गुणानंद जखमोला-
पंजाब केसरी पर सरकार की छापेमारी निंदनीय
- लोकतंत्र का कभी रहा मजबूत स्तंभ, अब दीमक ने किया खोखला
- पर सच यह भी है कि पत्रकारिता के पतन में पंजाब केसरी का है बड़ा हाथ
पंजाब की भगवंत मान सरकार पर ‘पंजाब केसरी‘ के गंभीर आरोप हैं कि लोकतंत्र की आवाज दबाने के लिए उन पर छापेमारी और सख्ती की जा रही है। यदि ऐसा है तो मैं इसकी निंदा करता हूं। यह प्रेस की स्वतंत्रता पर हमला है। पंजाब सरकार को इस तरह से लोकतंत्र का गला नहीं घोंटना चाहिए। इस छापेमारी और दबाव के बाद मैं पंजाब केसरी के इतिहास की ओर देखता हूं। इस अखबार ने लोकतंत्र को मजबूत किया और उसे कमजोर भी किया। मेरा मानना है कि पत्रकारिता के पतन की शुरुआत भी इसी अखबार के माध्यम से हुई।
कभी पंजाब केसरी अखबार लोकतंत्र का एक बड़ा स्तंभ था। 1981 में खालिस्तानी आतंकवादी भिंडारावाले समर्थकों ने लाला जगतनारायण की हत्या के बाद उनके पुत्र रमेश चंदर की भी हत्या कर दी थी। रमेश चंदर को 64 गोलियां मारी गयी थी। आपातकाल में कांग्रेस ने इस अखबार की बिजली आपूर्ति काट दी गयी थी तो लाला जगतनारायण ने टैक्टरों के माध्यम से अखबार प्रकाशित किया। तब इस अखबार का बड़ा नाम और सम्मान था।
मैंने बचपन से लेकर अब तक इस अखबार का उत्थान और पतन देखा है। 1984-85 में पंजाब केसरी का दिल्ली संस्करण शुरू होना था। जीटी करनाल रोड पर एक छोटा सा किराये का आफिस था। चूंकि, इस अखबार में मेरे चाचाजी सदानंद जखमोला काम करते थे तो अक्सर मैं वहां जाता था। एक दो साल के बाद वजीरपुर में पंजाब केसरी का भव्य आफिस बना और यहां से विधिवत पंजाब केसरी प्रकाशित होने लगा। यहां जबरदस्त सिक्योरिटी थी। अश्विनी मिन्ना संपादक थे।
उन दिनों पंजाब केसरी के वीरवार और रविवार एडिशन को लेकर काफी चर्चा होती। रंगीन ग्लेज पेपर पर अधनंगी फोटो प्रकाशित होती थी। इस कारण इस अखबार ने दिल्ली में तेजी से अपनी पैठ बना ली। बुनियादी तौर पर तब यह अखबार नाईयों की दुकान या निचले तबके के लोगों का ही माना जाता था। आज भी लगभग वही स्थिति है। मैं स्कूली छात्र था तो इस अखबार में विजय की विदेश यात्रा संबंधी सस्मरण पढ़ता था, साथ ही चोरी छिपे अधनंगी फोटो भी देखता था। जब मैं पत्रकार बना तो मन ही मन ईश्वर से प्रार्थना करता था कि भगवान, ऐसे दिन न दिखाए कि पंजाब केसरी में पत्रकारिता करनी पड़े। हालांकि आज सभी अखबारों की हालत पंजाब केसरी जैसी है।
धीरे-धीरे इस अखबार ने अपनी गरिमा खो दी। 2010 तक की तो मुझे खबर है। यहां पत्रकारों को न्यूनतम वेतन मिलता, अधिकतम शोषण होता था। कई पत्रकारों को तो वेतन बिल्कुल नहीं मिलता। अपकंट्री के रिपोर्टर या स्ट्रिंगर कोई भी बन सकता था, न कोई शिक्षा न कोई प्रशिक्षण। शर्त यही कि खुद भी कमाओ और अखबार को भी कमा कर दो। विन्डो न्यूज, सिंगल कॉलम न्यूज पर भी बाईलाइन ले लो। इसी ‘बाईलाइन‘ पर खेल होता था। यह बेहद खतरनाक परम्परा थी, लेकिन कभी किसी ने न तो संज्ञान लिया और न ही इस अखबार के खिलाफ कोई पत्रकार या संस्था पीसीआई में गयी। इस अखबार के अधिकांश पत्रकार दलाली करने में पारंगत हो गये। उनकी देखा-देखी में अन्य अखबारों ने भी वही गति पकड़ ली।
आज आलम यह है कि लगभग हर अखबार पंजाब केसरी की मूल भावना लूट-खसोट की भावना पर काम कर रहा है कि विज्ञापन लाओ और नौकरी बचाओ। सरकार के सामने सभी अखबारों ने घुटने टेके हुए हैं। अब लाला जगतनारायण जैसा कलेजा किसी का नहीं है कि सरकार से सवाल पूछे। सरकार के जनविरोधी फैसलों पर टिप्पणी करे। मुख्यधारा के पत्रकार अब कारपोरेट जर्नलिज्म करते हैं, उन्हें अपनी सेलरी और स्वार्थ से मतलब है, जनता जाए भाड़ में।
खैर, जो भी हो, यदि भगवंत सरकार पंजाब केसरी का दमन कर रही है तो यह निंदनीय है। और इसकी भर्त्सना की जानी चाहिए। सवाल पूछना और जनपक्षधरता की बात करना पत्रकारिता का मूल धर्म है। इस धर्म से विमुख होना या करना दोनों ही चिन्ता का विषय है।
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