मोदी सरकार को सोशल मीडिया की बेबाकी खलने लगी, लगाम लगाने की तैयारी!

व्हाट्सएप विवाद पैदा करने के पीछे कहीं 2019 का लोकसभा चुनाव तो नहीं? मोदी सरकार 2019 के लोकसभा चुनाव के मोड में भी आ गई है। प्लानिंग से लेकर जनसंपर्क अभियान जोरशोर से चल रहा है। मीडिया के तमाम माध्यमों पर शिकंजा कसा हुआ है। चैनल हो या अखबार कोई भी सरकार के अंदर की खबर दिखाने से परहेज बरत रहे हैं। इक्का दुक्का चैनल या अखबार यदि यह दुस्साहस कर भी लेते हैं तो वह ज्यादा दिनों तक मैदान में टिक नहीं पाते। किसी न किसी बहाने उन्हें भी कमजोर कर दिया जाता है। Continue reading

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राहुल गांधी में नेतृत्व क्षमता है?

संदीप ठाकुर

राहुल गांधी का नाम सुनते ही आपके जहन में सबसे पहले उनकी कौन सी छवि
उभरती है…पप्पू वाली या गंभीऱ। पप्पू वाली न। आप बिल्कुल सही हैं। इसके
बाद  उनकी कौन सी बात याद आती है। यदि में गलत नहीं हूं तो आपको याद आती
हाेगी, आलू की फैक्ट्री या नारियल जूस वाली कहानी। या फिर याद आती होगी
उनके ऊपर चल रहे सोशल मीडिया के जोक्स और भाजपा नेताओं द्वारा समय समय
पर किए गए कटाक्ष। जरा सोचिए, क्या इन बातों के आधार पर राहुल को जज
किया जा सकता है? सही मायने में राहुल गांधी पप्पू हैं? क्या राहुल
गांधी पॉलिटिकल मैटीरियल नहीं हैं? क्या राहुल गांधी में नेतृत्व क्षमता
नहीं है?

यह सवाल मेरे जहन में तब आया जब मैंने हाल ही में अमेरिका दौरे के
दौरान दिए गए उनके चंद भाषण सुने। आपको भी यूएस दौरे में दिए उनके
भाषणों पर एक नजर डालनी चाहिए.। वो इसलिए कि अगला सवाल जो मैं उठाने जा
रहा हूं उसे समझने में मदद मिलेगी। सोनिया गांधी के बाद राहुल गांधी ही
कांग्रेस पार्टी की कमान थामेंगे, ये तो तय है लेकिन कब? ये सवाल कई
सालों से फ़िज़ा में तैर रहा है। लेकिन अब राहुल की अध्यक्ष पद पर ताजपोशी
नहीं टल सकती क्योंकि चुनाव आयोग की फटकार के बाद कांग्रेस संगठन में
चुनावी प्रक्रिया ने रफ़्तार पकड़ ली है। ऐसे में प्रश्न यह है कि क्या
उन्हें देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस की कमान  दी जा सकती है?
क्या वे इसके काबिल हैं? क्या राहुल गांधी राजनीति को पूरी तरह समझने
लगे है?

नोटबंदी और जीएसटी के सताए हुए करोड़ों लोगों के मन में उठ रहे इस
सवाल के जवाब को तलाशने का प्रयास करते हैं। शुरुआत साेशल मीडिया से
करते हैं जिसकी इनदिनों किसी को भी हीरो और जीरो बनाने में अहम्
भूमिका है। सोशल मीडिया पर कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी की लोकप्रियता
बढ़ती नजर आ रही है। पिछले दो महीनों में उनके ट्विटर फॉलोवर्स की संख्या
करीब 10 लाख बढ़ कर 34 लाख हो गई है। लेकिन आज भी राहुल मोदी के
मुकाबले पीछे हैं। वे विश्वसनीय चेहरा न बन सके हैं। आप उनेस मिलें जो
नरेंद्र मोदी से खुश नहीं है, विकल्प की सोच रहे हैं। बदलाव चाहते हैं।
लेकिन वे सवाल करते हैं कि फिर दूसरा कौन है? राहुल गांधी और कौन? नाम
सुनते ही ऐसे लोगों का पहला रिएक्शन हाेता है राहुल गांधी उन्हें
उत्सा‍हित तो करते हैं लेकिन देश का चेहरा बनने योग्य नहीं दिखते।
दूसरे शब्दों में कहें तो छवि आड़े आ रही है। इसके लिए कौन जिम्मेदार
है। कांग्रेस के बड़े नेता, राहुल स्वंय या फिर मीडिया। राहुल गांधी ने
कई मौकों पर कुछ ऐसा बोल दिया और जब-तब कुछ ऐसा किया कि उनकी छवि
पप्पू वाली बन गई। रही सही कसर भाजपा नेताओं ने पूरी कर दी। कैसे? आइए
समझते हैं।

जब अन्ना हजारे के नेतृत्व में भ्रष्टाचार विराेधी आंदोलन अपने उफान पर
था, तब राहुल गांधी खामोश थे। जब पूरा देश उनकी ओर अपेक्षा भरी निगाहों
से देख रहा था, वे एक शब्द नहीं बोले। लोगों को लगा कि देश और
व्यवस्था को लेकर राहुल गांधी गंभीर नहीं हैं। साल 2014 के चुनाव में
हार के बाद वे तकरीबन 50 दिनों के लिए छुट्टी पर चले गए थे।  उनकी वह
छुट्टी आज भी रहस्य बनी हुई है। राष्ट्रपति चुनाव अंतिम स्तर पर था और
राहुल गांधी देश से गायब थे । किसानों का आंदोलन उग्र था। इस दौरान गत 9
जून को राहुल गांधी मंदसौर पहुंचे। बढ़ते कृषि संकट पर उन्होंने
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर आरोप लगाया और एक नाटकीय घटनाक्रम के बाद
अंत में हिरासत में लिए गए। उनके साथी इस मुद्दे पर आंदोलन करते रहे और
सरकार को घेरते रहे। तीन दिन बाद 13 जून  को राहुल ने ट्वीट किया, कुछ
दिनों के लिए नानी के घर जा रहा हूं।  परिवार के साथ कुछ दिन बिताने को
लेकर उत्सुक हूं।  इसके बाद ट्वीटर पर वह ट्रोल किए जाने लगे। विपक्षी दल
उनका मजाक उड़ाने लगे। मंदसौर में उनके कदम की प्रशंसा करने वाले उनके
साथी हताश हो गए। एक कांग्रेस नेता ने कहा, ऐसा पहली बार नहीं हुआ है।
हर समय हम सोचते हैं कि मुद्दों पर हमारी पकड़ बन गई है। कार्यकर्ता
उत्साहित हो जाते है। लेकिन ऐन मौक पर राहुल  चले जाते हैं। ऐसे में
कैसे रिएक्ट करें कि देश में जब गंभीर मुद्दे हैं तो उनका नेता छुट्टी पर
चला गया है, वह भी उस समय जब देश में एक मजबूत विपक्ष नहीं है।
इन सब कारणों से राहुल पर की गई टिप्पणियों ने उनकी छवि को गंभीर
नहीं बनने दिया। मसलन, एक बार शीला दीक्षित ने कहा था कि कांग्रेस
उपाध्यक्ष राहुल गांधी अभी मेच्योर नहीं हुए हैं। उन्हें अभी और वक्त
दिया जाना चाहिए। हंगामा मचने पर वे अपने बयान से मुकर गई थीं। हरियाणा
में विधानभा चुनाव प्रचार के दौरान भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह
ने तंज कसते हुए कहा था कि महात्मा गांधी चाहते थे कि कांग्रेस खत्म हो
जाए। गांधीजी का सपना राहुल पूरा कर रहे हैं। राहुल गांधी के हालिया यूएस
दौरे पर टिप्पणी करते हुए केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी ने कहा था कि
राहुल की देश में कोई सुनता नहीं, इसलिए बोलने के लिए उन्हें विदेश जाना
पड़ता है। इन टिप्पणियों का कोई दमदार जवाब न राहुल ने दिया और न ही
कांग्रेस ने।

