
संजय सिन्हा-
रिंकी के पापा का पाप… खेल का नियम समझिए। आप हर सुबह उठ कर रिंकी के पापा को नहीं याद कर सकते हैं। रिंकी के एक पापा थे। रिंकी की मम्मी को वो पसंद नहीं थे। मम्मी को नहीं पसंद थे, तो बेटी को भी नहीं पसंद थे। मां बेटी ने तय करके उन्हें छोड़ दिया।
अब रिंकी के पापा क्या करते हैं, इसे जानने में रिंकी और रिंकी की मम्मी की दिलचस्पी नहीं होनी चाहिए। क्यों होनी चाहिए?
कुछ साल पहले रिंकी की मम्मी ने रिंकी के लिए नया पापा ढूंढ लिया था और तब से दोनों आराम से हैं। लेकिन अभी भी उस घर में क्या होता है? सुबह उठते ही रिंकी के पापा की बुराई शुरू हो जाती है। “वो ऐसे थे, वो वैसे थे, उन्होंने ये किया था, उन्होंने वो किया था।”
एक दिन संजय सिन्हा रिंकी के घर लंच पर गए थे। पूरे लंच टाइम में वो रिंकी के पापा की खामियां गिनाने में लगी रहीं। मैंने कहा भी, “आपको वो पसंद नहीं थे। आपने उन्हें जीवन से निकाल दिया। फिर उन्हीं की चर्चा क्यों?” छोड़िए उस दावत की याद। खाना तो मिला, गालियां बोनस में मिल गईं।
मैं सोच रहा था, जिसे हमने दिल-दिमाग से निकाल दिया, उसका जिक्र बार-बार क्यों? “गहरी मार कबीर की, दिल से दिया निकाल।”
प्रश्न उठता है कि संजय सिन्हा क्या बताने के लिए भूमिका बांध रहे हैं? हमारे देश में कांग्रेस की सरकार थी। मनमोहन सिंह प्रधान मंत्री थे। दस साल रहे। फिर उनसे (उस पार्टी से ही) हमारा दिल भर गया। हमें वो बुरे लगने लगे। इतने कि हमने उन्हें ज़िंदगी से निकाल दिया।
मसला ये है कि जब भी हम मौजूदा व्यवस्था पर सवाल करते हैं, तो आप तुरंत पुराने हुक्मरान का जिक्र ले आते हैं? क्यों? रिंकी के पापा की तरह सारा दिन उन्हीं की खामियों पर चर्चा?
बात चली थी कि एक पत्रकार को अपने जीवन में सिद्धांत से समझौता नहीं करना चाहिए। पत्रकारिता असल में नौकरी है ही नहीं। पत्रकार का काम होता है खबर बताना, खामी गिनाना, उपाय सुझाना। वो यह कर सकता है, तभी इस विधा में आना चाहिए, नहीं तो सौ काम हैं जो किए जा सकते हैं।
समस्या तब आती है, जब खबर बताने वाला खामी गिनाने की जगह उसे छिपाने लगता है। मेरी कल की पोस्ट पर टिप्पणी करते हुए कई लोगों ने कहा, “संजय जी, कांग्रेस के काल में रिपोर्टिंग करते, फिर देखते कि लेटना किसे कहते हैं?” पूरे जीवन तो हमने कांग्रेस काल में ही रिपोर्टिंग की। कब झुक गए?
सच है कि टीवी चैनलों पर कांग्रेस काल में भी विज्ञापन देने वालों का दबाव रहता था। और मीडिया प्रबंधन उस काल में भी झुकता था। आइए आपको एक सच्ची घटना सुनाता हूं।
एक दिन मेरा बेटा दौड़ता हुआ मेरे पास आया था, “पापा-पापा चॉकलेट में कुछ है।” वो मशहूर कंपनी की चॉकलेट थी। मैंने चाकलेट का पैकेट हाथ में लिया, देखा उसके भीतर लोहे की तार घुसी हुई है। बंद पैकेट के भीतर चॉकलेट में वो बहुत पतली लोहे की तार थी।
मैंने बेटे को चॉकलेट खाने से रोक दिया और अपनी तरफ से चाहा कि कंपनी में इस बात की शिकायत की जाए। शिकायत करनी ही चाहिए थी। छोटा बच्चा चॉकलेट के साथ लोहे की तार खा ले और वो गले में फंस जाए फिर?
