
ऑपरेशन सिन्दुर की सालगिरह प्रधानमंत्री को याद है लेकिन मीडिया को शायद नहीं या याद करने की जरूरत नहीं लगी। आज तमिलनाडु में बहुमत का गणित पूरा नहीं होना,बंगाल में हिंसा, सुवेन्दु के सहायक की हत्या ज्यादातर अखबारों की बड़ी खबरों में है, आरजी कर अस्पताल की पीड़िता की मां अब विधायक हैं। उनकी ‘इच्छा’ भी खबरों में थी लेकिन पहले पन्ने पर नहीं दिखी। द टेलीग्राफ की एक खबर के अनुसार बंगाल भाजपा अध्यक्ष समिक भट्टाचार्य ने कहा है कि चुनाव बाद की हिंसा के मामले में भाजपा का ‘तृणमूलीकरण’ नहीं होना चाहिए। यह भाजपा शैली की राजनीति नहीं है और इसे भी लीड बना दिया जाता तो कोई क्या कर लेता। हालांकि, इससे यह पता नहीं चलता है बड़े लोग क्या चाहते हैं।
संजय कुमार सिंह
भाजपा की राजनीति कारण हो या शुद्ध पत्रकारिता – हिन्दुस्तान टाइम्स की लीड तमिलनाडु में सस्पेंस है और इंडियन एक्सप्रेस की लीड सुवेन्दु के सहायक की हत्या यानी बंगाल में चुनावी हिंसा। पश्चिम बंगाल चुनाव में और उसके बाद हिंसा होती रही है फिर भी कोलकाता के द टेलीग्राफ की लीड का शीर्षक सुवेन्दु के सहायक को गोली मारी गई है। देशबन्धु की लीड चुनाव के बाद बंगाल में हिंसा है। अमर उजाला ने बंगाल की हिंसा को पूरा महत्व दिया है और सुवेन्दु के सहायक की हत्या उसका एक भाग है। शीर्षक है, चुनाव बाद हिंसा में शुभेंदु के सहायक समेत तीन और की मौत, 433 उपद्रवी गिरफ्तार। चुनावी खबरों में एक और खास बात यह है कि तमिलनाडु में मुख्यमंत्री पद के दावेदार फिल्म अभिनेता और तमिलगा वेट्री कझगम (टीवीके) के प्रेसिडेंट का नाम अब सी जोसेफ विजय लिखा जा रहा है। “विजय” उनका स्क्रीन/लोकप्रिय नाम है। “जोसेफ विजय” उनका पारिवारिक-औपचारिक नाम है। सी यानी “चंद्रशेखर” उनके पिता (फिल्म निर्देशक एसए चंद्रशेखर) से जुड़ा है। ऐसे में उनका औपचारिक नाम “सी जोसेफ विजय” ही है। यह नाम तमिलनाडु विधानसभा चुनाव के दौरान सामने आया। नामांकन और शपथपत्रों में उन्होंने यही औपचारिक नाम इस्तेमाल किया है लेकिन वे विजय नाम से जाने जाते हैं और आज भी कई अखबारों में विजय ही हैं। लेकिन हिन्दुस्तान टाइम्स की खबर की शुरुआत ही है, अभिनेता से राजनेता बने सी जोसेफ विजय ने तमिलनाडु के राज्यपाल राजेन्द्र अर्लेकर से मुलाकत कर सरकार बनाने का दावा किया लेकिन अगली सरकार बनाने के लिए आमंत्रण नहीं मिला….। अभी हाल तक और तमाम खबरों में उन्हें हिन्दी में आम तौर पर “विजय” लिखा जाता रहा है। अगर पूरा नाम लिखना हो, तो “सी. विजय” या “थलपति विजय” भी लिखा जाता रहा है। देशबन्धु की खबर इस प्रकार है, अभिनेता से नेता बने जोसेफ विजय चंद्रशेखर ने… सरकार बनाने का दावा पेश किया। अमर उजाला और नवोदय टाइम्स में उन्हें आज विजय ही लिखा गया है। अंग्रेजी अखबारों में द टेलीग्राफ में उनका नाम टीवीके नेता जोसेफ विजय लिखा है, दि एशियन एज में सी विजय है, इंडियन एक्सप्रेस में सिर्फ विजय है जबकि टाइम्स ऑफ इंडिया में सी जोसेफ विजय लिखा है। हिन्दुस्तान टाइम्स की लीड का शीर्षक है, तमिलनाडु में सस्पेंस क्योंकि बहुमत का गणित अभी पूरा नहीं हुआ है। आपको याद होगा, मुख्य चुनाव आयुक्त जेएम लिंगदोह को जेम्स माइकल लिंगदोह कौन कहता था और महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री एआर अंतुले का सीमेंट घोटाला खुला तो वे अब्दुल रहमान अंतुले हो चुके थे। इस खुलासे का श्रेय इंडियन एक्सप्रेस तथा अरुण शौरी को है जो बाद में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में मंत्री बने थे।