अपनी बात मज़बूत और तर्कसंगत ढंग से न कह पाना राहुल की सबसे बड़ी असफलता
है। नोटबंदी जैसी पॉलिसी जिसका हर भारतीय पर नकारात्मक असर पड़ा, उसे भी
मोदी काले धन और आतंकवाद के खिलाफ वरदान के रूप में प्रचारित करने में
सफल रहे। राहुल इसे भी नहीं भुना पाए। राहुल की राजनीति में उत्साहहीनता
और जनता के बीच भाषण देते समय सुस्ती साफ झलकती है। यह उनका दूसरा ड्रॉ
बैक है। राहुल की तीसरी बड़ी समस्या है युवा नेताओं पर अत्यधिक निर्भरता
और ज़मीनी कार्यकर्ता पर पकड़ नहीं होना। 2009 में यूपीए की सरकार आई
थी और राहुल गांधी को बढ़ाना शुरु किया गया। राहुल ने अपनी एक टीम बनाई
जो लैपटॉप, आईपैड से लैस थी। पूरी हाईटेक थी। फिर उन्होंने फैसले लेने
शुरू किए। पार्टी के फैसले को दरकिनार करते हुए राहुल ने चुनाव में एकला
चलो की नीति पर अमल करने का मन बनाया। राज्यां के चुनाव अकेले लड़े
और 2010 में बिहार और 2012 में यूपी बुरी तरह हारे। युवाओं को
नेतृत्व में आगे लाने के चक्कर में पुराने कई वरिष्ठ नेता दरकिनार कर दिए गए
और कई खुद पार्टी छोड़ कर चले गए। तब से लेकर आज तक कांग्रेस का हर
चुनाव में प्रदर्शन खराब होता चला गया है। इसके बाद वे 2017 में सपा के
साथ हाथ मिला यूपी विधानसभा का चुनाव लड़े। सपा से गठबंधन के बाद भी
रायबरेली और अमेठी के कांग्रेस के गढ़ को बचाने में पूरी तरह नाकामयाब
रहे। यहां पहली बार भाजपा ने कुल 10 में से 6 सीटों पर कब्जा कर लिया।
राहुल की अन्य कमजोरियां हैं कि वे लच्छेदार भाषण नहीं दे पाते। अपने
बयानों में कई बार गलतियां कर जाते हैं। कभी-कभार अपनी भाषा में अटक जाते
हैं। शायद अंग्रेजी में वो ज्यादा कंफर्टेबल महसूस करते हों, इसलिए
विदेशों में उनकी भाषणों की इतनी तारीफ भी हो रही है।
कांग्रेस पार्टी में  राहुल‘भक्त कई नेता ऐसे भी हैं जिन्हें राहुल के
नेतृत्व में कोई कमी नज़र नहीं आती। उनका मानना है कि राहुल गांधी को
कांग्रेस का अध्यक्ष बना देना चाहिए। पंजाब के मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह
ख़ुद राहुल की ताजपोशी की वकालत कर चुके हैं। वैसे कैप्टन इज़ कांग्रेस,
कांग्रेस इज़ कैप्टन.., पंजाब चुनाव का यह नारा बताता है कि जीत वहां
किसकी हुई है। सबसे बड़ी पार्टी बनने के बावजूद गोवा में कांग्रेस की
सरकार बना पाने में नाकाम दिग्विजय सिंह भी राहुल गांधी को पार्टी की
कमान सौंपने के पक्ष में हैं। आलोचक यह सवाल उठाते है कि आखिर पार्टी की
कमान संभालने से राहुल को कौन रोक सकता है। अध्यक्ष न होते हुए भी राहुल
गांधी पार्टी तो चला ही रहे हैं। कांग्रेस कार्यकर्ताओं को उम्मीद है कि
राहुल के अध्यक्ष बन जाने के बाद संगठन में निर्णय तेज़ी से होंगे और नए
जोश के साथ कार्यकर्ता चुनावी तैयारी में लग जायेंगे। राहुल के सामने न
सिर्फ पार्टी के पुराने नेताओं से सामंजस्य बैठाने की बल्कि खुद को नेता
साबित करने की भी चुनौती है।

संदीप ठाकुर
वरिष्ठ पत्रकार
sandyy.thakur32@gmail.com

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दिल्ली में मैकडॉनल्ड्स के 43 रेस्तरां बंद

सड़क पर खड़े हाेकर पाव-भाजी खाने वाले युवाआें काे खींच कर रेस्तरां के अंदर बर्गर खाने पर मजबूर करने वाले अमेरिकन फास्ट फूड कंपनी के दिल्ली में चल रहे 55 में से 43 मैकडॉनल्ड्स रेस्तरां आज से अनिश्चित काल के लिए बंद कर दिए गए। इसके लिए चलते उसके 1700 कर्मचारी बेरोजगार हो जाएंगे। यह नाैबत मैकडॉनल्ड्स और उसके 50:50 प्रतिशत हिस्सेदारी वाले जॉइंट वेंचर कनॉट प्लाजा रेस्ट्रान्ट्स प्राइवेट लिमिटेड (CPRL) के बीच चल रहे अंतरकलह का परिणाम है। देश में कुल 168 रेस्ट्रॉन्ट्स ऑपरेट करने वाली सीपीआरएल के फॉर्मर एमडी विक्रम बख्शी ने इसे दुर्भाग्यपूर्ण बताय़ा है।

