मोदी सरकार को सोशल मीडिया की बेबाकी खलने लगी, लगाम लगाने की तैयारी!

व्हाट्सएप विवाद पैदा करने के पीछे कहीं 2019 का लोकसभा चुनाव तो नहीं? मोदी सरकार 2019 के लोकसभा चुनाव के मोड में भी आ गई है। प्लानिंग से लेकर जनसंपर्क अभियान जोरशोर से चल रहा है। मीडिया के तमाम माध्यमों पर शिकंजा कसा हुआ है। चैनल हो या अखबार कोई भी सरकार के अंदर की खबर दिखाने से परहेज बरत रहे हैं। इक्का दुक्का चैनल या अखबार यदि यह दुस्साहस कर भी लेते हैं तो वह ज्यादा दिनों तक मैदान में टिक नहीं पाते। किसी न किसी बहाने उन्हें भी कमजोर कर दिया जाता है।

ले दे कर सोशल मीडिया ही रह गया है जहां सरकार के खिलाफ या फिर हकीकत से जुड़े समाचार देखने को मिल जाते हैं। अब मोदी सरकार को सोशल मीडिया की यह बेबाकी भी खलने लगी है। खतरा इस बात का महसूस होने लगा है कि सोशल मीडिया पर आने जाने वाली सामग्री मसलन लेख, आलेख, फोटो, वीडियो आदि 2019 के लोकसभा चुनाव में पलीता न लगा दे। खतरे की आशंका के साथ ही शुरू हो गई है सोशल मीडिया पर अंकुश लगाने की कवायद। शुरुआत व्हाट्सएप से हुई है। फेसबुक की शाखा व्हाट्सएप के साथ भारत सरकार के मंत्रियों का पत्राचार शुरू हो गया है।

मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक इस साल व्हाट्सएप के जरिए फैली अफवाहों के कारण एक दर्जन से भी ज्यादा लोग मारे गए हैं। सबसे ताजा मामला महाराष्ट्र का है, जिसमें बीते रविवार को 7 लोगों को बच्चों को अगवा करने वाले अफवाह की वजह से पीट-पीट कर मार दिया गया। इस मॉब-लिंचिंग की घटना के बाद से केन्द्र सरकार की तकनीकि मंत्रालय ने सख्ती दिखाते हुए व्हाट्सएप को तत्काल कारवाई करते हुए अफवाहों को रोकने के लिए सार्थक कदम उठाने के लिए कहा।

मंत्रालय ने व्हाट्सएप से कहा कि व्हाट्सएप की सेवा का इस्तेमाल करके शरारती तत्व अफवाहों को तेजी से फैला रहे हैं, इसके लिए कंपनी को अपनी जिम्मेवारी समझनी चाहिए और सकारात्मक कदम उठाना चाहिए। इस पर व्हाट्सएप ने कहा कि केन्द्र सरकार की तरह ही हम भी मॉब-लिंचिंग की घटना से आहत है और जल्द ही इसका समाधान निकालना चाहते हैं। लेकिन वाकई में जो दिख रहा है क्या वही सत्य है? या फिर परदे के पीछे का खेल कुछ और है। देश में एक बहुत बड़े वर्ग का मानना है कि व्हाट्सएप के बहाने सोशल मीडिया पर लगाम की कवायद आगामी लोकसभा चुनाव के मद्देनदर की जा रही है।

मोदी को प्रधानमंत्री की कुर्सी तक पहुंचाने में सोशल मीडिया की अहम् भूमिका रही है। 2014 के चुनाव में इस मीडिया का इस्तेमाल भरपूर तरह से किया गया था। अब यह फार्मूला अन्य दलों के हाथ भी लग गया है। अब वे भी इसका खुल कर मोदी सरकार के खिलाफ इस्तेमाल करने लगे हैं। इससे भाजपा काे खतरा नजर आने लगा है। भाजपा नेताओं को लगने लगा है कि चुनाव के दौरान पार्टी और नेता के खिलाफ हवा बनाने में इसका इस्तेमाल होगा और फिर चुनाव परिणाम कुछ भी हो सकता है।

