मुद्रा-उत्पादक कामधाम न होने पर खुद को बचाए रखने के लिए ये सब करना पड़ता है। किताब पढ़ना, सिनेमा देखना, हमारे जैसे खाली लोगों के लिए एक मुकम्मल काम है। किसी दिन मूड करेगा और खाली रहा तो इस साल पढ़ी किताबों पर भी चर्चा करूंगा। अब शीतनिद्रा में जाने का समय भी आ रहा है। जल्द ही हर साल की तरह सालाना विदाई पोस्ट होगी, और डिटॉक्स के नाम पर महीने भर के लिए फेसबुक बंद।