दिल्ली के आउटलेट्स बंद करने का एलान बुधवार की सुबह स्काइप के जरिए हुई बोर्ड मीटिंग के दौरान लिया गया। रेस्तरां को अस्थायी तौर पर बंद किए जाने की वजह के बारे में दोनों पार्टनर्स ने कुछ भी कहने से मना कर दिया है, लेकिन सूत्रों के मुताबिक, बख्शी और मैकडॉनल्ड्स के बीच चल रही लड़ाई के बीच CPRL मैंडेटरी हेल्थ लाइसेंस रिन्यू कराने में फेल हो गई है।

सूत्राें ने कहानी बताते हुए कहा कि अगस्त 2013 में बख्शी को नाटकीय तरीके से CPRL के मैनेजिंग डायरेक्टर पोस्ट से हटा दिया गया था। इसके बाद बख्शी और मैकडॉनल्ड्स के बीच लंबी कानूनी लड़ाई शुरू हो गई, जिसमें उन्होंने दुनिया की सबसे बड़ी फास्ट फूड चेन को कंपनी लॉ बोर्ड में घसीट लिया। इस मामले में बोर्ड का फैसला अभी नहीं आया है। मैकडॉनल्ड्स लंदन कोर्ट ऑफ इंटरनैशनल आर्बिट्रेशन में बख्शी के खिलाफ मुकदमा लड़ रही है आैर यह ब्रैंड के लिए बड़ा झटका है।

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चैनल मालिक के खिलाफ जांच की कार्रवाई को मीडिया पर हमले का रंग देने का प्रयास क्यों?

प्रेस क्लब आफ इंडिया में बीते दिनों वरिष्ठ, कनिष्ठ, नामचीन, गुमनाम, बूढ़े, जवान
पत्रकारों का जमावड़ा लगा था। अवसर था एनडीटीवी के मालिक प्रणव राय के
यहां मारे गए सीबीआई छापे के विरोध का। मंच पर विराजमान थे एक से बढ़ कर
एक पत्रकारिता के अपने जमाने के दिग्गज अरुण शौरी, एच.के.दुआ, फली एस
नॉरीमन, कुलदीप नैय्यर, राज चेनप्पा, शेखर गुप्ता, ओम थानवी और प्रणव राय।
इन सभी ने एक स्वर में एक बैंक घोटाले की जांच के सिलसिले में एनडीटीवी
के मालिक प्रणव के यहां मारे गए छापे को प्रेस की आजादी पर हमला करार दे
दिया। इन्होंने साफ साफ कहा कि मोदी राज ने एक बार फिर आपातकाल की याद
दिला दी है और अब वक्त आ गया है कि मीडिया को एकजुट होकर विरोध करना
चाहिए सरकार की मीडिया विरोधी नीति का।

वक्ताओं की काबिलियत पर कोई सवाल नहीं, सभी अपने जमाने के घुरंघर
पत्रकार। लेकिन सभी रिटायर। एक सवाल तो पूछा जा सकता है कि सीबीआई का यह
छापा प्रणव राय की करतूतों के खिलाफ था या मीडिया के खिलाफ। इतने वरिष्ठ
लोग क्यों बातों को तोड़ मरोड़ कर पेश कर रहे हैं। चैनल मालिक के
खिलाफ जांच की कार्रवाई को प्रेस पर हमले का रंग देने का प्रयास क्यों
किया जा रहा है? कुछ वक्ताओं ने उपदेश दिया कि एक पत्रकार को कैसे काम
करना चाहिए, सरकार के खिलाफ। इन सबसे एक सवाल मैं पूछता हूं कि किसी भी
चैनल या अखबार में पॉलिसी कौन लागू करता है….संपादक। संपादक जो
चाहेगा वही छपेगा और टीवी पर दिखेगा। आज कौन संपादक है जो नरेंद्र
मोदी के खिलाफ खबरें छापने का दम रखता हो। मोदी और योगी के साथ
संपादक मंडली कई बार टी पार्टी कर चुकी है।

आज जब अधिकांश संपादक खुद दलाल की भूमिका में हैं तो वे खबरों की कद्र
क्या और कैसे करेंगे। आज अधिकांश संपादक खुद ही मंत्रियों के साथ चाय
पीने और सेल्फी खिंचाने के लिए ललायित रहते हैं। आज संपादक सीधे
मंत्रियों से बात करते हैं। उनके साथ पांच सितारा होटलों में दावत
उड़ाते और जाम से जाम टकराते हैं। ऐसे में कौन सी पत्रकारिता और काहे
की पत्रकारिता। प्रेस क्लब में जितने पत्रकारों ने भाषण झाड़ा वे सभी
अपनी पारी खेल चुके हैं। आज उन सबके पास लंबी लंबी कारें हैं, शानदार घर
है और लैविस लाइफ स्टाइल है। उन्हें न तो नौकरी करनी है और न चाहिए।
ऐसे में भाषण देना आसान है। इनमें से किसी को आज संपादक बना दिया जाए
तब पता चले कि इनमें कितना दमखम है मोदी विरोध करने का।

मामला एनडीटीवी का था तो ढेर सारे नामचीन पत्रकार जुट गए। लेकिन जिस
पत्रकारिता की दुहाई देकर ये अपनी दुकानदारी चला रहे हैं इस पेशे से जब
पत्रकार निकाले जाते हैं तब यह मंडली कहां होती है। मोदी एंड कंपनी आज
यदि मीडिया पर हावी है तो उसका जिम्मेदार कौन है..संपादकों की फौज।
आज संपादकों की सैलरी लाखों में और इन्हें रिपोर्टर चाहिए 5 से 10
हजार रुपए प्रतिमाह में। अंग्रेजी अखबारों की हालत थोड़ी बहुत ठीक हो
सकती है लेकिन हिंदी व रीजनल भाषा के अखबारों व चैनलों की तो पूछिए
मत। एक तो सैलरी नहीं, और मिलती भी है तो दो चार महीने लेट। तब
संपादकों की फौज आवाज क्यों नहीं उठाती। आज पत्रकारिता जिस फटे हाल
में सरकार की गुलाम होकर काम कर रही है उसके लिए जिम्मेदार सिर्फ संपादक
हैं। संपादकों का एक बड़ा वर्ग मालिकान के तलवे चाटने लगा और मालिकान
सरकार के सामने अपने उल्टे सीघे स्वार्थ साधने के लिए पूंछ हिलाने लगे।