यहां यह उल्लेखनीय है कि bhadas4media के शब्द चर्चा कॉलम में लिखा था, ऐक्टर विजय के नाम के आगे एक शब्द लगता है Thalapathy। हिन्दी में भी उनके नाम के आगे यह शब्द लगाया जाता है लेकिन उसकी स्पेलिंग में एकरूपता नहीं है। इसी कॉलम में आगे लिखा है, उनका पूरा नाम Chandrasekaran Joseph Vijay है। इस कॉलम के अनुसार, दैनिक जागरण, आजतक, नवभारत टाइम्स, एबीपी न्यूज, थलापति विजय लिख बोल रहे थे जबकि दैनिक भास्कर, न्यूज18, एनडीटीवी हिंदी की एक ख़बर में तलपति भी लिखा दिखा था। इससे पहले किसी अखबार या चैनल में सी जोसेफ विजय लिखा या बोला गया हो ऐसी सूचना इस कॉलम में नहीं है। हालांकि, बाद में इसका जिक्र जरूर है कि उनका पूरा नाम चंद्रशेखरन विजय जोसेफ है। टाइम्स ऑफ इंडिया की खबर के अनुसार, राज्यपाल के आगे बहुमत साबित नहीं कर पाने के कारण उनका शपथ ग्रहण लटका है। बंगाल में लाखों मतदाताओं को बाहर करने के बाद होने वाले चुनाव में हिंसा होनी ही थी। इसीलिए सुरक्षा बलों की अप्रत्याशित तैनाती की गई थी। आज और अभी इससे संबंधित दावों को गिनवाने की जरूरत नहीं है। इसके बावजूद तथ्य यह है कि बंगाल में भाजपा उम्मीदवार को दौड़ा कर पीटा गया, तृणमूल कार्यकर्ताओं की रक्षा सुरक्षा बलों की तैनाती का मकसद हो या नहीं, उनकी पिटाई के कई वीडियो दिखे और नतीजों की घोषणा के बाद चार लोगों की मौत की खबर कल थी। चार लोगों की मौत की खबर कल थी।
आज सुवेन्दु अधिकारी के सहायक की हत्या के साथ तीन और मौतों की खबर है। तृणमूल कांग्रेस की हार और भाजपा की जीत के बाद कानून व्यवस्था की स्थिति संभालना पूरी तरह भाजपा के जिम्मे है। सरकार बनाने, मुख्यमंत्री चुनने में देरी हो भी तो पुरानी व्यवस्था टीएमसी के नियंत्रण में नहीं थी और टीएमसी बाद की हिन्सा के लिए जिम्मेदार हो भी तो रोकना और कार्रवाई करना भाजपा सरकार का काम है। इंजन डबल हो या सिंगल। ऐसे में हिंसा हो रही है तो भाजपाई व्यवस्था की नाकामी है लेकिन बंगाल में तृणमूल को बदनाम करने के लिए एक हस्ती की हत्या की खबर आज लीड है। इससे पहले, आरजी कर अस्पताल में एक डॉक्टर से बलात्कार और हत्या के मामले को भी भाजपा ने मुद्दा बनाया था। इतना कि सुप्रीम कोर्ट ने भी उसका स्वतः संज्ञान लिया, सीबीआई से जांच करवाई गई, कुछ नया नहीं मिला, आरोपी जेल में है और पीड़िता की मां भाजपा की विधायक हो चुकी हैं। पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 में पनिहाटी से जीत दर्ज करने के बाद, आरजी कर मामले की पीड़िता और बीजेपी उम्मीदवार रत्ना देबनाथ ने “एक मां की न्याय के लिए जीत” बताया। उन्होंने कहा, “यह सिर्फ एक राजनीतिक पार्टी की जीत नहीं है, बल्कि एक मां की जीत है, इंसाफ की जीत है। मैं ममता (बनर्जी) से मिलूंगी तो बाल खींचकर जेल में डालूंगी”। रत्ना देबनाथ ने अपनी इस ऐतिहासिक जीत को प्रधानमंत्री मोदी और बंगाल की महिलाओं को समर्पित किया। रत्ना देबनाथ की इस जीत को ममता बनर्जी के गढ़ में बड़ी सेंध के रूप में देखा जा रहा है। आप जानते हैं कि कोलकाता के आरजी कर मेडिकल कॉलेज और अस्पताल में 9 अगस्त 2024 को ट्रेनी महिला डॉक्टर की रेप के बाद हत्या कर दी गई थी। मुख्य आरोपी संजय रॉय को अदालत ने जनवरी 2025 में आजीवन कारावास की सजा सुनाई है।
