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उत्तर प्रदेश

पंकज चौधरी का कहीं एके शर्मा वाला हाल न हो जाए!

राजशेखर त्रिपाठी-

पंकज चौधरी के यूपी BJP अध्यक्ष बनने के बाद योगी के साथ उनके समीकरण पर मेरा नज़रिया। आँख पर ज़ोर न पड़े इसलिए टेक्सट नीचे दे दिया है। डिमांड Shreesh K Pathak की थी..लेकिन सबके काम की बात है! अपनी राय भी दें।

कहीं एके शर्मा वाला हाल न हो जाए पंकज चौधरी का….

यूपी की राजनीति पर पैनी निगाह रखने वाले राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली के वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक राजशेखर त्रिपाठी का कहना है कि यूपी में पंकज चौधरी को प्रदेश अध्यक्ष बनाकर अमित शाह ने जाने-अनजाने दो पावर सेंटर खड़े करने की कोशिश की है। शाह अपनी रणनीति में कितने कामयाब हैं, ये तो वक्त बताएगा। जो लोग सीएम योगी के बाद अध्यक्ष चौधरी को देख अचानक पूर्वांचल को यूपी की राजनीति के सेंटर में देख रहे हैं, वे भी मुगालते में हैं। एक ही इलाक़े से होकर भी कभी चौधरी और योगी एक दूसरे की गुडबुक में नहीं रहे।

पंकज राजनीति में योगी के सीनियर भी हैं। उन्होंने अपनी राजनीति बतौर पार्षद शुरू की और उसी कार्यकाल में डिप्टी मेयर भी बन गये। मज़े की बात ये है कि ये महानगर था वही गोरखपुर, जहां से योगी सांसद रहे। फिर सीएम बनने के बाद अब सदर विधायक हैं। पंकज पहली बार 1991 में महाराजगंज से सांसद बने और अब सातवीं बार के सांसद हैं। ये दो बार हारे भी, जिनमें एक बार तो कांग्रेस प्रवक्ता सुप्रिया श्रीनेत के पिता हर्षवर्धन से।

मगर योगी 1998 से 2017 तक निर्बाध गोरखपुर से सांसद रहे। योगी के पास गोरक्षपीठ और हिंदुत्व की सियासत दोनों है। होने को तो पंकज चौधरी के पास भी उनका खानदानी कारोबार गोरखपुर में है। गोरखपुर से डिप्टी मेयर बनने के बाद भी चौधरी को सांसदी के लिए 100 किमी दूर महाराजगंज जाना पड़ा, क्योंकि उन्हें पता था ये सीट मंदिर के लिए रिजर्व है। बड़े महराज जी (अवेद्य नाथ जी) के बाद योगी दावेदार होंगे।

अब जिन कुर्मी वोटों के लिए पंकज चौधरी को अध्यक्ष बनाना बताया जा रहा है, उन पर योगी के क़रीबी कुर्मी नेता स्वतंत्र देव सिंह भी कम प्रभावी नहीं हैं, मगर नेतृत्व उन्हें दूसरी बार अध्यक्ष बनाने को तैयार नहीं था। हालाँकि इसकी बड़ी वजह उनकी योगी से क़रीबी ही थी। योगी के बार-बार स्वतंत्र देव का नाम आगे बढ़ाने पर, उन्हें कन्वे कर दिया गया कि आप नेतृत्व के सुझाए नामों में कमीं बताएं, या इन्हीं में से एक को चुन लें, विशेषाधिकार आपका!

ऐसे में योगी ने पंकज चौधरी को लेस हार्मफुल पाया। उनकी उनकी पत्नी भाग्य श्री चौधरी ने उसी दिन कह दिया कि योगी जी से ख़ास क़रीबी नहीं है, हां धार्मिक कार्यों के लिए मंदिर जाना होता है। मगर पंकज चौधरी ने अध्यक्ष बनते ही जिस तरह योगी के पैर छुए, उसे लोगों ने सरेंडर ही माना। पंकज चौधरी योगी के सामने पावर बैलेंसिंग की हैसियत नहीं रखते।

हां, 2027 के टिकट बंटवारे में अमित शाह के आंख-कान जरूर बने रहेंगे। गनीमत यही रहे कि योगी उनका हाल एके शर्मा वाला न कर दें, जिन्हें केंद्र ने तमाम सपनों के साथ लखनऊ भेजा। मगर योगी ने उन्हें लंबी वेटिंग लिस्ट में डाल दिया।


सत्येंद्र पीएस-

भारतीय जनता पार्टी द्वारा Pankaj Chaudhary जी को अध्यक्ष बनाए जाने का एक अद्भुत लाभ भारतीय जनता पार्टी को हो गया है. ब्राह्मण पत्रकार, ब्राह्मण चिंतक, ब्राह्मण विचारक, ब्राह्मण यू ट्यूबर, ब्राह्मण कम्युनिस्ट, ब्राह्मण भाजपाई और यूँ ही भाजपा के लिए लिहो लिहो करने वाले वाले दुखी ब्राह्मण लोगों को खासी मानसिक राहत मिल गई है.