आज किस बड़े अखबार में संपादक हैं। अधिकांश में नहीं। मालिक ही संपादक है।
जब मालिक ही संपादक है तो निष्पक्ष पत्रकारिता कैसे होगी? सरकार इसका
फायदा उठाएगी और वही हो रहा है। साथ ही फायदा उठा रहे हैं मालिकान
पत्रकारों का। उल्टे सीधे काम करें मालिक और जब कोई सरकारी कार्रवाई
हो तो उसे पत्रकारिता पर हमला बता सरकार पर प्रेशर बनाना शुरू। इस काम
में उन्हें पत्रकारों की याद आ जाती है। बेचारे पत्रकार लोग भी करें तो क्या
करें, नौकरीपेशा हैं, मालिक जो कहेगा करना ही पड़ेगा। वही हो रहा है।
लेकिन यहां पत्रकारों को सोचने की जरुरत है कि उन्हें इस्तेमाल होना
चाहिए या नहीं।

लेखक संदीप ठाकुर दिल्ली के वरिष्ठ पत्रकार हैं और कई अखबारों-चैनलों में वरिष्ठ पद पर काम कर चुके हैं.

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अमित शाह की प्रेस कांफ्रेस में जूट बैग पाने के लिए भूखे नंगों की तरह टूट पड़े पत्रकार

Sandip Thakur : इन दिनों मोदी सरकार के तीन साल पूरे हाने के उपलक्ष्य पर जश्न का दौर चल रहा है। पीएमओ के निर्देश पर तमाम प्रमुख मंत्रालय के मंत्री और नेता अपन-अपने कामों के 3 साल का ब्यौरा देने के लिए संवाददाता सम्मेलन कर रहे हैं। आज यानी 26 मई को भाजपा मुख्यालय में पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह की प्रेस कांफ्रेंस थी। वहां मोदी सरकार की उपलब्धियों के बखान वाले उपहार को लेने की पत्रकारों में मची मारामारी के दृश्य पत्रकारिता की गिरती साख के प्रत्यक्ष गवाह थे। जूट के एक बैग जिसमें सरकारी घोषणाओं से भरे कुछ कागज और एलईडी बल्ब थे को हासिल करने के लिए पत्रकारों का हुजूम जिस तरह से एक दूसरे को धकिया मुकिया रहे थे उसे देख कर ऐसा लगा कि मानों भूखे-नंगों को खाने का पैकेट बांटने के लिए कोई गाड़ी आई हो।

इन दिनों संवाददाता सम्मेलनों की बाढ़ आई हुई है। रोज कहीं न कहीं प्रेस कांफ्रेंस, लंच और फिर कोई न कोई गिफ्ट। खिलाने व बांटने वाले हैं मोदी सरकार के मंत्री व पार्टी के नेता, जो तीन साल का बखान करने में लगे हुए हैं। अधिकांश संवाददाता सम्मेलन या तो नेशनल मीडिया सेंटर या फिर शास्त्री भवन के पीआईबी कांफ्रेंस हॉल में होता है। नियमतः ऐसे संवाददाता सम्मेलन में सिर्फ वही पत्रकार आ सकते हैं जिनके पास पीआईबी कार्ड है। इस शर्त का उल्लेख बाकायदा प्रेस निमंत्रण पत्र पर भी होता है। लेकिन सम्मेलन में अवांछित कथित पत्रकारों की भीड़ उमड़ती है। भीड़ का मतलब भीड़।

कोई भी संवाददाता सम्मेलन चार अभियानों में संपन्न होता है। पहला, बैग लूटो अभियान। दूसरा, खाओ-पिओ अभियान। तीसरा, मंत्री के साथ सेल्फी खिंचाओ अभियान और चौथा, सोशल मीडिया पर अपलोड करो अभियान। वैसे अति सुरक्षित नेशनल मीडिया सेंटर में भीड़ अंदर अंदर कैसे आती है, यह अपने आप में जांच का विषय है। क्याोंकि मीडिया सेंटर में सिर्फ उन्हीं पत्रकारों को अंदर आने की इजाजत है जिनके पास पीआईबी का कार्ड है। कार्ड चेक करना मुख्य गेट पर तैनात सीआईएसएफ कर्मियों का काम है। लेकिन ऐसा लगता है कि इनदिनों सीआईएसएफ वाले अपनी ड्यूटी ठीक से नहीं कर रहे हैं। ऐसे में किसी दिन मीडिया सेंटर में किसी अनहोनी की आशंका से पूरी तरह इंकार नहीं किया जा सकता है। जिनके पास पीआईबी कार्ड नहीं है वे अंदर घुसने के बाद क्या करते हैं, जरा उसकी एक बानगी देखिए। कांफ्रेस हॉल के बाहर जहां मंत्रालय वाले प्रेस रीलीज बांटते हैं, जा धमकते हैं। यदि बैग बंट रहा हो तो फिर नजारा देखने लायक होता है। ऐसी मारा मारी मचती है कि पूछिए मत। ऐसे में जो बड़े अखबारों के पीआईबी मान्यता प्राप्त पत्रकार प्रेस रिलीज व चैनलों के संवाददाता होते हैं वे बैग व प्रेस रीलीज दोनों से वंचित रह जाते हैं। क्योंकि वे मारा मारी में पड़ना नहीं चाहते। इंतजार करते हैं लेकिन लूट के बाद कुछ बच नहीं पाता है। खैर बैग लूटने के बाद ऐसे लोग हॉल में जा कर सीटों पर जम जाते हैं।

