गिरिजेश वशिष्ठ-
संबंध पुराने होने चाहिए पुराने पड़ने नहीं चाहिए. सतत संपर्क न हो तो संबंध पुराने पड़ने लगते हैं. और जीवंत हों तो पुरानी शराब और अचार सा सुख देते हैं. ये सीख देने वाला दुनिया से चला गया. रवीन्द्र मालव जी 78 साल के थे. 1990 में उन्होंने दिल्ली की धरती पर पहला पैर रखने का मौका दिया. सहारा का इन्टरव्यू था और जन संदेश का भी. मैंने जन संदेश चुना. सहारा की साख एक चिटफंड कंपनी की हुआ करती थी तब. जन संदेश ओम प्रकाश चौटाला का अखबार था. उसके संपादक थे रवीन्द्र मालव. रवीन्द्र मालव जी के साथ दिल्ली में बिताया समय काफी कुछ सिखाने वाला था.

रवीन्द्र मालव जी खूब पढ़ते और अंदर की जानकारियां बताते. हमें भी पढ़ने को मिलता क्योंकि उन्हें किताब खरीदने का शौक था खुद खूब पढ़ते और हमें भी मिलती.
उनके जीवट के कुछ किस्से हमेशा याद रहेंगे. एक मीडियम साइज का वीआईपी ओडिशी ब्रीफकेस हमेशा उनके साथ रहता. वजन रहता होगा कम से कम पन्द्रह बीस किलो अंदर ठूस-ठूस कर कागज, अखबार और पुस्तकें होतीं. रवीन्द्र मालव जी चार पेन रखते थे चारों अलग अलग रंग के. मध्यप्रदेश विधानसभा के स्पीकर के सचिव रह चुके थे तो ब्यूरोक्रिटिक प्रोटोकाल बहुत पसंद था. इसलिए अलग-अलग रंग की स्याही का इस्तेमाल करते.
जिसके साथ जुड़ गए उसके साथ जुड़ गए. कांग्रेस की समाजवादी विचारधारा को मानते थे. अर्जुन सिंह सबसे प्रिय नेता. रवीन्द्र मालव जी के जितने दोस्त थे सब से मिलवाते. अपने नेटवर्क को कभी छिपाकर नहीं रखा. इसी सिलसिले में मैंने वो मोटी फाइल देखी जिसमें राम जन्मभूमि के मालिकाना हक निर्मोही अखाड़े के पास होने के सबूत थे. बहूत मजबूत केस था ड़ाक्टर राजेन्द्र जैन उज्जैन वाले उसे लड़ रहे थे. बाद में संघियों ने कुछ ऐसा किया कि फाइल चोरी हो गई. कहा गया कि चोर ले गए. वरना राममंदिर पर असली हक निर्मोही अखाड़े का था उनके पास सैकड़ों साल पुराने सबूत थे.
मुझे वो दिन हमेशा याद रहेगा. एक बार अखबार की सन्डे मैगजीन में अश्लील साहित्य पर लेख था. उसमें कुछ तस्वीरें ऐसी लग गई जो आपत्तिजनक नहीं थी. पहले से प्रकाशित किसी प्रतिष्ठित संस्थान से साभार ली थीं. अंदर राजनीति चलती थी. किसी ने जान भर दिये. रवीन्द्र मालव जी किसी से डरते नहीं थे उन्होंने मेरा साथ दिया. उनके दुश्मन भी बहुत थे. मौका मिल गया. चेयरमेन का फैसला आया कि ये फोटो अश्लील है. अब ये मैगजीन दुबारा छपती तो कॉस्ट आती. रवीन्द्र मालव जी को मैंने आईडिया दिया कि इसके ऊपर एक क्रास लगाते हैं जिससे तस्वीर भी छिप जाएगी और एक प्रतीक भी हो जाएगा.
स्टाप पेड वाली स्याही खऱीदी गई और उससे एक ब्रश की सहायता से क्रास लगाने का काम शुरू हुआ लेकिन मैं अटक गया. दिवाली पर घर आना था. रवीन्द्र मालव जी समझ गए. उन्होंने कहा कि तुम ग्वालियर जाओ मैं संपादक हूं ये मेरी भी गलती है. और हजारों पेजों पर उन्होंने अपने हाथ से क्रास लगाए.
इतने साल बाद भी रवीन्द्र मालव जी संपर्क में थे उन्होंने जीवन यापन केलिए एक ई व्हीकल की एजेंसी खोल ली थी. जब मिलने जाता तो बहुत खुश होते. उनके घर में कुछ दुकानें भी थीं जिनमें एक किरायेदार था भैरंट केसरिया दूध वाला. ग्वालियर जाओ तो रवीन्द्र मालव जी उसका दूध पिलाते. दिल्ली में अच्छे खाने की जगहों का उन्हें खूब पता था. गोल मार्केट के बंगाली स्वीट्स की जलेबियां उनका शाम का शौक था. बेजा या बेगा जो भी कहें उनका भोजन की थाली का अड्डा लेकिन ये शौक तक था, रवीन्द्र मालव जी आहार के तौर पर दूध और ब्रेड खाकर भी कई दिन चला सकते थे.
इच्छा शक्ति उनकी जबरदस्त पूरे हाथ में दाने निकल आए. डाक्टर ने कहा कि ये हर्पीज जास्टर है. रवीन्द्र मालव जी ने एक भी दवा नहीं ली. बोले जैन हूं पेन किलर नहीं लूंगा. दर्द बर्दाश्त किया वो ही भारी अटैची उसी हाथ से उठाई. हम लोग अगर कहते कि हमें उठाने दीजिये तो इनकार कर देते.
चमचागीरी मालव जी को पसंद नहीं थी लेकिन किस्से बहुत थे उनकी स्वतंत्रता सम्मान की विरासत. उनकी माता जी का कांग्रेस के साथ आंदोलन में कूदना. जैन मुनियों के साथ टकराव. विद्यासागर जी तो उन्हें श्राप दे चुके थे. वो लकीर पर नहीं चलते थे नये विचार और खुली अभिव्यक्ति उनकी पहचान थी. जैनियों की अनेक कुप्रथाओं पर वो खुल कर बोलते. जैन दर्शन को उनके कारण ही समझने में मदद मिली. उनके साथ रहने के कारण टाइम्स ग्रुप के मालिकों के साथ काफी संपर्क हुआ. उनके साथ रवीन्द्र मालव जी ने हमेशा एक स्वाभिमानी रिश्ता कायम रखा.
जब वो चलते थे तो रीढ़ सीधी और गर्दन उठी हुई और उनके संबंधों में भी वो दिखता. उन्होंने कभी अपने लिए कुछ नहीं मांगा. तब नवभारत टाइम्स मतलब गोल्ड स्टैडर्ड होता था. चाहते तो पद मिल जाता लेकिन उन्होंने कभी नहीं कहा. न अपने लिए न अपनों के लिए. आज रवीन्द्र मालव जी चले गए हैं और उनके साथ गरजती हुई आवाज भी।



