
संजय कुमार सिंह-
आज के अखबारों में एक खबर है, एक जुलाई से आधार प्रमाणित उपयोगकर्ता को ही मिलेगा तत्काल टिकट। अमर उजाला ने इसी शीर्षक से खबर को पांच कॉलम में टॉप पर तान दिया है और उपशीर्षक है, 15 जुलाई से तत्काल बुकिंग के लिए आधार आधरित ओटीपी प्रमाणीकरण भी अनिवार्य होगा। मैं नहीं जानता कि इससे क्या फायदा होगा पर यही समस्या का निदान है तो क्यों नहीं नियम बना दिया जाये कि सिर्फ पासपोर्ट वालों को तत्काल टिकट मिलेगा। इससे टिकट के दावेदार कम होंगे और संभव है समस्या कम हो जाये या कम नजर आये। पर समस्या यह नहीं है कि टिकट नहीं मिलते हैं या दावेदार ज्यादा है – समस्या यह है कि दलाल पहले टिकट कटा लेते हैं और प्रीमियम पर बेचते हैं या ज्यादा पैसे लेकर दलाल ही टिकट कटाते हैं और ओटीपी प्रमाणीकरण से काम मुश्किल जरूर होगा, असंभव नहीं है। जाहिर है, काम मुश्किल होगा तो पैसे बढ़ जायेंगे यात्रियों की समस्या दूर नहीं होगी। टिकटों की कालाबाजारी या दलालों की कमाई पर अंकुश नहीं लगेगा। मुझे लगता है कि आज इस खबर के साथ यह सवाल (और उसका जवाब भी) होना चाहिये था कि इस तरह सरकार ने टिकट के दावेदार कम किये हैं और यही करना है तो विदेशी पासपोर्ट की शर्त भी लगाई जा सकती है। संभव है उसमें आराम से टिकट मिलने लगे पर जरूरत किसकी पूरी होगी? आम नागरिक के लिए मुश्किल नियम बनाना और उसे सुविधाओं से (वरिष्ठ नागरिकों की छूट) वंचित करना सरकार का काम नहीं है। पर सरकार वही करती नजर आ रही है और तत्काल टिकटों की कालाबाजारी रोकने के लिए तकनीकी व प्रशासनिक उपाय नहीं कर पाई है।
आधार की इस व्यवस्था से टिकट खरीद सकने वाले लोगों की संख्या कम होगी जो महंगी और मुश्किल होने के कारण पहले ही कम है। यह सब तब जब उच्च श्रेणी के यात्रियों के लिए कई बार विमान से और कार से जाना कभी सस्ता और कभी सुविधाजनक होता है। सरकार जो कर रही है उससे आम नागरिकों की जरूरत तो नहीं ही पूरी हो रही है, उसे भिन्न सुविधाओं से वंचित किया जा रहा है। जरूरत दलालों पर हल्ला बोलने की है पर जो हुआ उससे उन्हें अपनी सेवा और महंगी करने का मौका मिलेगा। इस आड़ में यात्रियों को जो लूट रहे हैं सो अलग। सरकार अपराधियों को काबू करने की बजाय नागरिकों को सतर्क रहने की सीख दे रही है। अब तो खबरें और शिकायतें भी नहीं छपती हैं। आज के अखबारों में यह खबर अगर किसी टीका टिप्पणी या आलोचना के बिना छपी है तो बीबीसी की उस खबर का जिक्र भी नहीं है जिसके अनुसार कुभ्म की भगदड़ में मरने वालों की संख्या अभी तक घोषित या स्वीकार्य से बहुत ज्यादा है और मरने वालों में भाजपा के एक वरिष्ठ नेता केएन गोविन्दाचार्य के भाई भी हैं। मुद्दा यह है कि भगदड़ में मरने वालों की संख्या कम बताई गई और जाहिर है मुआवजा वगैरह भी नहीं दिया गया होगा और मरने वालों में आम आदमी ही नहीं, वीआईपी (या उनके भाई) भी हैं। फिर भी खबर अब तक दबी रही और खुलासा नहीं कर पाने का कोई अफसोस या शर्म नहीं है।