प्रेस कांफ्रेंस खत्म हुई नहीं कि लिफ्ट व सीढ़ियों से भाग कर खाने के लिए कतार में लग जाते हैं। देखते ही देखते खाने वाले हॉल में ऐसी भीड़ हो जाती है कि पूछिए मत। इतना हीं नहीं मंत्री के साथ फोटो खिंचा उसे सोशल मीडिया पर अपलोड करने के लिए भी अफरा तफरी मच जाती है। पिछले दिनों शिक्षा मंत्री प्रकाश जावेडकर की प्रेस कांफ्रेंस थी। जावेडकर के डायनिंग हॉल में पहुंचने से पहले ही उनके टेबल पर भाई लोग जम गए। किसी ने खाना खाते तो किसी ने बात करते हुए मंत्री के साथ अपनी सेल्फी ली और फटाक से फेसबुक पर अपलोड कर दिया। टेबल पर जमे एक भाई ने मंत्री से कहा, सर, आपका इंटरव्यू नहीं मिलता है। इस पर टिप्पणी करते हुए मंत्री के एक स्टाफ ने कहा कि जितने मंत्री के इर्द गिर्द बैठे हैं वे किसी समाचारपत्र या पत्रिका में हैं ही नहीं तो फिर इंटरव्यू छापेंगे कहां। बात खाने पीने पर ही खत्म नहीं होती है। खाने के बाद भाई लोग ग्रांउड फ्लोर पर बने मीडिया कक्ष में आते हैं और फिर सोफा, कुर्सिंयों पर सो जाते हैं।

एक नींद सोने के बाद ठंडा पानी पिया और मीडिया कक्ष में रखे पत्र पत्रिकाओं को अलटते पलटते दो चार बैग में रख लिया। गत 19 मई को लंबे बाल वाले एक ऐसे ही सज्जन मीडिया रुम में घुस आए। दो चार अखबार समेटे और लेकर जाने लगे। पीआईबी कार्ड होल्डर एक मीडियाकर्मी ने उसे टोका तो बहसबाजी शुरू हो गई और नौबत हाथापाई तक आ गई। फिर अन्य पत्रकारों ने हस्तक्षेप कर मामला शांत कराया। जो सज्जन अकड़ रहे थे वे न तो पत्रकार हैं और न ही उनके पास पीआईबी का कार्ड है। फिर वे नेशनल मीडिया सेंटर के अंदर रिपोर्टस रुम तक कैसे पहुंचे, यह अपने आप में बड़ा सवाल है। वैसे सवाल कई हैं। यदि केंद्रीय मंत्रालय के संवाददाता सम्मेलन में कोई भी आ सकता है तो फिर पीआईबी कार्ड का क्या मतलब है। अवांछित लोगों (जिनके पास पीआईबी कार्ड नहीं है) के प्रवेश से सही पत्रकारों को जो परेशानी होती है उसके लिए कौन जिम्मेदार है। खाने के लिए मारा मारी, बैग लेने के लिए मारा मारी…। कोई भी वरिष्ठ मान्यता प्राप्त पत्रकार ऐसे माहौल से बचना चाहता है। लेकिन उन भाई लाोगों का क्या करें जो ऐसे माहौल के लिए जिम्मेदार हैं।

वरिष्ठ पत्रकार संदीप ठाकुर की एफबी वॉल से साभार. उपरोक्त स्टेटस पर आए ढेर सारे कमेंट्स में से कुछ प्रमुख यूं हैं :

Sn Verma 100% true. About security i talked to concerned staff and complained last year. He told that pib staffs forced us on telefone to allow such persons to enter media centre. Kahi na kahi saanth gaanth hain bhai.

Sandip Thakur thats true…i think minister needs crowd,so may be indirectly there is instruction to security staff that let come each and every journalist inside the conference hall.

Govind Mishra V true, bhai, thatswhy I avoid mostly press confrences

Dhanan Jay पीआईबी कार्ड होल्डर क्या सब genuine पत्रकार हैं। मुझे शक है।

Shashidhar Pathak बड़े चिरकुट नंदन घुस आए हैं। फूहड़, म्लेच्छ, राक्षस इंसान के करम होते हैं। ऐसे तमाम निर्लज्ज दुष्ट लोग मीडिया का चीरहरण कर रहे हैँ। एक उत्तराखंड का भी कुख्यात ब्लैक मेलर है। दरअसल, मीडिया उभार के बाद अवसर आए। मीडिया के कई दुर्भिक्षु दुम हिलाकर करोड़पति हो गए। संत संतई में रह गए। यह उसी का नतीजा है।

Dhanan Jay जो पत्रकार गण संदीप की भीड़ में नहीं हैं वे कौन दूध के धुले हैं। वे सफेदपोश कंबल ओढ़ कर घी पी रहे । इतना ही फर्क है।.तो संदीप बाबू इन अकिंचनों की ही लानतमलानत क्यों।

Sandip Thakur हम आप एक नोबल प्राोफेशन में हैं। उसकी एक गरिमा है। उसे मेनटेन करना चाहिए। आप मंत्री से कोई बड़ा काम करवा लीजिए..नो प्राेब्लम। लेकिन आप किसी संवाददाता सम्मेलन में बैग में पानी की बोतल भर लें, पेन फोल्डर के लिए दो बार लाईन में लग जाएं, खाने के डिब्बे पर डिब्बे लेते जाएं..इस चिरकुटआई पर मेरी आपत्ति है। शायद यही वजह है कि आज नेता से लेकर अधिकारी तक पत्रकारों पर हावी हो गए हैं…सिर्फ चिरकुट पत्रकारों के कारण।

Dhanan Jay अगर कोई गिरा है और दिखता भी है तो मुझे कोई प्राबलम नहीं। मुझे दिक्कत उससे है जो इलीट रंग रोगन के अंदर गिरी हुई हरकत करता। मेरा मानना है कि पाखंड किसी भी पाप से ज्यादा घृणित है। और मेरे भाई कौन ऐसा प्रोफेशन है जिसे नोबल नहीं होना चाहिए। जो कुछ आपने हुआ देखा, अच्छा है पत्रकारों की जात तो पहचानी गई। आई एम लविंग इट। सही बात यह है मेरे दोस्त मुझे मुझे बड़ी बड़ी बातें चुभती हैं।

Joginder Solanki संदीप भाई फ्री मे जहर भी मिलेगा तो मार-काट मच जाएगी।

Kewal Tiwari कोई नयी बात नहीं। सत्ता से क्या क्या फायदे नहीं लेते लोग।

Sandip Thakur सत्ता से फायदे उठाना और चिरकुटआई करना, दोनों में फर्क है। मेरी आपत्ति चिरकुटाई पर है। मतलब, पेन फोल्डर के लिए मारामारी करना, बीट नहीं होने पर भी संवाददाता सम्मेलन में जा धमकना, खाने का एक डब्बा बैग में ठूस लेना और दुसरा हाथ में पकड़े रखना, एक की जगह पानी की चार पांच बोतलें बैग में भर लेना…आदि।

Subhash Chandra Sir.. Ek baar PIB card ka verfication ho jaye to behtar. … Kya marketing manager v PIB card le sakta hai aur lisoner v.

Ashok Shukla PIB card? No criteria even a street newspaper carrying the card.

