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आज के अखबार : सुप्रीम कोर्ट ने प्रदूषण से निपटने के उपायों को ‘पूरी तरह नाकाम’ कहा, शीर्षक कहां बना?

संजय कुमार सिंह

दिल्ली-एनसीआर में वायु प्रदूषण कम करने के लिए किए गए उपायों को सुप्रीम कोर्ट ने ‘पूरी तरह नाकाम’ कहा है। मेरे नौ अखबारों में सिर्फ हिन्दुस्तान टाइम्स ने इसे इसी रूप में छापा है। लीड का शीर्षक है, ‘Total failure’: SC instructs CAQM to redo bad air plan [पूरी तरह नाकाम : सुप्रीम कोर्ट ने वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग (सीएक्यूएम) से कहा कि प्रदूषित वायु से संबंधित योजना को फिर से दुरुस्त करे]। वैसे तो वायु प्रदूषण की खबर इंडियन एक्सप्रेस, टाइम्स ऑफ इंडिया, नवोदय टाइम्स और अमर उजाला में भी लीड है लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने सरकार के काम या उपायों को पूरी तरह नाकाम बताया है वह हिन्दुस्तान टाइम्स के बाद अमर उजाला के शीर्षक से पता चलता है। शीर्षक है, “वायु प्रदूषण के तात्कालिक उपाय नाकाम, नौ टोल प्लाजा हटाएं या बंद करें”। यहां मुद्दा सरकार की नाकामी है। एनसीआर में हर आदमी प्रदूषण को महसूस कर रहा है और सुप्रीम कोर्ट ने सरकारी उपायों को पूरी तरह नाकाम कहा है। लेकिन अखबार जनता को नहीं बता रहे हैं,  बचा रहे हैं या हल्का कर दे रहे हैं। यह इरादतन हो या स्वाभाविक – रेखांकित करने योग्य है। खास कर तब जब सरकार का हर मामले में बचाव किया जाता है, उसकी आलोचना नहीं के बराबर है और जब आलोचना होती है तो सरकार और सत्तारूढ़ पार्टी के प्रचारक उसे लीपने-पोतने में पूरी ताकत लगा देते हैं। सरकार ने जो उपाय किए हैं उसके अलावा पार्टी स्तर पर या कहना चाहिए पूरा इको सिस्टम सरकार का बचाव करता है, विपक्ष की आलोचना का कोई मौका नहीं चूकता है। फिर भी सुप्रीम कोर्ट ने कहा है तो उसे प्रमुखता क्यों नहीं देना खासकर तब जब सरकार और उसके समर्थक सुप्रीम कोर्ट की आलोचना से भी नहीं चूकते। मुख्य न्यायाधीश पर जूता फेंकने वाले के खिलाफ पुलिस ने कोई कार्रवाई नहीं की। भले इसका कारण यह बताया जाए कि मुख्य न्यायाधीश ऐसा नहीं चाहते थे लेकिन इस मामले में अदालत और मुख्य न्यायाधीश के खिलाफ लिखने – बोलने वालों पर भी कार्रवाई नहीं के बराबर ही हुई है। वैसे तो यह अलग मुद्दा है लेकिन इस सरकार के मामले में क्लिन चिट और विपक्ष के खिलाफ फैसलों का उपयोग प्रचार के रूप में किया जाता रहा है। मौके-बेमौके सरकार समर्थकों ने अदालत की आलोचना तो की ही है, अदालत पर दबाव डालने के भी ढेरों उदाहरण हैं। बचाव में जज के तबादले के भी।