प्रायश्चित तो मीडिया के साथ सरकार को भी करना चाहिये। वैसे, इसपर मुझे कुछ नहीं कहना है। सिर्फ यह रेखांकित करना जरूरी है कि बीबीसी ने यह खुलासा (केंद्र) सरकार की तमाम मनमानी के बावजूद किया है और इसलिये इसमें खबर भाजपा की आंतरिक राजनीति की भी होगी। वरिष्ठ पत्रकार शीतल पी सिंह ने लिखा है, बीबीसी ने कुंभ के मृतकों के संबंध में जो ऐतिहासिक और विस्फोटक फील्ड रिपोर्ट की है उसका एक बहुत मर्मान्तक मामला बीजेपी/आरएसएस के वरिष्ठ नेता रहे केएन गोविंदाचार्य के भाई केएन वासुदेवाचार्य का है। कुंभ मेले की भगदड़ में वे भी कुचल कर मारे जाने वालों में से एक थे। पहले उन्हें लावारिश मान लिया गया था लेकिन बाद में कोई जानकार व्यक्ति उनके शव को लेकर वाराणसी पहुँचा था जहां उनका अंतिम संस्कार हुआ। केएन गोविंदाचार्य ने बीबीसी संवाददाता से इसकी पुष्टि की। यह खबर आज भी पहले पन्ने पर नहीं है। इससे आप समझ सकते हैं कि आपका अखबार या देश का मीडिया किन खबरों को प्राथमिकता या महत्व देता है। मुझे नहीं पता अखबारों को खबरों के चयन या संपादन से संबंधित कोई नसीहत दी गई है या नहीं और अगर दी गई है तो किसने दी है। फिर भी आज की खबरों में एक खबर है, “मंत्रियों को पीएम की नसीहत : बेवजह बयानबाजी न करें”। नवोदय टाइम्स ने इस खबर को प्रधानमंत्री की फोटो के साथ तीन कॉलम में छापा है और शीर्षक में नसीहत लाल स्याही से है। ठीक है कि यह सब सजावट का मामला है लेकिन खबरों में दम होती तो वैसे ही पढ़ी जाती, ढूंढ़ कर पढ़ी जाती पर प्रचार हो तो सजावट जरूरी है।
सजावट और प्रचार वाली ऐसी ही खबरों में आज एक खबर है, सीमा सुरक्षा बल के लिये गंदी ट्रेन। यह द टेलीग्राफ के पहले पन्ने पर सिंगल कॉलम की खबर है और इसका विस्तार अंदर है। पहले पन्ने की इस खबर के अनुसार, रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव ने इसके लिए चार रेल अधिकारियों को निलंबित कर दिया है और जांच के आदेश दिये हैं। कहने की जरूरत नहीं है कि रेलवे एकाधिकार वाला एक (सरकारी) सेवा प्रदाता है और वह देश के आम नागरिकों समेत सेना तथा सुरक्षा बलों को पैसे लेकर सेवा मुहैया कराती है। ऐसे में बीएसएफ को गंदा कोच देना उसकी सेवा की गुणवत्ता बताता है। रेल मंत्री ने कार्रवाई अब की है मतलब है उन्हें सेवा के इस स्तर की जानकारी नहीं थी। भले ही कार्रवाई बीएसएफ को गंदा कोच देने के लिए की गई है पर वास्तविकता यह है कि किसी भी ग्राहक या उपभोक्ता के साथ ऐसा नहीं किया जाना चाहिये। किया गया, मतलब किया जाता रहा है और उसका कारण होगा। रेल मंत्री को चाहिये कि वे उस कारण को दूर करें, अखबारों का काम है कि उस बारे में बतायें। पर अमर उजाला बता रहा है कि रेल अधिकारियों की ओर से सेवा में चूक के लिए रेल मंत्री ने कार्रवाई की है। कुल मिलाकर, यह रेल मंत्री और सरकार की गैर जरूरी प्रशंसा है। रेलवे ने जो किया वह होना ही नहीं चाहिये था, कार्रवाई की जरूरत ही नहीं होनी चाहिये थी और ऐसा किसी भी ग्राहक या