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आज के अखबार : तय नहीं कर पाये कि प्रचार क्या करें, कैसे, कौन सा गाना गायें 

संजय कुमार सिंह

आज के सभी अखबारों में लीड अलग हैं। जहां एक ही खबर लीड है वहां शीर्षक अलग हैं और ऐसा नहीं लग रहा है कि सब ही एक स्थान से निर्देश ले रहे हैं। कायदे से अखबारों को ऐसा ही होना चाहिये और दो व्यक्ति के बनाये अखबार एक जैसे हो ही नहीं सकते बशर्ते पत्रकारिता की उनकी पढ़ाई एक ही स्कूल से नहीं हुई हो। मैं पहले भी लिख चुका हूं कि जनसत्ता में हमलोग अखबार देखकर समझ जाते थे कि किसने बनाया होगा। ऐसे में अलग-अलग संस्थानों और संपादकों के अखबार एक जैसे हो जायें तो जाहिर है कि मामला गड़बड़ है और ऐसा नहीं है कि आज के अखबार अलग हैं तो सब ठीक हो गया है। संभव है, ऐसा संयोग से हुआ हो या कल निर्देश नहीं हों या यही निर्देश हो। हेडलाइन मैनेजमेंट का मामला इतना आसान भी नहीं है। पर वह अलग मुद्दा है। मैं तो यह मानता हूं और बताना चाहता हूं कि अखबार पहले की तरह स्वतंत्र नहीं हैं। ऐसा नहीं है कि सरकार के दबाव में डर से खिलाफ खबरें नहीं छप रही हैं क्योंकि अखबारों को डराने धमकाने का काम कांग्रेस के समय में भी होता था और इमरजेंसी में जब अखबारों को झुकने के लिए कहा गया तो रेंगने लगे थे फिर भी स्थिति अब से बेहतर थी।

अब अखबार और टेलीविजन चैनल तो छोड़िये किताबें भी सेंसर हो रही हैं और रुक जा रही हैं। प्रचार वाली के लिए कोई कायदा कानून नहीं है पर वह अलग दुनिया है। मेरा मानना है कि अब के अखबार स्वेच्छा से प्रचारक बने हुए हैं और आलोचना से बचते हैं। यह सब शीर्षक और प्रस्तुति में ही दिखता है। जो खबरें मेरे अखबारों में पहले पन्ने पर नहीं होती हैं उनकी चर्चा मैं नहीं करता। मैं तो यही बता पाता हूं कि सरकार के सम्मान और प्रशंसा के साथ भिन्न मौकों पर बचाव और प्रचार भी अखबार करते हैं। यह तब भी चल रहा है जब दस साल से ज्यादा में एक प्रेस कांफ्रेंस नहीं हुई। ना अखबारों में उसकी शिकायत दिखती है। ऐसे में मैं यह बताना चाहता हूं कि सामान्य खबरों की प्रस्तुति में भी कभी कहीं, कभी कहीं और – पक्षपात दिखता है। संभव है यह विचारधारा के कारण हो और उनका असर हो जो मीडिया में वर्षों पूर्व प्लांट कर दिये गये थे। अब ऐसे लोगों की दूसरी पीढ़ी आ गई है।

आज के अखबारों में अगर महाराष्ट्र में मंत्रिमंडल बनने की खबर लीड है तो यह भी बताया गया है कि कितने मंत्रियों ने शपथ ली, भाजपा के सबसे ज्यादा हैं और सेना के मंत्री का कार्यकाल बारी-बारी से बदलेगा। इस तरह माओवादियों के लिए अमितशाह की चेतावनी है। उदाहरण के लिए टाइम्स ऑफ इंडिया की लीड का शीर्षक है, हिंसा छोड़ें या कार्रवाई का सामना करें (अमित) शाह माओवादियों से। इसी खबर का शीर्षक अमर उजाला में है, हथियार छोड़ मुख्यधारा में लौटें नक्सली… पुनर्वास हमारा जिम्मा, नक्सलवाद के खात्मे के लिए प्रतिबद्ध। मेरा मानना है कि पिछले दस साल में जब कई बार, कई मुठभेड़ में माओवादी मारे जा चुके हैं तो अब कैसी कार्रवाई की चेतावनी, किसलिये? जहां तक सरकार और आबादी के एक वर्ग की बात है, किसानों का मामला सबके सामने है। माओवादियों की समस्या उससे पहले से है। सरकार ने किसानों के मामले में कानून बनाया जो भले उनके भले के लिए था पर सरकार ने स्वीकार किया था कि वह उन्हें समझा नहीं पाई। जो भी हो, विरोध के बाद उसे वापस लिया गया तो किसानों से कुछ वादा किया गया था और उसे कई साल बाद भी पूरा नहीं किया गया है। ऐसे में अमित शाह के इस वादे का क्या महत्व या मतलब?

