
विकास मिश्रा-
बात 2002 की है। चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय, मेरठ के छात्रों का कोई मसला था। छात्र आईजी के दफ्तर पहुंच गए, नारेबाजी करने लगे। छात्रों का नेतृत्व कर रहे थे छात्र नेता राजकुमार सांगवान। उस समय आईपीएस विक्रम सिंह मेरठ के आईजी थे। विक्रम सिंह ने शोर सुना, स्टाफ से पूछा तो पता चला कि छात्र नेता राजकुमार सांगवान के नेतृत्व में छात्र आंदोलन कर रहे हैं।
विक्रम सिंह बाहर आए, राजकुमार सांगवान से बोले- अरे भाई राजकुमार.. मैं जब मेरठ में डीआईजी बनकर आया था तब भी तुम छात्र नेता थे। अब आईजी बनकर आया हूं तब भी तुम छात्र नेता हो, तो क्या डीजीपी बन जाऊंगा, तब भी छात्र नेता रहोगे..?
राजकुमार सांगवान कुछ बोले नहीं, मुस्कुराकर रह गए। दैनिक जागरण के संवाददाता वहां थे शायद दिनेश दिनकर जी। खबर ले आए, मैंने एडिट करके विक्रम सिंह के एंगिल से हेडिंग भी लगाई। शायद हेडिंग कुछ ऐसी थी- आईजी बोले- ‘जब मैं डीजीपी बन जाऊंगा तब भी छात्र नेता ही रहोगे’
विक्रम सिंह डीजीपी बन गए और रिटायर भी हो गए, लेकिन एक ईमानदार और कर्मठ कार्यकर्ता के तौर पर राजकुमार सांगवान का संघर्ष न कम हुआ और न ही खत्म हुआ। लंबे समय तक वे छात्र नेता ही रहे और आज लोकसभा चुनाव के नतीजे आए। राजकुमार सांगवान अब बागपत के माननीय सांसद हैं।

राजकुमार सांगवान की सरलता और सज्जनता का सियासत में कोई दूसरा उदाहरण नहीं मिलेगा। कभी उन्होंने पार्टी नहीं बदली, किशोरावस्था से ही राष्ट्रीय लोकदल के साथ ही हैं। आर्थिक स्थिति के बारे में आप उन्हें ‘फटेहाल नेता’ भी कह सकते हैं। जब उन्होंने नामांकन भरा था तो उनके पास सिर्फ 7 हजार रुपये थे। शायद इस लोकसभा चुनाव के सबसे गरीब प्रत्याशी थे राजकुमार सांगवान।
अर्थप्रधान सियासत के दौर में राजकुमार सांगवान का सांसद होना अंधेरे में रोशनी की किरण सरीखा है। उनकी विनम्रता बेमिसाल हैं। बिना हानि लाभ की परवाह किए रिश्ते पहचानना, संभालना और निभाना जानते हैं। मेरी उनसे जान पहचान मेरठ में हुई थी, तब मैं दैनिक जागरण का सिटी इंचार्ज था। उनकी विनम्रता का मैं कायल था।
करीब 6 साल पहले की बात है मेरठ के प्रसिद्ध होमियोपैथ डॉक्टर राजेंद्र सिंह के बेटे डॉक्टर आशीष राजेंद्र की क्लीनिक का उद्घाटन था नोएडा में। डॉक्टर साहब से पारिवारिक रिश्ता है। मैं सपत्नीक शामिल हुआ कार्यक्रम में। राजकुमार सांगवान भी वहीं मिले, पहचान लिया उन्होंने। हाल चाल हुआ। मुझे वहां से अपने दफ्तर आजतक के लिए निकलना था और श्रीमती जी को घर। श्रीमती जी को घर कौन पहुंचाएगा, यह यक्ष प्रश्न आया। डॉक्टर साहब बोले, मैं पहुंचवा दूंगा।
वहीं मौजूद राजकुमार सांगवान बोले-भाई साहब भाभी जी को मैं पहुंचाऊंगा। मैंने कहा कि आपको उलटा तो नहीं पड़ेगा। बोले- भाई साहब उलटा पड़े या सीधा, ये तो हमारा विषय है, आपका नहीं, मुझे तो अवसर मिला है कुछ करने का। राजकुमार सांगवान जी ने श्रीमती जी को मेरे घर राज नगर एक्सटेंशन पहुंचाया। बाकायदा फ्लैट तक पहुंचाकर ही आए। हालांकि श्रीमती जी ने मेन गेट पर बोला कि मैं चली जाऊंगी, लेकिन राजकुमार जी ने कहा-भाई साहब से जिम्मेदारी ली है घर तक पहुंचाने की, बाहर से पहुंचाकर तो नहीं ही जाऊंगा।
राजकुमार सांगवान आज बागपत के सांसद बने तो बहुत सुखद अहसास हुआ। मैं जयंत चौधरी को इस बात के लिए साधुवाद दूंगा कि उन्होंने इस फक्कड़ फकीर कार्यकर्ता को पार्टी का टिकट दिया। कार्यकर्ता के समर्पण का इनाम दिया, सम्मान दिया। क्योंकि समर्पण और कर्मठता के अलावा राजकुमार सांगवान के पास कुछ भी नहीं था। हां पार्टी और कार्यकर्ताओं के बीच उनका बहुत सम्मान है। कार्यकर्ताओं ने ही चंदा जुटाकर तो उन्हें चुनाव लड़ाया। मेरठ के रहने वालों ने भी उनके लिए चंदा जुटाया।
बहरहाल इस शानदार जीत पर राजकुमार सांगवान को मेरी तरफ से बहुत-बहुत बधाई। मुझे विश्वास है कि सांसद बनकर भी राजकुमार सांगवान उतने ही सरल और सहज रहेंगे, जितने अभी हैं।


