सोरभ द्विवेदी के लल्लनटॉप छोड़ने के बाद सोशल मीडिया पर उनके नाम की बाढ़ चल रही है। इस बाढ़ में परसों से अबतक तमाम शब्दरूपी पानी बहाया जा चुका है। सबको एक ही चिंता खाए जा रही है कि सौरभ अब जाएंगे कहां..? इसका उत्तर नीचे लिखे ऑप्शन में पढ़कर निकालिए…
राजशेखर त्रिपाठी-
लल्लन टॉप से सौरभ द्विवेदी की विदाई हो गयी। होनी ही थी, सबकी एक वक्त के बाद कहीं न कहीं से होती है। मगर अजीब है कि आगे नए ठीहे की बात करके, वो पीछे बहुत कुछ अनुत्तरित छोड़ रहे हैं। मसलन दो सवाल –
- वो निकाले गये हैं या खुद जा रहे हैं। इस पर कोई ‘ट्रेजिडी किंग’ ख़ुद कभी कुछ नहीं कहता, मगर असल कहानी सूत्रों के ज़रिए ‘भड़ास’ जैसे प्लेटफार्म पर आ ही जाती है। सौरभ अपनी चुप्पी से लगातार इसे हवा दे रहे हैं। लल्लन टॉप के ज़रिए एक कल्ट बना, तो उसके समर्थक व्यक्ति पूजन में लगे हैं। अहो रूपम-अहो ध्वनि हो रही है। इस बीच एक अफवाह ये भी है कि 2027 के यूपी चुनाव से पहले वो दूरदर्शन पर दिखने लग सकते हैं, आखिर लल्लन टॉप को गोबर पट्टी के अंदाज़ में ही खड़ा किया गया। सौरभ खुद बुंदेलखंड वाले हैं। याद रखिए कि वो ब्राह्मण भी हैं और शिशु मंदिर वाले भी। शिशु मंदिर की तारीफ़ के वो ‘ऑन स्क्रीन’ पुल बांध देते रहे। उनके बाद लल्लन टॉप की कमान जिस कुलदीप मिश्रा के हाथ जा रही है वो भी शिशु मंदिर के ही प्रोडक्ट हैं।
सौरभ ने बाद में जेएनयू से हिंदी में एम ए किया और आईआईएमसी से पत्रकारिता की। प्रो मैनेजर पांडेय कहते थे कि जो जेएनयू आता है उसे जेएनयू हो जाता है; मैं कहता हूं शिशु मंदिर एक संस्कार है जो बचपन में ही जातक के दिल ओ दिमाग़ में बिठा दिया जाता है। अब लल्लन टॉप में ब्राह्मणों को भर लेने के आरोपों पर मुझे कुछ नहीं कहना।
2..”मैं तो समझा लल्लन टॉप उन्हीं का है!” ये मूर्खतापूर्ण मासूमियत से पूछा जा रहा दूसरा सवाल है! अगर आप मीडिया पर कोई सवाल उठा रहे हैं, और बेसिक बात नहीं समझ रहे तो-कहीं कुछ तो है! तो ये वो दूसरा ‘कुछ’ है जिसे सुचिंतित तरीक़े से हवा दी जा रही है। सच्चाई इसमें इतनी है की सौरभ ने ब्लॉगिंग के अंतिम चरण में शुरूआत की थी। उससे पहले वो हिंदी अखबारों में अंधकारमय जीवन गुजार रहे थे। लल्लन टॉप की जो भाषा है, उसका टोन सौरभ की ब्लॉगिंग में ही दिख रहा था। सौरभ अखबारी दिनों में ही ‘तीन ताल’ वाले ताऊ कमलेश सिंह से कहीं टकरा गये थे। जब आजतक वालों ने डिजिटल पर फोकस बढ़ाया तो ताऊ भी लाए गये। अतरंगी आइडियाज़ के माहिर कमलेश ताऊ ने सजा-धजा के लल्लन टॉप की फाइल आगे की, और मामला बन गया। लल्लन टॉप बड़े स्केल पर तब गया जब पुरी परिवार ने इस ब्रांड को कानूनन हाथ में ले लिया।
ये सारी बातें थोड़े बहुत अंतर के साथ ख़ूब कही सुनी जाती हैं। सौरभ को इसलिए रखा गया कि लल्लन टॉप की आत्मा वही रहे। कमलेश ताऊ सबके बॉस बने रहे। मगर लल्लन टॉप तब तक टुडे ग्रुप में अलग टापू बन गया। सौरभ द्विवेदी का कद अब ‘आर्क साइज” हो गया। तब के युवा हिंदी पत्रकार की रिहाइश अब बसंत कुंज/बसंत विहार में है। चंडीगढ़ के क़रीब कहीं खेती योग्य ज़मीन है। गाड़ी तो सबके पास होती है, उनके पास भी ‘थार’ है…अफसोस बस यही है कि हिंदी साहित्य वाले सौरभ द्विवेदी की पत्नी की रुचि…All these Hindi stuff…में नहीं है। ये उन्हीं का बताया है, स्क्रीन पर।


बाकि कमेंट करने वाले भूल जाते हैं कि उनकी मौजदूगी अमित शाह के डाइनिंग टेबल पर ही नहीं नौजवानों के बीच भी रहती है!

