जगदलपुर। बस्तर के वरिष्ठ पत्रकार और बस्तर जिला पत्रकार संघ के संस्थापक सदस्य राजेंद्र बाजपेयी (79) का निधन पत्रकारिता जगत के लिए एक अपूरणीय क्षति है। उन्हें बस्तर पत्रकारिता का भीष्म पितामह माना जाता था।

14 जुलाई 1946 को जन्मे बाजपेयी ने अपने करियर की शुरुआत पीडब्ल्यूडी के मैकेनिकल विभाग से की थी। लेकिन सरकारी नौकरी छोड़कर उन्होंने पत्रकारिता को ही अपना जीवन लक्ष्य बना लिया।
पत्रकारिता की यात्रा
उनकी पत्रकारिता की शुरुआत ‘बस्तर टाइम्स’ नामक साप्ताहिक अखबार से हुई, जिसे उन्होंने स्वयं प्रकाशित किया। इसके बाद वे लंबे समय तक प्रेस ट्रस्ट ऑफ इंडिया (PTI) के जगदलपुर संवाददाता रहे। उनकी लेखनी और साहसिक रिपोर्टिंग ने उन्हें बस्तर के प्रमुख पत्रकारों की श्रेणी में स्थापित किया।
पत्रकार संघ और संघर्ष
साल 1980 में जब बस्तर जिला पत्रकार संघ का गठन हुआ, तो उस समय पोला सिंह, बसंत अवस्थी, भरत अग्रवाल, किरीट दोषी, एस. करीमुद्दीन, रवि दुबे, डी.एस. नियाजी जैसे दिग्गज पत्रकारों के साथ राजेंद्र बाजपेयी भी शामिल रहे। इसी दौरान उन्होंने तत्कालीन मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह से पत्रकार भवन के लिए भूखंड की मांग की, जिसे तत्काल स्वीकृति मिली। आज जगदलपुर का पत्रकार भवन बीते 45 वर्षों से पत्रकारों की एकता और संघर्ष का प्रतीक बना हुआ है।
साहसिक रिपोर्टिंग
बाजपेयी ने नक्सली आंदोलनों पर निडर रिपोर्टिंग की। विशेष रूप से निर्मल सोनी प्रकरण में उन्होंने जंगल जाकर नक्सलियों से उनकी रिहाई कराने में अहम भूमिका निभाई। पत्रकारिता में उनके योगदान को देखते हुए उन्हें कई सम्मान और पुरस्कार भी मिले।
आदर्श और विरासत
राजेंद्र बाजपेयी को पत्रकारों के बीच एक मार्गदर्शक और पितामह के रूप में सम्मान प्राप्त था। अनेक युवा पत्रकारों ने उन्हें अपना आदर्श माना। उनकी विरासत आज भी उनके परिवार में जीवित है — उनके पुत्र रजत बाजपेयी भी सक्रिय रूप से पत्रकारिता से जुड़े हुए हैं।
अपूरणीय क्षति

उनका यूं अचानक चले जाना बस्तर संभाग की पत्रकारिता के लिए गहरा आघात है। उनकी स्मृतियां, लेखनी और संघर्ष आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का स्रोत बनी रहेंगी। मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने उनके निधन पर गहरा दुख व्यक्त किया है।