सीबीआई ने भी मामले की जांच की है और जांच रिपोर्ट सियालदह कोर्ट में पेश की है, हालांकि पीड़िता का परिवार अभी भी जांच संतुष्ट नहीं है। यहां बताता चलूं कि समझौता एक्सप्रेस ब्लास्ट मामले में जांच एनआईए ने की थी। 2019 में विशेष अदालत ने सभी आरोपियों को बरी कर दिया तो एनआईए या सरकार ने ऊपरी अदालत में अपील नहीं की। समझौता एक्सप्रेस में 18 फरवरी 2007 को विस्फोट हुआ था, जिसमें 68 लोगों की मौत हुई थी। मार्च 2019 में पंचकूला की एनआईए अदालत ने स्वामी असीमानंद समेत चारों आरोपियों को बरी कर दिया था। इसी तरह, 2008 के मालेगांव ब्लास्ट केस में सभी सात आरोपियों को जुलाई 2025 में बरी किया गया। यह फैसला मुंबई की विशेष एनआईए अदालत ने दिया था। विशेष जज एके लाहोटी ने कहा कि अभियोजन पक्ष आरोप साबित करने के लिए पर्याप्त और भरोसेमंद सबूत पेश नहीं कर सका। आरोपियों में पूर्व सांसद प्रज्ञा सिंह ठाकुर और प्रसाद श्रीकांत पुरोहित प्रमुख थे। एनआईए ने फैसले के बाद कहा था कि वह आदेश का अध्ययन कर रही है, लेकिन बाद में ऐसी खबरें आईं कि एजेंसी अपील करने के पक्ष में नहीं दिख रही। हालांकि, पीड़ित परिवारों ने बॉम्बे हाई कोर्ट में इस बरी किए जाने के खिलाफ अपील दायर की, और हाई कोर्ट ने उस अपील को सुनवाई के लिए स्वीकार भी किया है। इसकी तुलना में आतंकवाद (और नक्सलवाद भी) खत्म करने का केंद्र सरकार का दावा और अरविन्द केजरीवाल के मामले में सीबीआई की जिद्द और न्यायमूर्ति के पक्ष में दलील याद कीजिए। भाजपा का इकोसिस्टम कहां शोर मचाता है और कहां चुप्पी साध लेता है वह अलग विषय है।
आरजी कर मामले का मुख्य आरोपी, संजय रॉय सिविक वालंटियर था। उम्रकैद की सजा के साथ उसपर ₹1 लाख का जुर्माना भी लगाया गया है। पश्चिम बंगाल सरकार ने निचली अदालत के उम्रकैद के फैसले को चुनौती देते हुए कलकत्ता हाईकोर्ट में अपील की है और सजा को मृत्युदंड में बदलने की मांग की है। इस मामले में पूर्व प्रिंसिपल संदीप घोष और अन्य संबंधित लोगों के खिलाफ भी कार्रवाई की मांग उठी थी, और वे जांच के दायरे में रहे। हत्याकांड के बाद से ही देश भर में डॉक्टरों की सुरक्षा और ड्यूटी घंटों को लेकर प्रदर्शन तथा एनएचआरसी की सख्ती जारी है। बिहार, उत्तर प्रदेश में नारी के प्रति अपराध के मामलों में ऐसी कार्रवाई अमूमन नहीं होती है। शिकायत तो आम नागरिकों को भी नहीं है। सत्तारूढ़ भाजपा से क्या उम्मीद की जाए। बंगाल में सब होने के बावजूद भाजपा और उसके लोग तृणमूल का विरोध कर रहे हैं और यह भाजपा की राजनीति होगी लेकिन मीडिया में इसकी खबर को महत्व देने में भेदभाव भी रेखांकित करने लायक है। सुवेन्दु अधिकारी के सहायक की हत्या की खबर आज इंडियन एक्सप्रेस, टाइम्स ऑफ इंडिया के साथ कोलकाता के द टेलीग्राफ में भी लीड है। हिन्दी अखबारों में अमर उजाला और नवोदय टाइम्स में तो लीड है ही, देशबन्धु की लीड का शीर्षक थोड़ा अलग है – चुनाव बाद बंगाल में हिंसा। द हिन्दू में हिंसा की खबर सेकेंड लीड है। लीड तमिलनाडु की खबर है और शीर्षक है, तमिलनाडु के राज्यपाल ने विजय से बहुमत का सबूत मांगा। खबर के अनुसार राज्यपाल को 118 विधायकों के समर्थन की चिट्ठी चाहिए। सबसे बड़े दल के रूप में विजय ने सरकार बनाने का दावा किया है और नियम यह है कि सरकार को विधानसभा में अपना बहुमत साबित करना होता है।

मैं रोज तीन हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल नौ, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। एआई का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।