इसे सभी संवैधानिक संस्थाओं पर सरकार के कब्जे और आरएसएस के लोगों को बैठा दिए जाने के आरोप के संदर्भ में देखिए तो साफ है कि चुनाव आयोग से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक पर सरकार का दबाव है और मुख्य न्यायाधीश का मामला भी दूध का धुला नहीं है। ऐसे में अदालत के फैसले सरकार के खिलाफ या विपक्ष के अनुकूल हों तो अदालत पर आरोप लगाने का कोई मतलब नहीं है। फिर भी आज मुझे फेसबुक पर उमेश चतुर्वेदी का एक लेख मिला। शीर्षक है, विपक्ष के निशाने पर न्यायपालिका। कहने की जरूरत नहीं है कि अभी तक पत्रकार (और विशिष्ट नागरिक) सरकार के खिलाफ होते थे अब विपक्ष के खिलाफ हैं और सरकार का बचाव कर रहे हैं, उसका साथ दे रहे हैं। विपक्ष पर हमले का यह मामला इस तथ्य के बावजूद है कि आज टाइम्स ऑफ इंडिया के पहले पन्ने से पहले के अधपन्ने की लीड का शीर्षक है, SC: Growing trend of judges ‘hitting sixes’ before retiring (जजों में रिटायर होने से पहले छक्के लगाने की प्रवृत्ति बढ़ रही है : सुप्रीम कोर्ट)। जाहिर है, विपक्ष ने न्यायपालिका को निशाने पर लिया है तो वह निराधार नहीं है और चिन्ता का कारण नहीं होना चाहिए। जो स्थितियां हैं उसमें विपक्ष का काम है और पत्रकारिता जनहित की होनी चाहिए। सरकार के पक्ष में या विपक्ष के काम में अड़ंगा लगाने की तो बिल्कुल नहीं होनी चाहिए। वैसे भी, इस सरकार ने विपक्ष को कहां किसी लायक छोड़ा है और विपक्ष को कमजोर-बदनाम करने के लिए क्या नहीं किया है। फिर भी, पत्रकार अगर सरकार के पक्ष में हैं और अपने लाभ के लिए नहीं है तो जनहित और देशहित भी नहीं कर रहे हैं।

ऐसे समय में यह सब करना और सोशल मीडिया पर बताना भी अलग मानसिकता है। मैं यहां लेख के विषय या तथ्यों की बात नहीं कर रहा हूं। मैं सिर्फ विपक्ष के विरोध या सरकार के समर्थन की बात कर रहा हूं। लेख लिखना और सोशल मीडिया पर इसके बारे में बताना खुद के सही होने का विश्वास भी कहा जा सकता है। मेरे लिए यही चिन्ताजनक है। पांच साल में बदलने वाली सरकार ने 11 साल पूरे कर लिए हैं, 15 साल के लिए जनादेश है फिर भी उसी के प्रचार का मतलब तो यही है कि चुनाव की जरूरत ही नहीं है। क्या यह सरकार इतनी अच्छी है? या चुनाव चोरी, निष्पक्ष चुनाव, चुनाव आयोग की स्वतंत्रता मुद्दा ही नहीं है? ऐसे में सरकार का समर्थन या मजबूत विपक्ष का विरोध संदिग्ध लगता है लेकिन पिछले 10 सालों में सत्तारूढ़ दल का समर्थन बहुत बढ़ गया दिखता है। पुरानी कहावत है, चुप रहकर या जवाब नहीं देकर मूर्ख समझे जाने का खतरा मोल लेना, जवाब देकर तमाम शंकाओं को दूर कर देने के मुकाबले बेहतर है। अब लोग सब कुछ जानते हैं। व्हाट्सऐप्प या फॉर्वार्ड की गई सूचनाओं, जानकारियों के भरोसे दावे से कहते हैं कि व्हाट्सऐप्प पर आया था। शिक्षा और लोगों को शिक्षित करने के मार्ग में यह बड़ा भटकाव है लेकिन लोग फार्वार्ड करने से नहीं रुकते। ऐसी जानकारी देने और बनाने वालों की तो बात ही नहीं है। जहां तक दैनिक जागरण की बात है,  उसमें सरकारी प्रचार ही छपता है और मैं नहीं पढ़ता, कभी नहीं पढ़ा। पढ़ने वाले परिचितों और प्रिय लोगों से कहता हूं कि बच्चों का भविष्य सुरक्षित करना है तो जागरण से दूर रखिए लेकिन यह अलग मुद्दा है। आज की खबरों से साफ है कि दिल्ली में प्रदूषण गंभीर मुद्दा है। सरकार ने इसे कम करने के लिए जो कुछ किया उसे सुप्रीम कोर्ट ने पूरी तरह नाकाम कहा है और ऐसे समय में विपक्ष ने न्यायपालिका के खिलाफ अगर कुछ किया है और वह विधिवत है तो उसे दबाव कैसे कहा जा सकता है या क्यों कहा जाना चाहिए। क्या यह कानूनन (या नियमानुसार) इमरजेंसी लगाए जाने का अभी तक विरोध करने और अघोषित इमरजेंसी का अभी भी विरोध नहीं करने या कर पाने जैसा मामला नहीं है?