वैसे यह तो सच है कि सोशल मीडिया से फैली अफवाहों के शिकार अब आम आदमी के साथ-साथ केंद्रीय मंत्री और राष्ट्रीय पार्टियां और उससे जुड़े लोग भी होने लगे हैं। सुषमा स्वराज और कांग्रेस की राष्ट्रीय प्रवक्ता प्रियंका चतुर्वेदी के साथ हुई ‘साइबर बुलिंग’ इसके ताजा उदाहरण हैं। प्रियंका का आरोप है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनके मंत्रियों की चुप्पी ट्रोलरों को बढ़ावा दे रही है, उनके हौसले बढ़ा रही है। ट्विटर पर कथित राष्ट्रवादी हिंदू ट्रोलर ने प्रियंका की बेटी को लेकर अभद्र टिप्पणी की थी। मीडिया में हंगामा मचने के बाद पुलिस एक्टिव मोड में आई और अंतत: संबंधित व्यक्ति को गिरफ्तार कर लिया गया है।

साइबर एक्सपर्ट का मानना है कि अगर वेरिफाइड अकाउंट हो तो ट्रोलिंग पर लगाम लग सकती है। लेकिन पुलिस व भुक्तभोगियों का मानना है कि इससे कुछ खास फायदा नहीं होगा, क्योंकि ट्रोलिंग अमूमन ‘अनोनिमस’ अकाउंट से ही होती है। ये लोग अपनी पहचान छिपाकर ट्रोल करते हैं।

कोई माने या न माने, लेकिन मेरी दलील यह है कि फेसबुक, गूगल और टिवटर आदि को दुनिया में यदि कहीं सबसे ज्यादा कमाई, लूट और मनमानी की छूट मिली हुई है तो वह भारत में है। आखिर यह छूट अब तक क्यों मिली हुई है? अब सरकार का ध्यान इस तरफ क्यों गया है? चीन, रूस व कई यूरोपीय देशों ने इन कंपनियों को पाबंदी लगाई हुई है। चीनियों ने तो अपनी भाषा में सबकुछ खुद का बनाया हुआ है लेकिन अंग्रेजी के हम गुलाम हिंदुओं ने इसे सिर पर बिठा रखा है।

मालूम हो कि भारत में व्हाट्सएप के 200 मिलियन यानी कि 20 करोड़ से भी ज्यादा यूजर्स हैं। इसकी वजह से कोई भी अफवाह व्हाट्सएप के जरिए आग की तरह फैलती है। केंद्र सरकार के महिला एवं बाल विकास मंत्रालय ने कुछ समय पहले ‘हैशटैग आई एम ट्रोल्ड’ हेल्पलाइन शुरू की थी, जिसका मकसद महिलाओं के खिलाफ ट्रोलिंग पर एक्शन लेना था, लेकिन यह पहल क्या कारगर हो पाई है? अधिकांश महिलाओं का अनुभव है कि हमने भी ‘हैशटैग आईएमट्रोल्ड’ पर शिकायतें भेजी थीं, लेकिन कुछ नहीं हुआ। इस तरह की नीतियां ध्यान भटकाने के लिए ही बनाई जाती हैं।

सूचना तकनीक मंत्री रविशंकर प्रसाद ने व्हाट्सएप को पत्र लिख कर अफवाह फैलाने वाली सामग्री पर रोक लगाने के लिए कोई व्यवस्था करने को कहा है। इससे पहले भी रवि शंकर प्रसाद ने फेसबुक के सीईओ मार्क जुकरबर्ग को समन भेजने की बात कही थी। लेकिन हुआ कुछ भी नहीं था।

लेखक संदीप ठाकुर दिल्ली के वरिष्ठ पत्रकार हैं. संपर्क : sandyy.thakur32@gmail.com


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