अमर उजाला की खबर और शीर्षक के लिहाज से देखें तो सबको पता है कि सरकार आतंकवाद के खात्मे के लिए भी प्रतिबद्ध है। कश्मीर चुनाव से पहले उसे खत्म कर दिये जाने का दावा भी किया गया था और यह समस्या ऐसी है जो नोटबंदी से खत्म हो जानी थी। वैसे ही जैसे वेश्यावृत्ति भी नोटबंदी से खत्म होनी थी। आम आदमी सरकार और अपने मंत्रियों की ऐसी बातें सुनने के लिए मजबूर है। संभव है अखबार वाले कहें कि हम भी उसी को रिपोर्ट करने के लिए मजबूर हैं। हो सकता है, हों भी। पर वे उनसे सवाल तो कर सकते हैं कि जब किसानों की समस्या खत्म नहीं हुई और माओवादियों को आप मार ही रहे हैं तो ये क्या बोल रहे हैं या कहने का क्या मतलब है। ठीक है कि मंत्रियों को भाषण देना होता है तो क्या बोलें या यही सब बोलेंगे पर उसे जस का तस रिपोर्ट करने वाले का काम है कि मंत्री को पुरानी बातें याद दिलायें और पाठकों को यह भी बतायें कि याद दिलाने पर मंत्री ने क्या कहा या कुछ नहीं कहा। यह सब अब नहीं होता है। मुझे लगता है कि ऐसी पत्रकारिता से सरकार का प्रचार ही हो रहा है और खबर यह है कि सरकार ने जनहित के काम कराने वाले तमाम एनजीओ को बंद करा दिये हैं तो ऐसे अखबारों को क्यों चलने दिया जा रहा है जिसमें कोई जनहित नहीं है। या वे सरकार का प्रचार करने के लिए ही हैं तो यह स्पष्ट कहा और स्वीकार किया जाये। जनता को तो बताया ही जाना चाहिये।   

अमर उजाला का उप शीर्षक है, गृहमंत्री (अमित) शाह ने रायपुर में कहा… 31 मार्च 2026 तक माओवाद को पूरी तरह खत्म कर देंगे। जहां तक खबरों की बात है, 16 सितंबर 2024 को अमित शाह ने किश्तवाड़ में कहा था, ‘आतंकवाद को इतना नीचे दफन करेंगे, कभी बाहर नहीं आ पाएगा’। 21 सितंबर को अमित शाह ने ही कहा जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद के लिए अब्दुल्ला, मुफ्ती, नेहरू-गांधी परिवार जिम्मेदार। इसके बावजूद उमर अब्दुल्ला मुख्यमंत्री हैं ही, प्रियंका गांधी वायनाड से जीतकर आ ही गई हैं। सरकार संसद में अदाणी पर बहस नहीं करवा रही है और आज ही अखबारों में छपा है, प्रधानमंत्री ने कहा कि इंडिया अगर एकजुट हो जाये तो भारत 2047 तक विकसित होगा। जाहिर है उनका इंडिया वह नहीं है जो भिन्न विपक्षी संगठनों के मिलने से बना है और वे जिस इंडिया को एक करने की बात कर रहे हैं उसमें मुसलमान नहीं है। और इसलिए अभी असंभव भी कहा जा सकता है फिर भी दि एशियन एज में आज यह खबर पहले पन्ने पर तीन कॉलम में छपी है। उपशीर्षक है, मोदी ने राज्यों से अपील की कि नवीनताओं (इनोवेशंस), जनभागीदारी को सपोर्ट करें। क्या इसमें उमर अब्दुल्ला के नेतृत्व वाला राज्य नहीं है? क्या इसमें प्रियंका गांधी के प्रतिनिधित्व वाला वायनाड नहीं है। क्या इनके एकजुट होने की जरूरत नहीं है। और ये सब एकजुट होंगे? नहीं होंगे तो खबर और बोलने का मतलब?

यहां गौर करने वाली बात है कि पहले की सरकारें न ऐसी शर्तें रखती थीं और ना इस तरह काम करती थीं। एक बार चुन लिये जाने के बाद जनप्रतिनिधि अपने पूरे चुनाव क्षेत्र का प्रतनिधि होता है। सांसद-विधायक बनने के बाद सबके लिए बिना किसी भेदभाव के काम करने की शपथ लेता है। सोनिया गांधी ने चुनाव जीत कर भी पद छोड़ दिया था लेकिन नरेन्द्र मोदी और उनके समर्थक समझते हैं (और यह प्रचारित किया गया है) कि प्रधानमंत्री के रूप में वे कुछ भी कर सकते हैं। ना खाउंगा ना खाने दूंगा के बाद भी अदाणी पर चर्चा नहीं करवाना उनका अधिकार है या बृजभूषण सिंह का संरक्षण उनकी जिम्मेदारी। ऐसे में भाजपा या नरेन्द्र मोदी की सरकार अपने ढंग से काम कर रही है और आबादी के बड़े वर्ग को छोड़ देने के लिए चुनाव हार जाती लेकिन जीते जा रही है। अगर ऐसा ईवीएम के कारण नहीं हो रहा है तो जाहिर है कि वे भी उन्हें वोट दे रहे हैं (हालांकि, उन्हें वोट देने से रोकने की शिकायतें कम नहीं हैं) जिनके लिए यह सरकार काम नहीं करती है या जिन्हें अपना दुश्मन मानती है।