जो भी हो, किसी भी मामले को समग्रता में देखा और समझा जाना चाहिए। अखबारों में आज भी ऐसी खबरें छप रही हैं जो सरकार की मनमानी और कमजोरी बता रही हैं। अगर पत्रकारों को भी नहीं पता है तो यह उनका मामला है और ऐसे में सरकार का समर्थन करने वाले और चाहे जो कर रहे हों, देशहित तो नहीं हो रहा है। इसीलिए, प्रदूषण और अदालतों में भ्रष्टाचार या जैसा सुप्रीम कोर्ट ने कहा है, रिटायर होने से पहले छक्के लगाने की प्रवृत्ति बड़ी खबर नहीं बनी है या सिर्फ टाइम्स ऑफ इंडिया में लीड है। दूसरी ओर, अमर उजाला ने प्रदूषण को चुनौती देने के लिए बाबा रामदेव के योग का प्रचार किया है। मेरा मानना है कि प्रदूषण को चुनौती देने की जरूरत ही क्यों पड़नी चाहिए और हमारी ओर से यह काम सरकार क्यों नहीं कर रही है। देशबन्धु की लीड का उपशीर्षक है, वायु प्रदूषण के व्यावहारिक और कारगर समाधानों के बारे में सोचने की जरूरत। टाइम्स ऑफ इंडिया ने लीड से बताया है कि दिल्ली सरकार ने आदेश दिया है कि सरकारी और निजी कार्यालयों में आज से आधे लोगों को घर से काम करने दिया जाए। इसे सख्ती से लागू किया जाएगा और महत्वपूर्ण सेवाओं को इससे मुक्त रखा जाएगा।  

इंडियनएक्सप्रेस की लीड का शीर्षक है, हवा जहरीली है दिल्ली सरकार ने 50 प्रतिशत लोगों के लिए घर से काम करना जरूरी किया। सरकार ने निर्माण मजदूरों को रेवड़ी बांटने की भी घोषणा की है और यह हेडलाइन मैनेजमेंट का प्रयास हो सकता है। इसके तहत, प्रदूषण रोकने के लिए ग्रेप नियमों का पालन किए जाने से जिन निर्माण मजदूरों का काम प्रभावित होगा उन्हें एक बार 10,000 रुपए की सहायता दी जाएगी। कहने की जरूरत नहीं है कि यह इससे होने वाले नुकसान के मुकाबले बहुत कम है। भले गरीबों को एक साथ, एक बार मिलने से ज्यादा लगे। टेलीग्राफ की आज की लीड ढाका में भारतीय दूतावास को निशाना बनाए जाने की खबर है जबकि दिएशियनएज की लीड भारत इथोपिया संबंधों की मोदी की तारीफ है जिसे उन्होंने स्वाभाविक साथी कहा है। हिन्दू की लीड परमाणु ऊर्जा क्षेत्र में निजीकरण की इजाजत देने वाले विधेयक को लोक सभा में पास किए जाने की खबर है। यह दिलचस्प है कि वीबी जी-राम-जी विधेयक के बाद इस विधेयक का नाम Sustainable Harnessing and Advancement of Nuclear Energy for Transforming India (SHANTI) Bill, 2025 यानी शांति विधेयक 2025 है। आकार पटेल ने अपनी किताब (2021), Price of the Modi Years (मोदी का कार्यकाल किस कीमत पर) के तीसरे अध्याय मोदीनोमिक्स में लिखा है, भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने 2014 के चुनाव प्रचार के अंतिम दिनों में एक पुस्तक जारी की थी जिसका नाम था, “मोदित्व : दि आईडिया बिहाइंड द मैन”। यह 14 चीजों की सूची है जो स्पष्पटतः नरेन्द्र मोदी के विश्व नजरिए और अर्थशास्त्र को रेखांकित करती है। … यह तथ्य है कि मोदित्व और मोदीनोमिक्स को खुद मोदी ने कभी किसी लिखित कार्य के जरिए पारिभाषित नहीं किया है। इसलिए हमारे पास मंत्रों, एक्रोनिम (संक्षिप्त रूप) और एलिट्रेशन (अनुप्रास) की श्रृंखला है जिसके जरिए भिन्न मौकों पर उन्होंने अपने विचार बताए हैं। … लगता है वे इसमें काफी समय खर्च करते हैं। पुस्तक में ऐसे नामों और संक्षिप्त रूपों की सूची है जो पांच पन्नों में है। मनरेगा के बारे में नरेन्द्र मोदी ने 2014 के आस-पास जो कहा था उसके मद्देनजर जो अब हुआ वह बहुत पहले किया जाना चाहिए था। संभव है, देरी की वजह उसके लिए उपयोगी या प्रभावी नाम नहीं बन पाना रहा हो और वीबी-जी राम जी निश्चित रूप से नया और अनूठा है तथा किसी सरकारी विधेयक का नाम ऐसा पहले नहीं रहा और इसलिए इसे नरेन्द्र मोदी की योग्यता का परिणाम माना जाना चाहिए।

मैं रोज तीन हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल नौ, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। एआई का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।

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