हितेंद्र पटेल-
सुरेंद्र प्रताप सिंह से लेकर सौरभ द्विवेदी तक के अनुभव से यही सीखा जा सकता है कि बिजनेस हाउस के लिए किसी भी आदमी की कोई अहमियत नहीं होती। असली चीज़ है उसका अपना मंच। लोग आते जाते रहते हैं।
सौरभ द्विवेदी बहुत उच्च कोटि के पत्रकार नहीं हैं लेकिन उन्होंने एक भाषा को उसकी शक्ति के साथ रखा और लोगों को पसंद आई वह बात । उनके इंटरव्यू खूब देखे गए । उनकी एक पहचान बन गई। रवीश कुमार की तरह वे एक प्रभावशाली हिंदी के पत्रकार बन गए।
आपको याद हो विनोद दुआ की। प्रणव राय शो में उनकी चुस्त भाषा का प्रभाव उन्हें बहुत प्रभावी बनाता था। हिंदी में पत्रकारिता के क्षेत्र में कई नाम हैं जिन्होंने ही हिंदी में पत्रकारिता की और खूब पसंद किए गए।
सौरभ द्विवेदी ने एक और काम किया। वे फ़ारूक़ी, धर्मवीर भारती, रामधारी सिंह दिनकर आदि का नाम लेते थे और हिंदी लेखकों को लोकप्रिय कर रहे थे।
मुझे याद है बिलासपुर के एक पुस्तक विक्रेता ने बताया था कि सौरभ द्विवेदी के कारण उनके यहाँ हिंदी पुस्तकों की बिक्री बहुत बढ़ गई है। सौरभ द्विवेदी अब एक नए मंच का निर्माण करेंगे लेकिन उतना असर पैदा कर पाएंगे या नहीं यह देखने की बात होगी।
हिंदी जगत में अच्छे पत्रकारों को समर्थन देने की ज़रूरत है। हाउस वाले अपना काम अपने तरीक़े से करते हैं।
महेश शर्मा-
पत्रकारिता में लल्लनटॉप, सौरव द्विवेदी ने लल्लनटॉप और इंडिया टुडे को good bye कह दिया। वैसे भी वह पत्रकार ही क्या जो किसी मीडिया ब्रांड में बोतल के लेबल सा चिपक जाय। बदल देना चाहिए संस्थान। ज्यादा से ज्यादा 7-8 साल। आप उपयोगी हैं तो लोग हाथों-हाथ लेंगे वरना बड़े हैं तो दही में पड़े हैं।
सौरव में बिलाशक टैलेंट तो कूट-कूटकर भरा है। मैं उन्हें तब से देख सुन रहा हूँ जब वह इंडिया टुडे के पूर्व सम्पादक अंशुमान तिवारी का हफ्ते में एकबार (कभी-कभार दो बार भी) अर्थ व्यवस्था पर इंटरव्यू लिया करते थे। उनके इस प्रोग्राम का नाम था खर्चा पानी।
यह गालिबन 2021 की बात होगी। मैं उसी वर्ष ओडिशा से इंडिया टुडे में नियमित लेखन से अलग हुआ था और घर वापसी (कानपुर) की। 2022 में विधानसभा चुनाव के ठीक पहले दैनिक जागरण के स्वनामधन्य सम्पादक स्व. शैलेन्द्र दीक्षित ने पोर्टल व यूट्यूब चैनल शुरू किया था जिसमें मुझे एक्जिक्यूटिव एडिटर नियुक्त किया था।
बिरहाना रोड में बुद्धसेन मिष्ठान भंडार के ठीक सामने वाली बिल्डिंग में दफ्तर था। सौरव द्विवेदी हाथ में माइक पकड़े वहीं पर चुनाव चर्चा के लिए आए थे। दिल खोलकर बातें हुईं। उनके मुंह से सामने वाले के लिए ‘गुरू’ का सम्बोधन बिल्कुल अपनापा का एहसास कराता था। लगता ही नहीं था कि वो जालौन के हैं। ठेठ कनपुरिया अंदाज़। यहां टॉक शो भी किया था मोतीझील में।

लल्लन टॉप पर खबरों का प्रसारण, विश्लेषण, इंटरव्यू ज्यादातर देखता था। उनकी उन्हें सबसे अलग रखती थी। ‘does god exist’ पर उनका शो ग़ज़बई रहा। जावेद अख्तर और मुफ़्ती शमाईन के बीच बहस, फिर प्रश्नकाल। मजा आ गया था सुनकर। सौरव ज्ञानी पत्रकार हैं। बिल्कुल हमारे अंशुमान तिवारी की तरह। इंटरव्यू के तो बिल्कुल देसी अंदाज़। शख्सीयत कुर्सी पर और खुद मेज पर बैठकर सवाल-जवाब। न्यूज़ रूम में बाकी साथी भी मुखातिब। कोई बैठा तो कोई खड़ा। बिल्कुल टीम स्प्रिट वाला भाव प्रदर्शित होता है।
सौरव के सम्पादन में इंडिया टुडे का साहित्य वार्षिकी अंक ‘शब्द सदा: निकला तो लपक कर 300 में खरीद लाया। सोचा, सौरव द्विवेदी के सम्पादन में निकला अंक बहुत पठनीय होगा। सच था। सुना है सौरव अपना वेन्चर स्टार्ट करेंगे। लगता है जैसे कोई नया ब्रांड मीडिया बाजार में स्थापित होने वाला है। आपको बधाई सौरव। देखते हैं वही अंदाज़ होगा या कुछ बदले हुए सौरव दिखेंगे। आल दि बेस्ट।