उपभोक्ता के साथ नहीं होना चाहिये पर सब हुआ और अखबार बता रहा है – रेल मंत्री वैष्णव ने कहा, सुरक्षा बलों की गरिमा सर्वोच्च, इससे कोई समझौता नहीं करेंगे। मुझे लगता है यह पत्रकारिता या संपादन नहीं – मंत्री और सरकार की चापलूसी का स्तर है। अगर पत्रकारिता कायदे से हो रही होती तो यह संभव ही नहीं था कि किसी ग्राहक को रेलवे गंदा कोच दे। पूरी व्यवस्था की बुरी हालत बताने वाली यह खबर आज कम से कम अमर उजाला में ऐसे छपी है जैसे रेल मंत्री ने कोई महान कार्य किया हो। उपशीर्षक रूप में मंत्री के दावे को छाप कर रही-सही कसर पूरी कर दी गई है।
आज 12 जून है और इंडियन एक्सप्रेस में छपी एक खबर के अनुसार, 1971 में इसी तारीख को इलाहाबाद हाईकोर्ट के जज, जगमोहन लाल सिन्हा ने तबकी प्रधानमंत्री के खिलाफ फैसला दिया था। इससे पहले लगातार दो दिनों तक उनसे जिरह हुई थी। मुझे लगता है कि यह कोर्ट (या न्याय व्यवस्था) का सम्मान था जो भाजपा के सत्ता में आने से पहले तक कायम था। अब जो हो रहा है और जज लोया से संबंधित जो किस्से हैं, तथा बाद के जो मामले हुए हैं उससे साफ है कि हाईकोर्ट तो क्या सुप्रीम कोर्ट में भी मामले दर्ज कराना और दर्ज हो जाये तो समय पर सुनवाई होना कितना मुश्किल है। यह अलग बात है कि इंदिरा गांधी ने इस फैसले के बाद इमरजेंसी लगाई और जनता पार्टी की सरकार बनी जो ढाई साल ही चली और फिर बिखर गई। ऐसे में मौजूदा समय को अघोषित आपातकाल कहा जाता है और अब भले 50 साल पहले के फैसले और फिर 25 जून को इमरजेंसी की याद की जायेगी पर सच यह है कि सत्ता में बने रहने के लिए अब जो तरीके अपनाये जा रहे हैं वो ज्यादा खतरनाक हैं। पर अलग मुद्दा है। मुझे सिर्फ यह रेखांकित करना है कि इंडियन एक्सप्रेस ने आज इसे याद किया है और लीड से ज्यादा महत्व दिया है। सोशल मीडिया पर सरकार का समर्थन करने वाले वरिष्ठ पत्रकार सुरेन्द्र किशोर ने भी आज इसे याद किया है। असल में यह प्रभात खबर के पटना संस्करण में छपी उनकी रिपोर्ट है।
दि एशियन एज की आज की लीड प्रधानमंत्री की घोषणा या उनका यह दावा है कि पिछले 11 वर्षों में संरचना क्षेत्र में आई तेजी लोगों के जीने और विकास की सहूलियतें बढ़ा रही हैं। मुझे प्रधानमंत्री के दावे या उसे प्रमुखता दिये जाने से दिक्कत नहीं है। यह संपादकीय विवेक का मामला है और इसमें यह ध्यान रखा जाना चाहिये कि 11 वर्षों में संरचना क्षेत्र में जो विकास हुए हैं उसके बावजूद लोग ट्रेन से गिर कर मर रहे हैं या तत्काल टिकटों की मांग कम नहीं हो रही है, उपलब्धता ठीक नहीं हो रही है, हवाई यात्रा हवाई चप्पल वालों के लिए नहीं हो पाई है इसलिए उसके हकदार या दावेदार लोगों की संख्या कम करने की व्यवस्था की जा रही है। इससे अगर तत्काल टिकट की समस्या खत्म भी हो जाये तो भीड़ के कारण लटक कर चलने को मजबूर रेल यात्रियों की समस्या कम नहीं होगी और ना ही उनका जीवन स्तर बढ़ा है। बाकी संरचना निर्माण क्षेत्र में घपले, घोटाले, बंदरबांट, चंदा-दान