
हेमंत शर्मा-
इस मलंग आख्यान के पाठक बनिए… मैं पढ़ने में आलसी जंतु हूँ. परंतु नियमित लिखंतु हूँ. हालांकि अब किताबें उतनी पढ़ नहीं पाता. पढ़ना एकाग्रता का काम है. और मेरा जीवन अतिशय चलायमान है. फिर पढ़ूँ भी तो क्या? हिन्दी में बहुत रोचक लिखा भी नहीं जा रहा है जो आपको पढ़ने को विवश करे. पर मित्रों का लिखा पढ़ना ही पड़ता है. बहुत दिनों बाद कोई किताब पढ़ी- ‘सुन यार मलंगा’. इसके लेखक अमरेश द्विवेदी मेरे मित्र हैं. टीवी में साथ काम किया है. हिंदी कथा लेखन की जड़ता को तोड़ते उनके दो उपन्यास पिछले दिनों आए. यह उस क्रम में नया रचना संसार है.
कहानी कहना मनुष्य का सबसे पुराना शगल है. और प्रेम कहानी शायद उसकी सबसे स्थायी अभिव्यक्ति. फिर भी हमारे समय का एक विचित्र सच यह है कि गद्य साहित्य की सबसे समृद्ध परंपरा, आज कहीं थकी हुई सी लगती है. ऐसे दौर में प्रेम, स्मृति और युवा मन की हलचल को लेकर लिखी गई कहानियां केवल मनोरंजन नहीं करतीं, वे पाठक के भीतर खोई हुई संवेदना को भी जगाती हैं. यही कारण है कि जब कोई नई कथा सामने आती है, तो ऐसा लगता है कि जैसे वो गद्य की एक पुरानी परंपरा को फिर से सांस दे रही है.
‘सुन यार मलंगा’ भी ऐसी ही एक कथा का आमंत्रण है. शीर्षक से ही महसूस होता है कि यह कुछ मलंग किरदारों की कहानी है. कहानी लंदन से शुरू होकर रांची होते हुए जेएनयू की है. उन लोगों की है जो जीवन को नियमों से ज़्यादा दिल की धड़कनों के सहारे जीते हैं. कई परतों में खुलती यह कथा मूलतः प्रेम की कहानी है. कहानी जेएनयू की है पर प्रेमकथा अमरेश की लगती है. जो पाठक को धीरे-धीरे उस समय में ले जाती है जब जेएनयू के गलियारों में कदमों से ज्यादा दिल धड़कते थे.
मैंने अमरेश को लेखक बनते देखा है. उनके रेडियो से टीवी और फिर कथा संसार में विचरने का मैं गवाह हूँ. कह सकते हैं कि टीवी में उनकी जो गढ़ाई हुई है उसमें हथौड़ी और बंसुला मेरा भी था. वे केवल पत्रकार नहीं दास्तानगोई के भी उस्ताद हैं. किताब पढ़ते लगता है कि अमरेश खुद कहानी सुना रहे है. कथ्य की संवेदना, शिल्प की नवीनता अभिव्यक्ति की सजीवता और भाषा का प्रवाह उनमें इतना ही सहज है जितनी सहजता से माइकल शूमाकर अपनी फरारी चलाता है.
‘सुन यार मलंगा’ की भावभूमि वह जेएनयू है जहां हर वक्त क्रांति का बारूद हाथ में लिए लाल सलाम ठोंकते रणबाँकुरे मिलते हैं. चुनांचे इस किताब में उस क्रांतिधर्मा ज़मीन से प्रेम की कोपलें फूटती हैं. वाणी प्रकाशन से छपी यह किताब युवाओं में ख़ासी लोकप्रिय हो रही है. मैंने इससे पहले विश्वविद्यालयी भावभूमि पर लिखा काशीनाथ सिंह का उपन्यास ‘अपना मोर्चा’ पढ़ा था. लेकिन वह प्रेमकथा पर नहीं, छात्र आंदोलन पर आधारित उपन्यास था.
जेएनयू अक्सर बुरी ख़बरों में रहता है. कभी नशा, कभी राजनीति या फिर कभी बगावत और देश विरोध नारेबाज़ी के कारण चर्चा के केन्द्र में रहता है. पर अमरेश के जेएनयू में बगावत नहीं प्रेम का स्पंदन है. लगता है यह प्रेम कहानी खुद उनकी है जिसे अबतक उन्होंने ज़माने से छुपाया है. मतलब यह उनका भोगा हुआ यथार्थ है जो यथार्थ की सबसे प्रामाणिक अवस्था है. झारखण्डी अमरेश यह कथा लंदन से शुरू करते हैं. और फिर कथा रांची होते हुए जेएनयू के इर्द गिर्द ही रहती है.