अरविंद चोटिया-
सौरभ द्विवेदी को लेकर कई अटकलें हैं
- बताया जा रहा है कि वे विकास दिव्यकीर्ति के साथ एक नई शुरुआत करने जा रहे हैं। अगर दोनों साथ मिलकर काम करते हैं तो निश्चित रूप से एक और एक 11 है होने वाली स्थिति है। दोनों ही जाने पहचाने चेहरे हैं और अपने-अपने फील्ड के मास्टर हैं।
- लल्लनटॉप छोड़ने के बाद सौरभ के पुराने चेले अभिनव पांडे कभी नोएडा फिल्म सिटी में नजर नहीं आए थे लेकिन वहां के मित्र बता रहे हैं कि कल शाम अभिनव पांडे नोएडा फिल्म सिटी में देखे गए थे। बताया यह भी जा रहा है की न्यूज़ पिंच और अपने चेलों को सौरभ का आशीर्वाद रहा है। हो सकता है अब तीनों पुराने साथी फिर से एक जगह दिखाई दें।
- सौरभ मुंबई जा सकते हैं और फिल्म लेखन का काम कर सकते हैं। हालांकि वे प्रतिभावान हैं तो वहां भी सफल ही रहेंगे लेकिन जानकारों का कहना है कि वे अपने मूल काम से हटकर दूसरा काम शायद ही करें।
इसके अलावा भी कई अटकलें सौरभ को लेकर लगाई जा रही है। हालांकि कल नोएडा फिल्म सिटी स्थित स्टूडियो से विदा लेते वक्त सौरभ कई लोगों से मिले। किसी को अध्ययन अवकाश पर जाने की बात कही तो किसी को भरोसा दिया कि उनके पास अच्छा ऑफर आने वाला है।
अभिषेक चौरे-
सौरभ द्विवेदी अचानक लल्लनटॉप छोड़ गए। इंटरनेट पर प्रतिक्रिया मिश्रित है। कोई उनकी विचारधारा से नाराज है, कोई पक्षपाती कह रहा है। दूसरी तरफ कुछ लोग दुखी हैं, उन्हें लल्लन टॉप का पर्याय मान रहे हैं। मेरी स्थिति भावनात्मक है, क्योंकि मैं उनका प्रशंसक रहा हूं, पर असहमति के साथ। उनमे कई ऐसी बातें हैं जिनकी तारीफ होनी चाहिए। अव्वल तो मैं यह समझता था कि लल्लनटॉप उन्हीं का प्रयास है। बाद में पता चला कि वह शुरुआत से ही इंडिया टुडे ग्रुप का वेंचर था। यानी वे सिर्फ कर्मचारी थे, और जैसा कि कॉर्पोरेट में होता है, जब कोई कर्मचारी ब्रांड से बड़ा हो जाए, तो उसे हटा दिया जाता है।
मैं सौरभ द्विवेदी को डिजिटल हिंदी पत्रकारिता की दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण व्यक्ति मानता हूं। क्योंकि वे एक ऐसे शख्स हैं, जिन्होंने खुलकर किताबों की बात की, जिन्होंने कलाकारों से बात की, जिन्होंने नौजवानों को अच्छी हिंदी से परिचित करवाया, जिन्होंने लंबे इंटरव्यू देखने सुनने का सलीका सिखाया, रील्स के दौर में नौजवान धीरज से घण्टों बैठकर इंटरव्यू देख रहे हैं, यह बड़ी बात है।
इसके अलावा सौरभ ने छोटे शहरों की बात की, गांव कस्बों की बात की, वहां के खान-पान की बात की। औरैया के रमाकांत हलवाई की बालूशाही कैसे जबान पर घुल जाती है, बैगन की सब्जी बुंदेलखंड में क्या गजब बनाई जाती है, बताया। बनारस की चाट से लेकर कलकत्ता कि मिठाईयों के बारीक विवरण सुनाए। ये विषय हमारे रोजमर्रा के जीवन का रस हैं, लेकिन इन पर कभी गहनता से मीडिया में बात नहीं होती, यह चलन उन्होंने तोड़ा।