और इलेक्टोरल बांड के किस्से अपनी जगह हैं जो अभी तक खबर नहीं बनी है और बनने के लक्षण भी नहीं हैं। ऐसे में जो खबरें छप रही हैं उनके बारे में कुछ कहने-बताने की जरूरत नहीं है, आप अखबार के नाम के साथ शीर्षक से ही समझ जायेंगे कि क्या चल रहा है। उदाहरण के लिए, हिन्दुस्तान टाइम्स की लीड का शीर्षक है, सरकार की योजना 2029 के चुनाव से पहले महिला आरक्षण और कोटा पर है। ऑपरेशन सिन्दूर के जरिये या बहाने महिलाओं को आकर्षित करने की भाजपा की कोशिशों के बाद यह उसका दूसरा दांव हो सकता है। इसे समझने वालों के लिए अगली चिन्ता है, इसका उद्देश्य क्या हो सकता है।
टाइम्स ऑफ इंडिया में आज लीड और सेकेंड लीड दोनों खास है। लीड की बात पहले करूं एक वरिष्ठ अमेरिकी जनरल के मुताबिक पाकिस्तान आतंकवाद के मुकाबले में गजब का साझेदार है। खासतौर से इसलिये कि उसके सैनिक शासक आतंकियों को मांग पर वाशिंगटन को सौंप देते हैं। ऐसे में अमेरिका और ट्रम्प के युद्धविराम कराने के मायने समझना ज्यादा मुश्किल है और यह दिलचस्प है कि अमेरिकी जनरल ने यह भी स्वीकार किया है कि पाकिस्तानियों ने अमेरिका में हमलों की साजिश रची। ऐसे में अगर पाकिस्तानी आतंकियों की खबर भारत में ऑपरेशन सिन्दूर के तहत ले रहा था तो अमेरिका को युद्ध विराम कराने की जरूरत क्यों प़ड़ी और भारत को किन कारणों से उसे स्वीकार करना पड़ा – समझना और जानना मुश्किल है। खासकर तब जब द हिन्दू की लीड के अनुसार भारत और अमेरिका सीमित व्यापार करार की ओर बढ़ रहे हैं। आप जानते हैं कि सत्ता संभालने के बाद ट्रम्प ने टैरिफ का नया बवाल छेड़ा था और उसमें ‘अबकी बार ट्रम्प’ के लिए कोई मुरव्वत नहीं थी। यही नहीं, अमेरिका ने जब अवैध रूप से रह रहे भारतीयों को वापस भेजा तो उसमें भी भारत या प्रधानमंत्री मोदी से दोस्ती का ख्याल नहीं रखा और सबको बेड़ियों में सैनिक विमान से भेज दिया। नरेन्द्र मोदी ने इन सब चीजों का विरोध तो नहीं ही किया मोदी समर्थक इसका भी समर्थन करने लगे या इसे मामूली बात बता दिया।
इन सब कारणों से हुए राजनीतिक नुकसान की भरपाई के लिए नरेन्द्र मोदी ने ऑपरेशन सिन्दूर जैसे नाम वाला अभियान छेड़ा जो युद्ध में बदल गया और जब सब ठीक चल रहा था तभी ट्रम्प ने अचानक युद्ध विराम की घोषणा कर दी और न सिर्फ युद्ध रुक गया ट्रम्प ने बार-बार इसका दावा करके प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। युद्ध विराम के कारणों में व्यापार तो था ही। ऐसे में पाकिस्तान की तारीफ और मांग पर आतंकियों को सौंप देने की विशेषता का बयान, व्यापार और युद्ध विराम के साथ उसका दावा बहुत सारे सवालों को जन्म देता है और लगता नहीं है कि इनका जवाब देश के अखबारों में मिलेगा। सरकार कभी कुछ बताने की योजना बनाये तो बात अलग है। सच्चाई यह है कि भारत के साथ अमेरिका भी एंटायर पॉलिटिकल साइंस की प्रयोगशाला बनता लग रहा है और अमेरिका को नुकसान हो या नहीं, भारत के नुकसान तो अब बहुत साफ और चीखने वाले हैं।