यह लोग योगी जी के मुख्यमन्त्री रहने से निहायत दुखी थे कि जगह जगह ब्राह्मण का उत्पीड़न हो रहा है. पार्टी के ब्राह्मण विधायक और सांसदों की औकात पालतू जानवर जैसी हो गई है.

पंकज चौधरी ने एक बयान दे दिया कि पार्टी का संविधान किसी भी जाति के विधायकों के सम्मेलन की अनुमति नहीं देता. उपरोक्त दुखी लोगों ने चौधरी और उनकी जाति वालों की बहिनिया महतरिया एक कर दी. 3 दिन तक बेतहाशा गरियाया कि साले कुर्मियों की इतनी औकात हो गई. यह चलाया गया की ब्राह्मण विधायकों के एक साथ बैठने से धरती काँप उठी. दिल्ली हिल गई.. कुर्मियों को इतना पीटा गया कि नागपुर में खून की उल्टियां हुई हैं.

अब मामला शांत है. अहीर पहले से ही औकात में हैं. कुर्मियों को औकात में लाया जा चुका है. दुःखी उत्पीड़ित ब्राह्मण खुश हो चुके हैं. चहुँ ओर अमन चैन है. 2027 में भाजपा सबसे ज्यादा ब्राह्मणों को टिकट देगी, क्योंकि वह कांप उठी है. पंकज चौधरी को औकात दिखाई जा चुकी है कि वह एक टिकट न दे सकते हैं, न काट सकते हैं. इससे ज्यादा खुशी की बात क्या है?

इस तरह की खुशियाँ छोटी नहीं होती. 2017 में नोटबंदी हुई. सबसे ज्यादा खुश दलित थे. किसी के यहाँ कोई कागज जलने का धुआँ उठता था तो खुशी मनाई जाती थी कि पण्डितवा… बाऊ सहेबवा के यहाँ नोट फुंका गयल. उस चुनाव में मेरी व्यक्तिगत इच्छा थी कि बसपा जीत जाए… लेकिन जब गांवों का हाल सुना तो लगा कि बसपा तो गई!

हाँ, मेरा खूंटा वहीं गड़ा हुआ है कि पंकज जी को प्रदेश अध्यक्ष बनाकर Narendra Modi जी कुर्मी वोट कैसे अपनी तरफ खीच पाएंगे? यूपी की नीतिगत पंगुता कैसे दूर होगी, जिससे दलित पिछड़े गरीब लोग तबाह हैं? निर्दोष जनता प्रशासन और पुलिस की पिटाई और भ्रष्टाचार से कैसे बचेगी? यह तो तब होता जब पंकज चौधरी मुख्यमन्त्री बनते!

वैसे, इस समय यूपी के ब्राह्मण पत्रकार, ब्राह्मण यू ट्यूबर, ब्राह्मण कम्युनिस्ट, ब्राह्मण सोसलिस्ट, ब्राह्मण थिंकर, ब्राह्मण धर्मनिरपेक्ष लोगों को एक सुर में लग रहा है कि अभी Pankaj Chaudhary को चाँप दिया तो Narendra Modi डरकर ब्राह्मण मुख्यमन्त्री बना देगा..

ब्राह्मण मुख्यमन्त्री बनने से ऐसा नहीं कि उन्हे कोई लाभ होगा या कोई धर्म निरपेक्ष सरकार बन जाएगी. ऐसा कर रहे लोगों को मानसिक सुख मिल जाएगा कि उनकी जात वाला मुख्यमन्त्री हो गया. सारी मेहनत इसी में लग रही है.

इनकी मासूमियत देखिए. दिल्ली से लेकर यूपी तक के ब्राह्मण पत्रकार एक स्क्रीन शॉट साझा कर रहे हैं कि पंकज चौधरी अपने दिल्ली आवास पर कुछ कुर्मियों से मिले.

क्या इनको यह पता नहीं है कि पार्टी के ब्राह्मण विधायकों या पार्टी के ब्राह्मण नेताओं को बुलाकर अपनी ही पार्टी के खिलाफ साजिश करने और अपनी बिरादरी के किसी व्यक्ति से (जिसका किसी दल से कोई लेना देना भी न हो) आवास पर मुलाकात कर लेने में जमीन आसमान का अंतर है?

लेकिन ये बेचारे दोनों मामलों को इज इक्वल टू करने में लगे हैं. अरे भाई, भाजपा की यही तो पहचान है कि वह अब इस सब लम्पटई से नहीं नेता बदलती, उसके पास अपने सूचना के सोर्स हैं. उनको समझ भी है. एनजीओ वाले भाजपा नहीं चला रहे हैं. यूपी बिहार मे इतना गन्दा माहौल है कि जिस तरह भाजपा ने मुस्लिम को अस्वीकार्य बना दिया है, वैसे ही ब्राह्मण भी अस्वीकार्य बन गए है. कोई दल मुस्लिम वोट बैंक की बात करेगा तो वह तेल बेचने चला जाएगा, उसी तरह कोई ब्राह्मण वोट बैंक की बात किया तो उसके खिलाफ एक सेंटीमेंट बन जाता है.