वो समय था, जब उस कंपनी के चॉकलेट में कीड़े निकलने की बहुत शिकायत आ रही थी। साल था 2006 और मैं न्यूज चैनल में सीनियर प्रोड्यूसर था। क्योंकि मामला एक मशहूर चॉकलेट कंपनी की खामियों से जुड़ा था तो मैंने अपने यहां बिजनेस खबरों के हेड से संपर्क किया। वो मेरे मित्र थे, इंडियन एक्सप्रेस के समय से।
उन्होंने अपने मातहत काम करने वाले रिपोर्टर को बुलाया और पूरी कहानी बताई। मैं चाहता था कि चाकलेट कंपनी की गड़बड़ियों के खिलाफ खबर टीवी पर दिखलाई जाए, ताकि कंपनी अपने उत्पाद पर ध्यान दे। चॉकलेट खाते हुए कीड़े या तार मुंह में न जाए। लोग सतर्क हों।
रिपोर्टर ने उस चॉकलेट की कंपनी के अधिकारी को फोन किया। कंपनी में हलचल मच गई। कंपनी के अधिकारियों ने तुरंत मुझसे संपर्क किया। “सर आपके घर गिफ्ट हैंपर भिजवा रहे हैं, आप वो चॉकलेट हमारे प्रतिनिधि को दे दीजिएगा, हम मामले की जांच कराएंगे।”
मैं किसी लोभ में नहीं फंसा। मैं रिपोर्टर के संपर्क में था। मेरा जोर खबर दिखला कर लोगों को सतर्क करने पर था, कंपनी चाहती थी कि गिफ्ट हैंपर लेकर जांच उन्हें सौंप दें, ताकि मामला जनता के बीच न जाए।
रिपोर्टर और कंपनी के दो अधिकारी हमारे घर आए। कह रहे थे कि मैं उन्हें वो चॉकलेट दे दूं, ताकि वो तुरंत जांच शुरू करा सकें। लेकिन हमने पहले रिपोर्ट तैयार की। रिपोर्ट पूरी हो चुकी थी। मैं ऑफिस गया। एक या डेढ़ मिनट की खबर दोपहर के बुलेटिन में चली। सिर्फ एक बार।
उसके बाद हमारे चैनल के सेल्स हेड का फोन न्यूज़ डाइरेक्टर के पास आया। कहा गया कि चॉकलेट कंपनी के खिलाफ चल रही उस खबर को रुकवा दीजिए। कंपनी वाले कह रहे हैं कि वो जांच कर रहे हैं।
वो तो एक बहाना था। मूल कारण क्या था? कंपनी करोड़ों रुपए चॉकलेट के विज्ञापन पर खर्च करती थी। कम नहीं होते, करोड़ों रुपए। उसे संजय सिन्हा के बेटे के पचास रुपए के चॉकलेट के पीछे खोया नहीं जा सकता था।
नोट-
- तब भी विज्ञापन का दबाव था। लेकिन झुका कौन था? सेल्स विभाग। तना कौन था, पत्रकार।
- खबर दिखलाने से क्या होने वाला था? उन्हें फांसी हो जाती? वो तो गिफ्ट देने को तैयार थे। लेकिन नहीं झुकने वाले अपने काम को अंजाम देते हैं (एक बार ही सही, मैंने ईमानदारी से अपना काम किया था)।
- बस फर्क ये आया है कि हम ये नहीं कहते कि विज्ञापन के दबाव में हम झुके। सिस्टम वही था। हम भी वही थे। जो वो थे, वही हैं। जो हम थे वो अब बदल गए हैं।
- रिंकी के पापा के काल को कोसना छोड़िए। वो जा चुके हैं। गए को याद करना असल में वर्तमान के पाप को छिपाना होता है।