इंटरव्यू के शुरू में आने वाले मोनोलॉग, जो पहले सबको अच्छे लगते थे, बाद में कुछ लोग ऊबने लगे, लेकिन उनकी गुणवत्ता कम नहीं हुई। बल्कि मुझे तो वे इंटरव्यू के सबसे अच्छे हिस्सों में एक लगते थे। एक समय था जब लोकप्रिय शख्सियतें खुद को खुशकिस्मत मानती थीं, अगर सौरभ उनका परिचय दें।
डिजिटल दुनिया के कचरे के बीच, इतिहास को लेकर राजनीति को लेकर, साहित्य को लेकर, रंगमंच को लेकर, चित्रकला को लेकर गंभीर चर्चाएं करने वालों में सौरभ अव्वल कहे जा सकते हैं। उनका महत्व इसलिए भी है कि उन्होंने अकादमिक माने जाने वाले विषयों को टेक सेवी युवाओं में लोकप्रिय बनाया। कमर्शियल या समानांतर दोनों तरह के सिनेमा को दृश्य और संवाद से परे जाकर किस तरह देखा जाता है, यह भी उन्होंने नई पीढ़ी को बताया। हालांकि उनका टेस्ट एक खास तरह का है, जिसमें हासिल, गुलाल, वासेपुर, मसान आदि फिल्में अच्छी मानी जाती हैं।
बाद के दिनों में इंटरव्यू में उनका दखल थोड़ा बढ़ता गया। इंटरव्यू बहस जैसे लगने लगे। लेकिन जो इंसान पढ़ा लिखा होता है उसके अंदर वाद प्रतिवाद करने की स्वाभाविक प्रवृत्ति होती है। एंकर के नाते इस पर काबू करना चाहिए, लेकिन कभी-कभी वे दायरे से आगे निकल जाते थे। कहीं फैन बॉय भी बन जाते, जो अजीब लगता।
कुल मिलाकर सौरभ लल्लनटॉप के एम्बेसेडर बन गए थे। अब मैं चाहता हूं कि वे उच्च कोटि की बौद्धिक पत्रकारिता के उदाहरण बनें। साथ ही लल्लनटॉप को भी शुभकामनाएं देता हूं कि वे अपना स्तर बनाए रखें। हालांकि यह कठिन होगा, क्योंकि जिस तरह पलकी शर्मा ने Wion छोड़ दिया और फर्स्ट पोस्ट पर आ गईं, तो हम भी वहीं चले गए। उसी तरह अगर सौरभ कुछ नया शुरू करेंगे, तो हम एक बार वहां जरूर जाएंगे।
बाकी वैचारिक स्तर पर उनका झुकाव वाम की तरफ है, यह हम जानते हैं, शायद शिक्षा का असर हो। वैसे कोई व्यक्ति आदर्शवादी हो अकादमिक हो तो वाम की तरफ थोड़ा झुक ही जाता है। इस मुद्दे पर बहस की गुंजाइश है, लेकिन इसका यह कतई अर्थ नहीं है कि उनका योगदान शून्य कह दिया जाए। वैसे भी उनको देखकर लगता है कि जैसे एक भदेस, अभिजात्य के बीच जगह तलाश रहा हो, हल्का असमंजस है व्यक्तित्व में।
मुझे आशा है कि जो भी नया काम वे शुरू करेंगे उसमें दर्जा बनाए रखेंगे। किताबों की, संगीत की, कला की, रंगमंच की इतिहास की, विज्ञान की तमाम तरह की बातें करेंगे। राजनीति और धर्म की तो करेंगे ही जैसे पहले करते आये हैं और उसमें कलह भी खूब होगी। जो भी हो बात होती रहनी चाहिए और बात करना सौरभ को अच्छी तरह आता है।