इस उपन्यास के दो हिस्से हैं. पहले हिस्से में लेखक आज से दो-ढाई दशक पहले के जेएनयू की ज़मीन पर कथा को विस्तार देता है. नील माधव पाण्डेय कहानी का नायक है और वासवी नायिका. पाण्डेय जी के मन में एक ओर आसक्ति का उबाल है वहीं दूसरी तरफ विचारधारा के चुनाव का द्वन्द भी. उपन्यास को पढ़ते हुए ऐसा लगता है जैसे लेखक हाथ पकड़कर आपको जेएनयू की सैर करा रहा हो. अमरेश का शंका-प्रश्नाकुल मन विश्विद्यालयी मुद्दों का जवाब भी ढूंढता है.
मूल कथा के अलावा कई कथाएं भी हैं. जेएनयू के हॉस्टल, ढाबे, छात्र जीवन की शरारतें, चुहल, मस्ती और साथ में लिखने-पढ़ने की दुनिया को जैसे आप कथानक के साथ चलते हुए अपनी आँखों से देख रहे हों. चोट सिंह, कछुआ सर, मौलेश जैसे तमाम किरदार उपन्यास को बहुरंगी बनाते हैं. नील के दोस्त मुकुन्द का किरदार रोचक और असरदार है. छात्र जीवन से जुड़ी घटनाओं के साथ पहले भाग की कथा आख़िर में जाकर एक ऐसा मोड़ ले लेती है जो पाठक को हैरान करती आगे की कथा जानने के लिये बेचैन बनाती है. ‘सुन यार मलंगा’ ऐसी प्रणय गाथा है जो समय की हरारत पर आज का सरगम लिखती है.
अमरेश पत्रकारिता की दुनिया का जाना-पहचाना नाम हैं. दो दशकों का अनुभव, 14 वर्षों तक बीबीसी से जुड़ाव और लंदन में बिताए गए दो साल, सबने उनकी दृष्टि को व्यापक बनाते हैं. अख़बार, टीवी और रेडियो- पत्रकारिता की तीनों धाराओं से गुजरते हुए उन्होंने भाषा और संस्कृति की जिस समझ को साधा है, वही उनकी लेखनी को कलात्मकता देती है. शायद यही कारण है कि ‘सुन यार मलंगा’ केवल एक प्रेम कथा नहीं, बल्कि गद्य परंपरा की उस जीवित धड़कन का एहसास कराती है जिसे हमारे समय में फिर से सुनना बेहद जरूरी है.
दरअसल, हम भागती दौड़ती ज़िंदगी में प्रेम से विरत होते जाते हैं. प्रेम खोता जाता है और हम पहले से ज्यादा व्यस्त. जीवन में आगे बढ़ने के साथ जटिलताएं और व्यापक रूप लेती चली जाती हैं. इन जटिलताओं के चश्मे से दुनिया को देखने की आदत इस कदर हमें अपनी जद में ले लेती है कि हम सरल, सहज और प्रेम की बातें देखना, पढ़ना, कहना और जानना भूल जाते हैं. लेकिन सृजन और नएपन के लिए सबसे ज़रूरी तो प्रेम ही होता है, सहजता ही होती है. इस सहजता को अपने भीतर ज़िंदा रखना एक ज़रूरत भी है और चुनौती भी. अमरेश का यह उपन्यास आपको वापस उसी ओर ले जाता है, इसलिए भी यह एक ज़रूरी पाठ है.
अमरेश ज़मीन से जुड़े पत्रकार हैं. आवाज़ के जादूगर हैं. बेहतर अनुवादक हैं. उनके अनुवाद देख आप मान सकते हैं कि अनुवाद भी एक विधा है. वे साहित्य में हैं. लेखन में आनंद लेते हैं. आज कल मास्टर हो गए हैं. वे पढ़ाकू तो हैं ही, लिक्खाड़ भी हैं. दोनों एक साथ मुश्किल से मिलते हैं. आप सब भी पढ़ें. मजा आयेगा. और न आने पर… अमरेश बताएंगे. जय जय.



