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एक पत्रकार ऐसा भी; ईमान नहीं बेचा, बेचता है कास्मेटिक और सब्जियां!

मीडिया संस्थान एक पत्रकार को बित्ती भर का वेतन देते हैं। साल में दूध के बढ़ते दाम की तुलना में भी कम इंक्रीमेंट मिलता है। जहां लाइजनर और ब्लैकमेल करने वाले पत्रकारों की मौज है, कई फटेहाल पत्रकार देखते ही देखते करोड़पति बन गये हैं। उनके आलीशान घर हैं, लग्जरी जीवन है, एसयूवी कारें हैं…

गुणानंद जखमोला-

इस चेहरे को जरा गौर से देख लीजिए। यह गर्वोन्नत मूछों वाला वीडियो जर्नलिस्ट दून की गलियों से लेकर राजनीतिक दलों के आफिस, सचिवालय से लेकर राजभवन तक आयोजित होने वाले धरना-प्रदर्शन, बैठक और प्रेस कांफ्रेंस में हर जगह मिल जाएगा। आज जहां सवाल पूछना गुनाह सा है तो यह बेधड़क नेताओं और नौकरशाहों से तीखे सवाल करता है। पिछले 19 साल से पत्रकारिता के क्षेत्र में है और बेहद ईमानदार और मेहनती है। यह है वीडियो जर्नलिस्ट सतीश प्रसाद कोठारी।

आज जब अधिकांश पत्रकार लाइजनिंग और ब्लैकमेलिंग से लिप्त होकर रातों रात अमीर होना चाहते हैं तो सतीश कोठारी युवा पत्रकारों के लिए एक नजीर है। वह अपना घर चलाने के लिए कास्मेटिक और सब्जियां बेचता है लेकिन उसने आज तक अपना ईमान नहीं बेचा।

रुद्रप्रयाग निवासी सतीश कोठारी सुबह घर से निकलता है और रोज आठ से 10 घंटे पूरी तरह से समर्पित भाव से पत्रकारिता करता है। देर रात तक वह मोहकम्मपुर रेलवे फाटक के निकट अपनी कास्मेटिक और सब्जी की दुकान में मिल जाता है। यह दुकान भी किराए की है और मकान भी। इसके बावजूद सतीश बेहद स्वाभिमानी, ईमानदार और कर्मठ है। मैंने उसे हमेशा दौड़ते भागते देखा है।

सतीश 2006 में दिल्ली गया और वहां विभिन्न चैनलों मे काम किया। वहां पत्रकारिता की बारीकियां सीखीं। 2016 में देहरादून आ गया। सोचा था कि मूल निवासी हूं। अपना प्रदेश है क्या पता दिन बहुर जाएं? भला ईमानदार लोगों के दिन बहुरते हैं क्या?

मीडिया संस्थान एक पत्रकार को बित्ती भर का वेतन देते हैं। साल में दूध के बढ़ते दाम की तुलना में भी कम इंक्रीमेंट मिलता है। जहां लाइजनर और ब्लैकमेल करने वाले पत्रकारों की मौज है, कई फटेहाल पत्रकार देखते ही देखते करोड़पति बन गये हैं। उनके आलीशान घर हैं, लग्जरी जीवन है, एसयूवी कारें हैं। वहीं, सतीश जैसे ईमानदार पत्रकारों को इस घोर महंगाई के जमाने में ईमानदारी से गुजर-बसर करने में परेशानी का सामना करना पड़ता है।

कई मीडिया संस्थान तो दो-तीन महीने में एक बार वेतन देता है। ऐसे में ईमानदार पत्रकारों के आगे बच्चों की फीस और घर खर्च चलाना मुश्किल होता है।

यही स्थिति सतीश कोठारी के साथ आई तो उसने ईमान बेचने की बजाए कास्मेटिक और सब्जी बेचना अधिक मुनासिब समझा। पिछले सात साल से वह और उसकी पत्नी इस दुकान को चला रहे हैं और तब गुजर-बसर हो रही है। दो बच्चों की फीस, दुकान का किराया, मकान का किराया और आसमां छूती महंगाई ने सतीश का बजट बिगाड़ा है लेकिन सतीश आज भी ईमानदारी की डगर से नहीं डिगा।

सतीश कोठारी के स्वाभिमान, उसकी ईमानदारी और पत्रकारिता के प्रति समर्पण को सलाम।

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