पश्चिम बंगाल की राजनीति में संतु पान की उम्मीदवारी ने मीडिया और सियासत के रिश्तों पर नई बहस छेड़ दी है। रिपब्लिक बांग्ला के पत्रकार रहे संतु पान पर लंबे समय से आरोप लगते रहे कि उनकी रिपोर्टिंग और सवालों का रुख बीजेपी के पक्ष में झुका हुआ था। अब उसी संतु पान को भारतीय जनता पार्टी (BJP) द्वारा विधानसभा चुनाव का टिकट दिए जाने के बाद इन आरोपों को और बल मिला है।
संतु पान उस समय सुर्खियों में आए थे जब ममता बनर्जी से उनके तीखे सवाल को लेकर विवाद हुआ और इसे प्रेस की आज़ादी का मुद्दा बनाया गया। लेकिन अब आलोचकों का कहना है कि जिस तरह से वह लगातार बीजेपी के नैरेटिव के साथ खड़े नजर आते थे, उससे उनकी पत्रकारिता की निष्पक्षता पर पहले से ही सवाल उठते रहे हैं।
राजनीतिक हलकों में इसे “रिपोर्टिंग से राजनीति तक सीधा रास्ता” बताया जा रहा है। विपक्षी दलों का आरोप है कि पहले मीडिया के जरिए माहौल बनाया जाता है और फिर उसी चेहरे को राजनीतिक मैदान में उतार दिया जाता है, जिससे पूरी प्रक्रिया पर सवाल खड़े होते हैं।
इस मामले में रिपब्लिक टीवी से जुड़े एक और चेहरे प्रदीप भंडारी का उदाहरण भी दिया जा रहा है, जो पहले ही BJP में शामिल होकर पार्टी के प्रवक्ता बन चुके हैं। लगातार ऐसे मामलों के सामने आने के बाद यह बहस और तेज हो गई है कि क्या कुछ मीडिया संस्थान अब निष्पक्ष पत्रकारिता के बजाय राजनीतिक एजेंडे का विस्तार बनते जा रहे हैं।
फिलहाल संतु पान की उम्मीदवारी ने यह सवाल फिर खड़ा कर दिया है कि क्या यह महज करियर का बदलाव है या फिर पहले से तय एक राजनीतिक स्क्रिप्ट का हिस्सा।
अब तक रिपब्लिक टीवी से जुड़े 6 पत्रकार बीजेपी में शामिल हो चुके हैं। इनमें से एक को पार्टी का प्रवक्ता बनाया गया है, जबकि एक को पश्चिम बंगाल चुनाव के लिए टिकट भी दिया गया है। यह महज एक न्यूज़ चैनल नहीं रह गया, बल्कि बीजेपी आईटी सेल के विस्तारित मीडिया विंग की तरह काम करता नजर आ रहा है। -रोशन राय, पत्रकार
ममता बनर्जी सरकार ने रिपब्लिक बांग्ला के जिस पत्रकार संतु पान को नोटिस देकर पूछताछ के लिए बुलाया था, उसे BJP ने वेस्ट बंगाल से विधानसभा चुनाव का टिकट दिया! -सचिन गुप्ता, पत्रकार
अमित मालवीय का ट्वीट-
पश्चिम बंगाल पुलिस ने रिपब्लिक बांग्ला के पत्रकार संतु पान को सिर्फ इसलिए पूछताछ के लिए तलब किया है क्योंकि उन्होंने ममता बनर्जी से एक सवाल पूछने की हिम्मत की।
उनका “अपराध” क्या है? मुख्यमंत्री से उस दिन के बारे में सवाल पूछना, जब वे एक निजी कंपनी के दफ्तर में घुस गई थीं—एक ऐसी कंपनी जिस पर कोयला तस्करी और मनी लॉन्ड्रिंग के आरोप लगे हैं—और कथित तौर पर फाइलें लेकर निकल गई थीं।
यही है बंगाल में प्रेस की आज़ादी की स्थिति।
ममता बनर्जी के शासन में पत्रकारिता को अपराध की तरह देखा जा रहा है और मुख्यमंत्री से सवाल पूछना सज़ा के लायक माना जा रहा है।
मीडिया की आज़ादी की हकीकत सबके सामने है।




Manoj Kumar
March 18, 2026 at 10:33 am
Jara unn par bhi dhyan dilaiye jo rajya sabha pahuch gaye hai aur padamshri le chuke hai congress aur mamta sarkar se.Aaj Arnab hi bjp se sawal bhi utha rahe hai.