राजीव नयन बहुगुणा-
चिड़चिड़े, गुस्सैल, खांटी देशज और आमरण युवा तुर्क तथा अध्यक्ष बने रहने वाले पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर को कल हम जानबूझ कर याद नहीं किये.
कल इस सिलसिले में बहुत भीड़ थी, और हम भीड़ में नहीं घुसते. हमें उनकी दो घटनायें बराबर याद हैं, और पसंद हैं.
पहली – पटना में हुज्जती पत्रकारों को खदेड़ कर भगाना, तथा दूसरी थेथर वक़ील राम जेठमालानी के कपड़े फड़वाना और पिटवाना.
कोई 85 – 86 में चंद्रशेखर पटना में संवाददाता सम्मेलन बुलाये. हम उस वक़्त पटना में ही अख़बार की नौकरी कर रहे थे.
शुरुआत में ही किसी पत्रकार ने माफिया सूर्यदेव सिंह से उनकी मैत्री विषयक प्रसंग छेड़ दिया. चंद्रशेखर ने पूरी दबंगई से उत्तर दिया कि वह उनके व्यक्तिगत मित्र हैं, और इससे उनकी राजनीति का कोई वास्ता नहीं.

तब पत्रकारों का बहु संख्य समूह उनसे हुज्जत पर उतर आया. चंद्रशेखर हत्थे से उखड़ गये, और फाइव स्टार होटल में पत्रकारों के लिए लग रहे, और लग चुके भोजन को वापस उठाने के निर्देश दिए.
जो पत्रकार हाथ जूठा कर चुके थे, उन्हें जस का तस उठना पड़ा. हाथ धोने की भी नौबत न आई, क्योंकि चंद्रशेखर के गण बाहें और त्योरियाँ चढ़ा कर घेरा डाल चुके थे.
दूसरी बार. प्रधानमंत्री पद छिनने से कुपित और कुंठित चंद्रशेखर अपने ही घर को कोप भवन बना कर फुंकार रहे थे. विश्व नाथ प्रताप सिंह के समर्थन में राम जेठ उनके घर के बाहर कनात, तम्बू लगा कर बैठ गये.
वह अपने साथ ही उस समय प्रचलित इक्का दुक्का चैनलों की टीम भी लाये थे, ताकि जब चंद्रशेखर बाहेर आ कर उनसे बहस करें, तो वह बहस में हारते चंद्रशेखर को live दिखा सकें.
हठात चंद्रशेखर के घर से कोई दो दर्ज़न पुरबीये और बिहारी दौड़ते और गरियाते निकले. जेठ ने ज्यों ही बहस करने को थूथनी उठाई, पहला चाँटा उनकी थूठनी पर और फिर अनेक चांटे उनकी गंजी चाँद पर पड़े.
कुछ ने कोहनी और घुटनों से भी मारा. कुर्ता फाड़ने के बाद जब जेठ ने लाज बचाने वास्ते दोनों हाथों से अपने पजामे को पकड़ लिया, तो दो ने उनके हाथ जकड़े, और एक ने बगैर नाड़ा खोले पजामा एक ही झटके में नीचे खींच लिया.
ब मुश्किल तीन मिनट चले इस ऑपरेशन के फलस्वरूप जेठ जी नंगे और रोते हुए भागे. मैं आज भी उस दृश्य को याद कर किलक जाता हूँ, और रोमांचित हो जाता हूँ.