Vishwat Sen सर, मुद्दा तो आपने अच्छा उठाया, मगर पीआईबी कार्ड पर फोकस करके मामले को भटका दिया। गुस्ताखी माफी के साथ एक सवाल करूँगा। वह यह कि क्या जिसके पास पीआईबी कार्ड नहीं है, तो वह पत्रकार नहीं है? माना आपके पास यह कार्ड है और मेरे पास नहीं है। मेरे संस्थान ने मंत्रालय की जिम्मेदारी तय कर दी, तो क्या मैं मंत्रालयों में जाने का हक नहीं रखता? इस देश में कितने ऐसे पत्रकार हैं, जिनके पास पीआईबी या राज्य सरकार का कार्ड है? क्या जो सही मायने में पत्रकार है, उसके पास कार्ड है? आज एक दशक से ऊपर हो गया पीआईबी और दिल्ली सरकार में आवेदन दिए हुए, मगर आज तक कार्ड जारी नहीं हुआ। तो क्या मैं पत्रकार नहीं हूं? क्या मान्यता प्राप्त कार्ड ही पत्रकारिता का मानदंड और पैमाना है? किसी के द्वारा चिरकुटई करना और किसी की पत्रकारिता पर सवाल खड़ा करना, दोनों में फर्क है। आज जो चिरकुट संस्थान में है, वह जुगाड़ से कार्ड बनवा लेता है, मगर पत्रकारिता की मुख्यधारा में काम करनेवाला ठिठकाते रह जाता है। कभी इस पर भी गौर किया है?

Sandip Thakur सवाल पीआईबी या राज्य सरकार के कार्ड का नहीं है। सवाल है पत्रकारिता के क्षेत्र में व्याप्त लचीलेपन का नाजायज फायदा उठा सुख सुविधा बटोरने और ऐसे कथित पत्रकारों के कारण सही पत्रकारों को होने वाली असुविधाओं का। आज तक यदि आप जैसे सैकड़ों सही व जुझारु पत्रकारों का कार्ड नहीं बन पाया है तो उसके लिए जिम्मेदार ऐसे ही झोला छाप पत्रकार हैं जिनका जिक्र मैंने आपनी रपट में किया है। अमित शाह के जिस संवाददाता सम्मेलन का जिक्र मैंने किया है उसमें या किसी और संवाददाता सम्मेलन में पेन, फोल्डर, नोटबुक और गिफ्ट लूटने वाले मान्यता प्राप्त पत्रकार कम नहीं है। जो कहीं पत्रकार नहीं हैं उनकी संख्या टिड्डियों की तरह है। आपके पास कार्ड हो भी न तो आप बैग-फोल्डर काउंटर तक बगैर धक्का मुक्की के पहुंच ही नहीं सकते। पत्रकारिता के नाम पर ऐसे लोगों की बढ़ती संख्या पूरे पेशे के लिए खतरनाक संकेत है।

Sanjay Vohra अब तो संवादाता सम्मेलन में तालियां भी बजती सुनायी देती हैं …पत्रकारों को जुट बेग और मीडिया हाउस मालिकों को विग्यापन …यही होगा

Sn Verma भाई pib hall main bhi aaj six aise log baithe mil gaye. Security person bata raha ki usse adesh mila hai jiske paas bhi press identity card hai, allow hain.

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प्रचार के रथ पर सवार मोदी सरकार…. अच्छे दिन आ गए… किसके…किसी को नहीं पता

मोदी सरकार ने दो साल पूरे कर लिए हैं। इसे लेकर सरकारी स्तर पर जिस
कदर हंगामा और हवाबाजी की जा रही है उसे देख तो ऐसा लगता है कि पता
नहीं क्या हो गया? प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया में विज्ञापनों की
बाढ़ आ गई है। चैनलों पर मोदी सरकार पर हो रही बहस में अधिकांश वक्ता
यह साबित करने में जुटे हैं कि देश में ऐसी सरकार आज तक आई ही नहीं..।
चारों ओर जयजयकार हो रही है..मोदी की। इसे कहते हैं किस्मत। यदि किसी
की किस्मत में यश लिखा हाो ताो कोई क्या कर सकता है। मोदी जी की किस्मत
में यश है…वे कुछ करें न करें लेकिन जयजयकार होती रहेगी..और वही हो
रहा है। दो साल में आखिर क्या हुआ…मीडिया को बताना चाहिए। लेकिन
मीडिया ऐसा कर नहीं रहा। क्यों? इस पचड़े में पड़ने से बचते हुए आगे
बढ़ते हैं और जमीनी हकीकत पर एक नजर डालते हैं। मोदी ने पांच वादे किए
थे…महंगाई कम करुंगा, रोजगार के अवसर बढेंगे, कालाधन वापस आएगा, डालर के
मुकाबले रुपया मजबूत होगा और विकास को रफ्तार मिलेगी।

हुआ क्या? महंगाई..। मई 2014 में चना, अरहर, मूंग और मसूर की दाल क्रमश:
47 रुपए, 72 रुपए, 71 रुपए व 68 रुपए थी। मई 2016 में इनकी कीमत क्रमश: 83
रुपए,170 रुपए,160 रुपए और 100 रुपए किलो है। चीनी 28 रुपए थी जो आज
38 रुपए है। मई 2014 में डॉलर के मुकाबले रुपए की कीमत 59.26 थी जो आज
11 प्रतिशत गिर कर 66.44 हो गई है। देश का निर्यात 18 प्रतिशत नीचे गया
है। रुपया, सेंसेक्स और रोजगार की गिरावट को रोकने में सरकार बुरी तरह
विफल रही है। नौकरी का हाल क्या है..जरा यह भी समझ लीजिए। देश के प्रमुख
आठ कोर सेक्टरों में बीते बरस सबसे कम रोजगार पैदा हुआ । 2015 में सिर्फ
1.35 लाख युवाओं को रोजगार मिला। जबकि 2011 में 9 लाख और 2013 में 4.19
लाख युवाओ को नौकरी मिली थी।

