संजय सिन्हा-
लिब्रांडू, वामी, आपिया, पत्तलकार, गोदी, कांगी के बाद अब यह एकदम नया नाम जुड़ा है, मूत्र। कभी ये खबरों के सूत्र होते थे। इसी आधार पर अब उन्हें मूत्र कहा जा रहा है।
आज संजय सिन्हा की कहानी यहां से आगे बढ़नी थी कि IIMC में दाखिला मिलने के बाद क्या हुआ? आपमें से कई पाठक उस किस्से की अगली कड़ी का इंतज़ार कर रहे हैं, खासकर तब, जब मैंने कल आपको सुना ही दिया कि कैसे मार्च 1988 में सिर्फ 50 रुपए में 31 दिन गुजारे, बिना मन का संताप बढ़ाए, बिना विचलित हुए।
मैं कोई आत्मकथा नहीं लिख रहा हूं। मेरी कहानी तो सिर्फ इसलिए यहां तक पहुंची क्योंकि मैं पत्रकारिता के संसार में ‘नहीं झुकेगा साला’ के कांसेप्ट के साथ आया था।
झुकने वाली नौकरी पसंद आती, तो ट्रेन में टीटीई बनता, बैंक में लोन देने वाला मैनेजर बनता, बिजली विभाग में मीटर रीडर बनता, ठेकेदार बनता, या पुलिस का थानेदार बनता। कुछ भी बन जाता, पत्रकार नहीं।
‘जनसत्ता’ में 11 साल रह कर ‘ज़ी’ में गया (1999 में), तो पहला असाइनमेंट मिला थर्ड फ्रंट की पार्टियों का। कम्युनिस्ट, आरजेडी, समाजवादी, बहुजन समाज। इनकी प्रेस कॉन्फ्रेंस में चाय का जुगाड़ तो होता था, समोसे-पकौड़े नहीं।
टीवी और प्रिंट की दुनिया में कांग्रेस और बीजेपी बीट पर बैठे पत्रकारों को चाय के साथ ठंडा (कोका कोला) भी मिलता था, साथ में पकौड़े, समोसे भी। लेकिन थर्ड फ्रंट वाले? फक्कड़। कम्युनिस्ट पार्टी मुख्यालय (अजय भवन) की प्रेस कॉन्फ्रेंस में चाय भर मिल जाती तो बहुत हो जाता। बाकी पार्टियां?
एक पार्टी थी लालूजी की। राष्ट्रीय जनता दल। एक पार्टी थी मुलायम सिंह की समाजवादी पार्टी। सबसे बेकार थी शरद यादव वाली पार्टी। छोड़िए उनकी चर्चा भी यहां व्यर्थ है। लालूजी की पार्टी पत्रकारों को खिलाने-पिलाने में यकीन नहीं रखती थी। सीधे पाल लेने में यकीन रखती थी। लालूजी जिन्हें पसंद कर लेते, जो मन भा जाता, उसे अपना लेते थे।
एक बार भरोसा जीत लिया, तो फिर वो पत्रकार उनके हाथ का बना मीट, मछली, लिट्टी-चोखा पार्टी का हिस्सा हो जाता था। और वो पत्रकार ही क्या जो मदिरा का शौक न रखता हो? लालू प्रसाद तब पटना पर राज करके थक चुके थे, अब दिल्ली में थे। बिहार भवन, बिहार निवास, पार्टी कार्यालय और सांसद का सरकारी मकान सब उनका था। हिंदी भाषी पत्रकार उनके करीबी थे।
