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सियासत

संसद में बैन किताबों पर चर्चा हो सकती है तो ‘गुजरात फाइल्स’ और ‘नरवणे’ से क्या आपत्ति है?

संजय कुमार सिंह-

जब प्रतिबंधित किताब की चर्चा हो सकती है (जरा ‘गुजरात फाइल्स’ की भी चर्चा कर लेते)

भाजपा सांसद निशिकांत दुबे ने 4 फरवरी 2026 को संसद में जिन किताबों की चर्चा की या कर पाए उनमें एमओ मथाई की चर्चित व विवादास्पद पुस्तक ‘रेमिनिसेंस ऑफ द नेहरू एज’ (Reminiscences of the Nehru Age) भी है। यह पुस्तक भारत में प्रतिबंधित है।

2024 में पद्मश्री से सम्मानित सुरेन्द्र किशोर ने 4 फरवरी 2023 को फेसबुक पोस्ट के माध्यम से सवाल उठाया था, क्या नरेंद्र मोदी सरकार एमओ मथाई की पुस्तकों पर से प्रतिबंध हटाएगी? संबंधित हिस्सा देख सकते हैं। यह मांग और भी लोगों ने की थी। मुद्दा यह है कि अप्रकाशित किताब की चर्चा नहीं हो सकती है और प्रतिबंधित किताब की चर्चा हुई।

इस किताब के खुलासों से अगर कांग्रेस, सोनिया गांधी और राहुल गांधी को प्रभावित होना चाहिए तो मुझे लगता है कि मेनका गांधी और वरुण गांधी को भी समान रूप से प्रभावित होना चाहिए। अगर उन्हें दिक्कत नहीं है तो सोनिया गांधी और राहुल गांधी या किसी कांग्रेस समर्थक को दिक्कत क्यों होनी चाहिए। रिपोर्ट तो तहलका की भी रही, बंगारू लक्ष्मण का खुलासा हुआ ही है। लेकिन मुख्य मामला तरुण तेजपाल को फंसाने का है। आखिरकार गुजरात फाइल्स के रूप में सामने आ चुकी है। लेकिन उसकी चर्चा संसद में नहीं हुई। जनरल नरवणे की किताब की चर्चा बिल्कुल अलग कारण से की गई थी।

जहां तक संसद में किताबों की चर्चा का सवाल है, निशिकांत दुबे ने जो किया सो किया। सुरेन्द्र किशोर ने लिखा है, “…उन किताबों के बाजार में आने के बाद तब के गोदी मीडिया के एक नामी सदस्य ने लिखा कि मथाई को चौराहे पर कोड़े लगाए जाने चाहिए। ध्यान रहे कि आज किसी तथाकथित गोदी मीडिया ने अब तक यह नहीं कहा है कि बीबीसी डाक्यूमेंट्री बनाने वालों को कोड़े लगाए जाने चाहिए।”

मैं यह सब नहीं लिखता अगर…

  • किताब पर से प्रतिबंध हटा दिया गया होता।
  • किताब की चर्चा संसद में नहीं हुई होती।
  • मेनका गांधी या वरुण गांधी ने इसका विरोध किया होता
  • संसदीय कार्य मंत्री किरन रिजिजू ने लोकसभा अध्यक्ष के कमरे में विरोधी दल के नेताओं के हंगामे का पुराना वीडियो नहीं शेयर किया होता
  • पंडित नेहरू की बहन और भांजी के साथ की फोटुओं का दुरुपयोग नहीं किया जाता
  • एमएम नरवणे की किताब के अंश पढ़ने देकर उसपर कुछ जवाब दिया जाता, अफसोस ही जताया गया होता
  • जनता को बेवकूफ बनाने के लिए दिल्ली पुलिस को जांच में नहीं लगाया जाता जनरल नरवणे की किताब को घोषित रूप से रोक दिया गया होता या विवाद बढ़ने पर मथाई की किताब की तरह प्रतिबंधित कर दिया गया होता
  • अमेरिकी ट्रेड डील के जरिए भारत माता को बेच दिए जाने के आरोप के जवाब में यह नहीं कहा गया होता कि डब्ल्यूटीओ में बेच दिया गया था। (उसका अब क्या मतलब, तभी विरोध करना था)।
  • इंडियन एक्सप्रेस में 20 जुलाई 2024 को प्रकाशित खबर के अनुसार दो सेना प्रमुखों की दो किताबों का लोकार्पण टला था। दूसरी किताब 2002 से 2005 तक सेना प्रमुख रहे एनजी विज की, अलोन इन द रिंग है। इसे अनुमति मिल गई लेकिन कैसे मिली, क्यों रुकी थी – इसकी चर्चा हुई होती।
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