देश भर में रजिस्टर्ड बेरोजगारों की संख्या 2 करोड 71 लाख 90 हजार है।
तो वैसे बेरोजगार जो रोजगार दफ्तर तक कभी पहुंच ही नहीं पाये उनकी
संख्या 5 करोड 40 लाख है। देश भर में सरकारी नौकरी करने वाले महज 1
करोड 70 लाख है । हर महीने दस लाख नौजवान नौकरी के बाजार में कूद रहा
है, लेकिन उसके लिए नौकरी है नहीं, क्योंकि एक तरफ सरकारी नौकरियां कम तो
दूसरी तरफ निजी क्षेत्र में नौकरियों में सौ फीसदी तक की कमी आ चुकी है।
1996 -97 में सरकारी नौकरी 1 करोड़ 95 लाख लोगों को सरकारी नौकरियां
मिली थीं जो अब घट कर 1 करोड़ 70 लाख रह गई हैं। मोदी सरकार के पहले
साल 2014-15 में 1072 कंपनियों ने सिर्फ 12,760 नौकिरयां दीं जबकि
2013-14 में 188,371 नौकरियां निकली थीं। डिजीटल इंडिया, मेक इन इंडिया,
स्टार्टअप इंडिया…. ये सब एक आकर्षक नारा मात्र बन कर रह गए हैं।

किसानों की बात करें। सरकार का वादा था कि वह किसानों को उनकी लागत का
50 फीसदी मुनाफा दिलाएगी लेकिन अब सरकार पलटी लेते हुए कह रही है कि यह
संभव नहीं है। मोदी सरकार द्वारा पेश बजटों में खेती पर खर्च कम हुआ
है। यूपीए 2 में हुए घोटालों में लिप्त एक भी नेता के खिलाफ कार्रवाई
नहीं हुई है। शिक्षा और रक्षा बजट में कटौती हुई है। एफडीआई नहीं के
बराबर आई है। कुल मिला कर काम कम और प्रचार ज्यादा। मेरी नजर में तो ये
अच्छे दिन नहीं हैं लेकिन अच्छे दिन की उम्मीद बरकरार है।

संदीप ठाकुर
Sandeep Thakur
sandyy.thakur32@gmail.com

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हमारे चारों ओर उंची जाति के लोग रहते हैं, वे नहीं चाहते थे कि हम उनके बीच रहें

केरल में निर्भया जैसी दरिंदगी से उबाल, घटनास्थल से लौटी महिलाओं की टीम ने किया की खुलासा

-संदीप ठाकुर-

नई दिल्ली। दुराचार और जघन्य हत्या की रोंगटे खड़े कर देने वाली यह
वारदात दिल्ली के निर्भया कांड से भी कहीं ज्यादा वीभत्स और दिल दहला
देने वाली है। यह केवल एक गरीब मेहनती और महत्वाकांक्षी दलित लड़की की
कहानी नहीं है बल्कि समाज के दबे कुचले उन हजारों-लाखों लड़कियों के
अरमानों की भी दास्तान है जो तमाम मुश्किलों के बावजूद न सिर्फ कुछ कर
गुजरने की चाह रखतीं हैं, परंतु चाहतों के असली जामा पहनाने का हौसला
लेकर दिन रात मेहनत करतीं हैं। लेकिन समाज के दबंगों को उनकी यह तरक्की
हजम नहीं होती।

तारीख 28 अप्रैल, 2016
समय: दोपहर 1.30 से 5 बजे के बीच
जगह: केरल के एर्नाकुलम जिले के पेरुमबावूर तालुक्का का गांव रायमंगलम्

सरकारी लॉ कॉलेज की छात्रा माशा (परिवर्तित नाम) अपने एक कमरे के घर में
अकेली थी। अचानक हथियारों से लैस कुछ अज्ञात लोग घर में घुस आए और
दलित वर्ग से संबंध रखने वाली 30 साल की माशा को दबोच लिया। उसके साथ
बलात्कार किया। दुराचारियों ने उसके जननांग में धारदार हथियार डाल कर
घुमाया जिससे उसका गर्भाशय और आंतें कट गईं। उसके शरीर पर धारदार हथियार
से 30 गहरे वार किए गए। इनमें से एक वार तो 13 सेंटीमीटर गहरा था। उसके
सिर पर किसी ठोस वस्तु से प्रहार भी किया गया था। इतना ही नहीं, खून में
सनी लाश का कपड़े से गला भी घोंटा गया था। यह खुलासा युवती के
पोस्टमार्टम रिपोर्ट में हुआ है।

गरीब, दलित और वंचित परिवार की युवती से साथ हुई इस वारदात ने इलाके में
थोड़ी सी हलचल तो मचाई लेकिन पुलिस की कथित लापरवाहीपूर्ण भूमिका के
कारण मामला दब सा गया है। लेकिन इस मामले की गंभीरता के चर्चे जब दिल्ली
के राजनीतिक गलियारों तक पहुंचे तो यहां से मामले की सच्चाई जानने के
लिए नेताओं, समाजसेविका-सेविकाओं के दलों का जाना शुरू हुआ। इन्हीं में
महिलाओं का एक दल भी जांच के लिए गया था जिसका नाम है जिया (ग्रूप ऑफ
इंटेलेकचुअल एंड एकेडीमिशियन)। जीया की चेयरपर्सन मोनिका अरोड़ा, सदस्य
ललिता निझावन, सर्जना शर्मा और डॉ प्रेरणा मल्होत्रा ने घटनास्थल से
लौट कर मामले की जानकारी देते हुए इस वीभत्स हत्याकांड की जांच सीबीआई
को सौंपे जाने की मांग को लेकर गृह मंत्री राजनाथ सिंह से मिलने की
बात कही। उन्होंने बताया कि मीशा का एक कमरे का मकान नहर के किनारे है
जिसमें न तो शौचालय है और न ही बाथरुम। खाते पीते लोगों के बीच मीशा
अपनी परित्याक्ता मां राजेश्वरी के साथ रहती थी। राजेश्वरी दाई का काम
करती है। उसने मीशा को उंची शिक्षा दिलाई। मीशा ने कोट्टायम
विश्वविद्यालय से एम.ए किया था और सरकारी कॉलेज से लॉ कर रही थी। मीशा
की छोटी बहन 16 साल की उम्र में ही अपने प्रेमी से साथ भाग गई थी।