मुलायम सिंह सीधे खिलाते थे, लालूजी बस पालते थे। मुलायम सिंह के पास थे अमर सिंह। लालू के पास लालू खुद थे। लालूजी का अंदाज़ देसी था। वो खुद मीट बनाते, लुंगी-गंजी पहनकर परोसते। देसी पत्रकार उनके देसी प्रेम में पल जाते थे।
ओह, ये कहानी क्यों सुना रहा हूं? असल में लालू यादव के बेटे तेजस्वी यादव ने पत्रकारों को सूत्र की जगह मूत्र कहा है। कहा, “अब पत्रकारों पर भरोसा नहीं रहा। वो खबर देने वाले सूत्र नहीं, मूत्र बन गए हैं। दुर्गंध छोड़ते हैं।
याद आया। एक था भस्मासुर। शिव जी से वरदान मांगा था, “जिसके सिर पर हाथ रखूं, वो भस्म हो जाए।” शिवजी बोले, “तथास्तु।”
लालूजी के दरबार में मीट, मछली, लिट्टी खाकर, ब्लू लेबल पीकर पलने वाले पत्तलकार तब भस्मासुर नहीं थे, सूत्र थे। अब वही पत्तलकार अगर सत्ता बदलने के बाद दूसरी पार्टी की गोदी में चले गए, तो वो मूत्र हो गए? पहले वो बिकाऊ नहीं थे। उन्हें अपना मोल ही पता ही नहीं था।
पत्रकारिता में बिकने की कहानी कभी लिखी जाएगी, तो दक्षिण में ये ताज जयललिता के सिर पर और हिंदी पट्टी में अर्जुन सिंह, कमलनाथ, मुलायम सिंह, लालू प्रसाद और राम विलास पासवान के सिर पर चमकेगा।
लालू यादव सबसे देसी थे (हैं), जो पसंद आया उसे पाल लिया। बाकी नेता वो अंदाज़ नहीं अपना सके। लालूजी ने पत्रकारों को प्रेम से पाला, वरदान दिया। अब वही पत्तलकार सत्ता बदलने पर जब उनके बेटे के सिर पर हाथ रख रहे हैं, तो उन्हें मूत्र कहा जा रहा है। पत्तलकार, टॉमी, लिब्रांडू, वामी, आपिया, कांगी के बाद अब मूत्र?
रसायन शास्त्र कहता है, दो हिस्से हाइड्रोजन के और एक हिस्सा ऑक्सीजन मिलकर पानी बनाते हैं। वही पानी जब शरीर में जाता है और शरीर अपने लाभ पा लेने के बाद उसे बाहर निकालता है, तो वो मूत्र बन जाता है। है तो वो भी पानी ही लेकिन बदबूदार।
तेजस्वी यादव स्कूल जाते तो जान जाते कि मूत्र में 95 फीसदी पानी ही होता है। बाकी फीसदी में यूरिया, क्रिएटिनिन, यूरिक एसिड, सोडियम, पोटैशियम, कैल्शियम, सल्फेट…
अगर वो ठीक से स्कूल गए होते (पिताजी ने स्कूल चलने दिया होता), तो जानते कि मूत्र का भी काफी इस्तेमाल हो सकता है। वो मूत्र के केमिकल कंपोनेंट निकाल लेते। लेकिन ये कब और कैसे होता?
