Connect with us

Hi, what are you looking for?

Local News Community

झारखंड

रांची एक्सप्रेस के उप संपादक की सैलरी का यह मामला तो बड़ा पेचीदा है!

झारखंड में मजीठिया वेज बोर्ड की सिफारिशों को लागू कराने की बात कौन‌ कहे, यहां पत्रकारों को मीडिया संस्थानों द्वारा उनके हिसाब से तय किया वेतन‌ भी दिलाने में राज्य का श्रम विभाग अक्षम साबित हो रहा है। चाहे बात भाजपा नीत गठबंधन की हो या झामुमो की अगुवाई में बनी सरकार की, यदि कोई पत्रकार अपने बकाया वेतन भुगतान के लिए श्रम विभाग में शिकायत करता है, तो इसके लिए उसे जितनी बार श्रम विभाग के चक्कर लगाना पड़ता है, उसमें उसे अपने मिलने वाले वेतन से ज्यादा जेब से पैसा खर्च करना पड़ता है और उसके बाद भी उसे हक नहीं मिलता।

दोनों पक्षों में कई बार वार्ता के बाद भी मामला नहीं सुलझने पर माननीय श्रम न्यायालय में जाने पर विभाग की तरफ से हर तारीख में लगातार अनुपस्थित रहने व केस की उचित पैरवी न‌ करने के कारण कोर्ट में केस खारिज हो जाता है। इस मामले में माननीय न्यायालय की तरफ से यह टिप्पणी किया जाना भी काबिलेगौर और विभाग को आईना दिखाने जैसा है कि आवेदक को‌ इस वाद में कोई‌ अभिरुचि नहीं है।

विभाग की लापरवाही का आलम यह भी है कि इस मामले में शिकायतकर्ता भुक्तभोगी रांची एक्सप्रेस के तत्कालीन वरिष्ठ उप संपादक राज आलोक सिन्हा द्वारा झारखंड के श्रम आयुक्त को दिनांक 17 जुलाई 2017 को लिखित आवेदन देकर दो माह के बकाया वेतन की मांग की गई थी, लेकिन उन्हें इस दिशा में अबतक न्याय नहीं मिला है। और तो और दिनांक 17 अक्टूबर 2019 को श्रम न्यायालय द्वारा उक्त वाद को खारिज किए जाने के बाद शिकायतकर्ता की तरफ से कोर्ट के आदेश की प्रति खुद से निकलवाकर श्रम अधीक्षक महोदय को दिए जाने व मामले को री-स्टोर कराने के लिए इस संबंध में कई बार आवेदन दिए जाने के बाद भी मामले का कुछ हल निकलता नहीं नजर आ रहा है‌।

यहां यह भी उल्लेखनीय तथ्य है कि रांची एक्सप्रेस प्रबंधन के खिलाफ शिकायतकर्ता द्वारा श्रम विभाग को किए गए उक्त शिकायत के बाद जब रांची के तत्कालीन श्रम अधीक्षक द्वारा दोनों पक्षों के बीच हुई तीन-चार वार्ता के बाद शिकायतकर्ता को खुद श्रम न्यायालय जाने को कहा गया था, जिसमें अपने खर्चे पर केस लड़ने में असमर्थता जताने पर मुख्यमंत्री संवाद केंद्र की तरफ से इस मामले में श्रम विभाग को खुद इस केस की श्रम न्यायालय में पैरवी करने का आदेश जारी हुआ था।

गौरतलब है कि उस समय झारखंड में रघुवर दास की सरकार थी। मगर इन सबके बावजूद इस मामले की गंभीरता को नहीं समझा गया। शिकायतकर्ता को न तो भाजपा के राज में, न ही झामुमो की अगुवाई वाली सरकार के शासनकाल में न्याय मिल सका।

देखें पत्रावली...

Pahad Ki Dada: Hill Mail Uttarakhand
CosmoQuick: AI Recruitment For Media Jobs
Click to comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

भड़ास लीगल टीम : Bhadas Legal Team

भड़ास मेल: [email protected]

Latest 100 भड़ास

विज्ञापन