जांच दल के सदस्यों को आसपास के लोगों ने बताया कि जीवन की लड़ाई
अकेले लड़ते लड़ते राजेश्वरी कुछ तल्ख स्वभाव की हो गई थी। इसलिए उसके
जुबान की मिठास कहीं गुम हो गई थी। अक्सर वह छोटी छोटी बातों पर भी
लड़ झगड़ जाती थी। इतनी बड़ी घटना हो गई और किसी ने कुछ सुना ही नहीं?
सवाल के जवाब में स्थानीय लोगों ने बताया कि घटना वाले दिन दोपहर में
मीशा के घर से चीख चिल्लाहट की आवाजें आ तो रही थी लेकिन किसी ने उस पर
ध्यान नहीं दिया। इसका जवाब राजेश्वरी व दीपा ने दिया। उन्होंने बताया
कि हमलोग दलित हैं और हमारे चारों ओर उंची जाति के लोग रहते हैं। वे
नहीं चाहते थे कि हम उनके बीच रहें। कई बार हमें धमकी भी मिल चुकी
है, इलाके से कहीं और जा कर रहने की। दीपा ने बताया कि करीब तीन माह
पूर्व मोटर सायकिल सवारों ने मेरी मां को टक्कर मारी थी जिसमें उसे
बहुत चोट आई थी। घटना की सूचना पुलिस को भी दी थी लेकिन कोई एक्शन
नहीं हुआ था। यह घटना केरल में चुनावी मुद्दा भी बना है। जिस इलाके में
मीशा रहती है, वहां विगत 25 बरस से लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट का कब्जा है।
पंचायत स्तर से लेकर सांसद तक, सभी कम्युनिस्ट हैं। ये पार्टी अभी
विपक्ष में है। दल की सदस्या प्रेरणा के मुताबिक मृतका की छोटी बहन दीपा के
कहती है कि इस घटना में उसके पड़ोस में रहने वाला कार पेंटर व आटो चालक
शामिल हो सकते हैं। पुलिस मामले की जांच गंभीरता से करे तो अभियुक्त
पकड़े जा सकते हैं। लेकिन इनदिनों केरल में चुनावी मौसम है। पुलिस
प्रशासन उसी में व्यस्त हैं। नई सरकार बनने के बाद कुछ हो तो हो।
मोनिका अरोड़ा ने कहा कि हम इस मामले को छोड़ेंगे नहीं। यह कोई आम
आपराधिक वारदात नहीं है। यह पूरे स्त्री समाज की असिमता और सम्मान से
जीने के हक का प्रश्न है। स्थानीय पुलिस मामले की जांच कर रही है लेकिन
उससे कोई भी संतुष्ट नहीं है। इंतजार है पूरे परिदृश्य में सीबीआई के
आने का। देखना है कि जीया मामले को सीबीआई तक पहुंचाने में सरकार पर
दबाव बनाने में सफल होती है या नहीं।

पत्रकार संदीप ठाकुर की रिपोर्ट. संपर्क: sandyy.thakur32@gmail.com

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शशि शेखर ने पत्रकार राजदेव रंजन की हत्या पर एक भावुक पीस लिख मारा और हो गई इतिश्री

Sandip Thakur : हिंदी का पत्रकार तो वैसे भी रोज तिल तिल कर मरता है…. घर का किस्त भरने में, बच्चों के स्कूल की फीस भरने में, बूढ़े मां-बाप के ईलाज में खर्च होने वाली रकम जुटाने में। पढ़ा लिखा होता है इसलिए भीख भी नहीं मांग सकता। किसी हिंदी पत्रकार का घर जाकर देखिए कभी…वह भी छोटे जगहों पर काम करने वाले पत्रकार का। शशि शेखर ने सीवान के पत्रकार राजदेव रंजन की हत्या पर एक भावुक पीस लिख मारा…और हो गई इतिश्री।

मैं राजदेव रंजन को नहीं जानता था… भगवान उनकी आत्मा को शांति दे और उनके परिवारवालों को दुख सहने का साहस। परंतु, इस हालात के लिए कौन जिम्मेदार हैं… सोचा है कभी पत्रकारों ने। 28 साल से पत्रकारिता में हूं। हिंदी के तमाम बड़े अखबारों में काम कर चुका हूं… नवभारत, हिंदुस्तान, राष्ट्रीय सहारा…आदि। मेरा अनुभव बताता है कि ऐसी घटनाओं के लिए संपादक और अखबार का प्रबंधन जिम्मेदार है। खास तौर से संपादक क्योंकि संपादकीय विभाग से जुड़े लोगों को रखने हटाने का काम वही करता है। राजदेव रंजन का पद जरूर ब्यूरो चीफ का था लेकिन उनकी सैलरी कितनी थी.. क्या वे स्टाफर थे… उन पर सिर्फ खबर लिखने की जिम्मेदारी थी या फिर पैसे जुटाने की भी…?

दरअसल इनदिनों हो क्या रहा है। संपादक मैनेजमेंट से ठेका लेता है ..किस बात का। कम से कम पैसे में अखबार निकालने का। अपनी सैलरी लाखों में और संवाददाताओं की सलरी हजारों में। छोटे शहरों में काम करने वाले मैं कई पत्रकारों को जानता हूं जिन्हें हिंदुस्तान जैसा बड़ा अखबार आठ-दस हजार रुपए महीने पर खटवाता है। शशिशेखर ने अपने कुछ लोगों को छोड़ समाचारपत्र में शायद ही किसी को सम्मानजनक सैलरी दी है। हिंदी में पत्रकार वैसे भी बैगन के भाव उपलब्ध हैं। शशिशेखर जैसे संपादक इसी का लाभ उठाते हैं। चपरासी से भी कम तनख्वाह पर काम करने वाला पत्रकार क्या करे? वह इधर उधर से कमाएगा, प्रापर्टी डीलिंग, दुकान मकान का कारोबार करेगा और फिर बेमौत मारा भी जाएगा।

मरने के बाद जिंदगी भर दूसरों की खबर छापने वाला खुद खबर बन कर रह जाएगा। कुछ दिन शोर शराबा होगा और फिर मृतक परिवार के दरवाजे पर कोई झांकने तक नहीं जाएगा। हाल ही में मेरे अनुज अनूप झा की पत्नी ने फांसी लगा कर आत्महत्या कर ली ..क्यों? क्योंकि एक हिंदी दैनिक में काम करने वाले अनूप की एक सड़क दुर्घटना में मौत हो गई थी। खूब शोर मचा। 20 साल नौकरी करने के बाद भी अनूप इतना नहीं कमा पाए थे कि उनका परिवार दो चार साल तक बैठ कर खा सके। मौत के एक साल के भीतर ही दो बच्चों को छोड़ उसकी पत्नी ने आत्महत्या कर ली। संपादकों के मर्सिया पढ़ने से कुछ नहीं होगा। यदि सही में चाहते हैं कि पत्रकार बेमौत न मारे जाएं तो सबसे पहले सम्मानजनक सैलरी देने दिलवाने की शुरुआत करें… आज मजीठिया वेज बोर्ड के पक्ष में कितने संपादकों ने बोला है….नाम पता हो तो जरूर बताएं….

लेखक संदीप ठाकुर दिल्ली के कई अखबारों चैनलों में वरिष्ठ पदों पर कार्यरत रहे हैं.

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