पत्तलकारों को जो लत पिताजी ने लगाई, मीट, लिट्टी और ब्लू लेबल की, वही पत्तलकार सत्ता बदलने पर दूसरी गोद में चले गए। भरे पेट वाले क्या करते हैं? मूत्र ही तो छोड़ते हैं।
अब तेजस्वी जी कह रहे हैं कि ये सब अब सूत्र नहीं रहे, मूत्र हो गए हैं। किसने बनाया मूत्र? जब आपके पापा ने भस्मासुर बनाए, तब ठीक था? अब वही आपके सिर पर हाथ रख रहे हैं तो आप परेशान हो रहे हैं? वो तो रखेंगे ही। भस्मासुर को जब भी पाला जाता है, वो सबसे पहले पालने वाले के सिर पर ही हाथ रखता है।
तेजस्वी जी, सत्ता में आइए। सारे भस्मासुर आपके साथ नाचते हुए खुद को भस्म न कर लें, तो संजय सिन्हा का नाम बदल दीजिएगा। फिलहाल आप इन्हें टॉमी, आपिया, लिब्रांडू, पत्तलकार कह लीजिए, लेकिन मूत्र मत कहिए। बल्कि मूत्र सूत्र कैसे बनाए जाते हैं, इस पर सोचिए। कुछ समझ में न आए तो पापा से पूछिए।
और हां, मैं (संजय सिन्हा) कुछ भी बनने नहीं आ रहा हूं। मैं तो तब भी कुछ बनने नहीं गया था, जब IIMC की पढ़ाई के बाद हमारे निदेशक जसवंत सिंह जादव ने मुझे सीधे UPSC के ज़रिए सरकारी अधिकारी (IIS) बनने का प्रस्ताव दिया था।
मेरे साथ IIMC में पढ़े कई छात्र (बहुत से) सीधे सरकारी नौकरी (भारतीय सूचना सेवा) में चले गए। बहुत से। कई अब आकाशवाणी, दूरदर्शन, प्रकाशन विभाग, प्रेस इनफार्मेशन ब्यूरो और कई जगहों पर अधिकारी हैं।
लेकिन मैंने जादव जी से कहा था, “सर, गर जो मुझे सरकार की सलामी बजानी होती, तो पत्रकारिता में आता ही क्यों? मुझे तो नहीं झुकने की बीमारी है। नहीं झुकेगा साला…।”
मूल कहानी IIMC वाली फिर कभी। शायद कल। आज तो बस अपनी बिरादरी के नए नामकरण का जश्न है। मन ही मन सोचता हूं, “हे भगवान, क्या-क्या देखना लिखा है इन आंखों को! और क्या-क्या सुनना बदा है इन कानों को? मूत्र….?
संदर्भ – दरअसल, बिहार में चुनाव आयोग की ओर से मतदाता सूची सुधार प्रक्रिया के तहत यह दावा किया गया कि वोटर लिस्ट में नेपाल, बांग्लादेश और म्यांमार के वोटर शामिल हैं। इस खबर को कुछ ‘सूत्रों’ ने चलाया। इसी पर तेजस्वी यादव ने ट्वीट किया- ये सूत्र नहीं मूत्र हैं।
नोट-
- असली नेता मोरारजी देसाई थे। मूत्र को सीधे पान कर लेते थे और उसमें मौजूद यूरिया, क्रिएटिनिन, यूरिक एसिड, सोडियम, पोटैशियम, कैल्शियम, सल्फेट सभी अनमोल तत्वों को री यूज करते थे।
- इस्तेमाल का ज्ञान बीजेपी से लीजिए। वहां सब शुद्ध हो जाता है।
- राजनीति में जो मूत्र से परहेज करता है, पीछे रह जाता है। मूत्र को फिर से सूत्र बनाइए। उनसे झगड़ा मोल लेकर तो सदी के शहंशाह अमिताभ बच्चन भी 90 के दशक में डूब गए थे। उन्हें भी उन ‘मूत्रों’ से माफी मांगनी पड़ी थी, सिनेमा में टिके रहने के लिए
- मूत्र पान की आदत डालें। उन्हें हिकारत से न देखें।
- उसमें 95 फीसदी तो पानी ही है। बाकी यूरिया, क्रिएटिनिन, यूरिक एसिड, सोडियम, पोटैशियम, कैल्शियम, सल्फेट सब की मेडिसिन वैल्यू है।
- यूज देम।
मूल खबर….




Atul Gupta
July 15, 2025 at 12:07 am
Priya Sinha Ji , Mere pass aapki prashanasha ke liye shabd nahin hain. Kripya mujh tuchh se Pathak ka pranam sweekar karen.
Preeti Srivastava
July 16, 2025 at 10:48 am
जबरदस्त लिखा है संजय जी