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सुख-दुख

हंसी, ठहाके और विनोदप्रियता से भरपूर सुधांशु का उठकर जाना खल रहा है!

अजय ब्राहात्म्ज-

सुधांशु भी महफिल छोड़ कर चले गए।

फ्रीलांसिंग के दिनों में सुधांशु के साथ काफी मेलजोल रही। अगर मैं जनसत्ता, सबरंग या संझा जनसत्ता आर्टिकल देने पहुंच जाता था तो यह तय होता था कि शाम में हमलोग साथ ही लौटेंगे। इंडियन एक्सप्रेस बिल्डिंग से निकलने पर लिक से थोड़ा आगे जाकर हम दोनों भजिया लेते थे। और उसे खाते-चबाते हुए अंधेरी स्टेशन उतरते थे। वहां से फिर अपने-अपने स्कूटर लेकर अपने घरों को लौट जाते थे।

कभी-कभी उनके आवास पर भी जाता था। वह हमेशा तत्पर और सहायता के लिए तैयार मिले। फ्रीलांसिंग के दिनों में किसी नियमित पत्रकार का सहयोग संरक्षण की तरह होता है। मैं कह सकता हूं कि मुझे सुधांशु का संरक्षण हासिल था।

उन दिनों जब मैं भागलपुर गया था तो उनके घर भी गया था।

अपने काम और कॉलम के प्रति सुधांशु जैसी सलंग्नता बहुत कम पत्रकारों में मैंने देखी है।

हंसी, ठहाके और विनोदप्रियता से भरपूर सुधांशु का उठकर जाना खल रहा है।

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