मजे की बात यह है कि भाजपा के किसी नेता को पंकज चौधरी को दिक्कत नहीं है. ब्राह्मण विचारकों, ब्राह्मण पत्रकारों, ब्राह्मण धर्म निरपेक्षों को पंकज चौधरी से बड़ी समस्या है. उनको लगता है कि पंकज चौधरी कि हंटिंग करके वह योगी को किसी ब्राह्मण नेता से रिप्लेस करा देंगे.

अब मसला यह है कि कांग्रेस होती तो यह अब तक हो गया होता. लेकिन मोदी शाह थोड़े से शातिर हैं. वो ऐसा करेंगे, इसमें संदेह है. और अभी जो भाजपा के ब्राह्मण नेता महत्त्वकांक्षा मे उड़ रहे हैं, शायद उनकी राजनीति ही खत्म हो जाएगी अब. यही तरीका भी है भाजपा को बचाने का.

वैसे सपा सबसे मजे में है. लोकसभा चुनाव में उसने जो कमाल किया है, उसे जीत का सूत्र मिल गया है. अभी तक तो सपा का कोई जिम्मेदार इंसान गड़बड़ नहीं कर रहा है. सपा वाले केवल देख रहे हैं कि भाजपा में क्या क्या हो रहा है! मेरा अनुमान अभी भी यही है कि सपा सही जा रही है.


उत्तर प्रदेश में बहुत मजेदार स्थिति चल रही है. अभी एक ब्राह्मण विधायक का दर्द सुना, जो कह रहे थे कि अगली बार टिकट मत दीजिएगा, नहीं बनेंगे विधायक, लेकिन जिस जनता ने हमको चुना है उनके लिए कुछ नहीं कर पा रहे हैं.

तब तक वीरेंद्र सिंह मस्त के बेटे का इंटरव्यू दिख गया… उनके बेटे से तो नहीं मिला, मस्त जी विशुद्ध ईमानदार संघी थे. उनके बेटे ने ब्राह्मण विधायकों की बैठक के खिलाफ चेतावनी जारी करने पर नाराजगी जताई और यूपी में व्याप्त व्यापक प्रशासनिक लूट का जिक्र किया.

इन दोनों स्थितियों का जिक्र मै बार बार करता रहा हूँ कि भाजपा विधायक और सांसद पलिहर के बानर बने हुए हैं. उनको प्रशासन का एक सिपाही भी जुतिया सकता है. यह दर्द एक बार हमारे सांसद रहे ब्रज भूषण शरण सिंह जी ने भी साझा किया था कि विधायक लोग डीएम एसपी के पैर पर गिर रहे हैं.

खैर… मेरा खूंटा वहीं अटका हुआ है कि Pankaj Chaudhary को प्रदेश अध्यक्ष बनाकर Narendra Modi जी स्थिति कैसे संभालेंगे? विधायकों का दर्द है कि प्रशासनिक लूट और पॉलिसी परालिसिस के कारण जनता तबाह है. चौधरी जी तो केवल चेतावनी दे सकते हैं कि पार्टी में जातीय गुटबंदी न हो! वह मुख्यमन्त्री तो नहीं हैं कि प्रशासन को टाइट करें और जनता को लूट से बचाएं.

भाजपा अपनी हालत खराब करती जा रही है यूपी मे योगी जी को बरकरार रखकर. अब तो यूपी में नाहक ही ब्राह्मण बनाम कुर्मी बन गया है. भाजपा के लिए स्थिति यह बन रही है कि
जिंदगी एक है और तलबगार दो
जाँ अकेली मगर, जाँ के हकदार दो
दिल बता पहले किसका करूँ हक अदा
भाजपा को चाहिए कि वह ब्राह्मणों को हक दे दे, मुख्यमन्त्री ब्राह्मण बना दे. योगी जी के विरोधी ब्राह्मण यू ट्यूबर, पत्रकार अब इसी अभियान में लग गए हैं और अमित शाह को डरकर उनकी अभिलाषा पूरी कर देनी चाहिए!

इससे कुर्मियों को अपनी राह चुनने में सहूलियत रहेगी कि वह रो गाकर सपा में बने रहें, जैसा कि लोकसभा में हुआ था. भाजपा जहाँ जहाँ टैनी लड़ाये वहाँ वहाँ सपा उत्कर्ष वर्मा लड़ा दे. हरीश के सामने राम प्रसाद चौधरी को उतार दे, श्रावस्ती में साकेत मिश्र के सामने राम शिरोमणि वर्मा को उतार दे, अंबेडकर नगर में रितेश पाण्डे के सामने लालजी वर्मा को …. वैसे ही विधानसभा में खेल जाए. परिणाम सामने आ जाएगा.

खैर अभी सपा मजे में है. उसको दिक्कत तब होती, जब भाजपा वालों ने पंकज चौधरी को मुख्यमन्त्री बना दिया होता. अभी सपा बीस ही नहीं भाजपा के उन्नीस के मुकाबले पचीस पर है. उसके माथे पर कोई शिकन नहीं है, विशुद्ध रूप से मजे ले रही है.

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