कहने की जरूरत नहीं है कि मोदी सरकार ने तमाम संवैधानिक पदों पर अपने लोगों को बैठाया है और उनसे अपने अनुसार काम करवा रही है। पूर्व मुख्य न्यायाधीश को अपनी इस राजनीति का शिकार करने के लिए क्या सब किया और कैसे अपने लोगों को चुनाव आयोग में सेट किया। इसके बावजूद अब वे इंडिया को एकजुट होने की बात कर रहे हैं और भारत के विकसित होने क शर्त बता रहे हैं। जबकि लोकतंत्र में विपक्ष तो विरोध करता ही है सरकार को विपक्ष के साथ मिलकर काम करना होता है। यह सरकार विपक्ष के मुख्यमंत्रियों को जेल में डालकर उम्मीद करती है कि वे उनके नेतृत्व में नवाचार और जनभागीदारी का समर्थन करें। बेशक यह भाजपा की राजनीति है और अच्छी या बुरी नहीं भी कहें तो जो है उसे बताना अखबारों का काम है।  

आइये अखबारों की भूमिका और उनका काम समझने के लिए आज के लीड के शीर्षक देख लें।

  • दि एशियन एज

महाराष्ट्र में 39 मंत्रियों ने शपथ ली इनमें भाजपा को सबसे बड़ा हिस्सा मिला। फ्लैग शीर्षक के साथ बुलेट प्वाइंट्स के रूप में मंत्रिमंडल की खासियत बताई गई है।

2. हिन्दुस्तान टाइम्स

(शिन्दे) सेना के मंत्रियों का कार्यकाल बारी-बारी से बदलेगा – शिन्दे। इसके साथ की खबर का शीर्षक है, 39 मंत्रियों को शपथ दिलाई गई, पोर्टफोलियो दो दिन में बांटे जायेंगे।

3. इंडियन एक्सप्रेस

फडणविस सरकार ने 39 मंत्री शामिल किये, कार्यकाल का फैसला करने के लिए मध्य में समीक्षा होगी।

अब आज की दूसरी लीड का शीर्षक देखिये

4. नवोदय टाइम्स

नक्सली समर्पण करें या कड़ी कार्रवाई को तैयार रहें : शाह।

5. अमर उजाला 

हथियार छोड़ मुख्यधारा में लौटें नक्सली… पुनर्वास हमारा जिम्मा, नक्सलवाद के खात्मे के लिए प्रतिबद्ध।

6. टाइम्स ऑफ इंडिया

हिंसा छोड़ें या कार्रवाई का सामना करें : (अमित) शाह माओवादियों से

(मेरा सवाल है कि कथित मुठभेड़ में महिलाओं और बच्चों को भी मार दिया जाना क्या कड़ी कार्रवाई नहीं थी और अगर नहीं थी तो अभी तक कड़ी कार्रवाई क्यों नहीं की गई और अब करने की बात हो रही है तो किसलिये? क्या माओवादी हिंसा के मामले बढ़ गये हैं? अगर हां तो अखबार में क्यों नहीं छपे और नहीं तो अब कार्रवाई किसलिये। एक पाठक के रूप में ये सवाल मेरे दिमाग में हैं। मैं जवाब के लिये कहां जाऊं, क्या करूं?)

7. द हिन्दू

एक देश, एक चुनाव विधेयक आज लोकसभा में नहीं आयेगा। उपशीर्षक है, इस विषय पर दो विधेयक संशोधित लिस्ट से हटाये गये; संभावना है कि सरकार पहले वित्तीय काम पूर्ण करेगी;राज्यसभा पूरक ग्रांट पर चर्चा से दिन की शुरुआत करेगा।

8. द टेलीग्राफ

तनाव का नुकसान: विजय दिवस में कतरब्योंत। फ्लैग शीर्षक है, बांग्लादेश की छोटी टीम, ढाका में मार्च पास्ट नहीं।

आप समझ सकते हैं कि अंतिम दो लीड सरकार को कमजोर या खराब स्थिति में दिखाते हैं। एक देश एक चुनाव विधेयक पास भी हो जाये तो उससे कुछ होना नहीं है और महिला आरक्षण विधेयक पास होकर भी फिलहाल कुछ होना नहीं है। फिर भी सरकार चाहती है कि एक देश एक चुनाव विधेयक पास करा ले लेकिन उसे पेश नहीं किया जाना हो तो बड़ी खबर है लेकिन आज यह खबर मेरे आठ अखबारों में सिर्फ द हिन्दू में लीड है। हिन्दुस्तान टाइम्स में यह खबर सेकेंड लीड है और दोनों शीर्षक से साफ है कि खबर अटकल है, सरकार ने घोषणा नहीं की है। ऐसा सरकारीं खबरें सूत्रों के हवाले से छपने के कारण होता है और इस सरकार में ज्यादातर खबरें सूत्रों के हवाले से ही छपती हैं। पत्रकारिता पाठ्यक्रम की एक सीख यह भी है कि खबर वही है जो छिपाई जाती है जो पहुंचाई जाती है वह विज्ञापन या प्रचार है। इस लिहाज से सूत्रों की खबर को तय करना होता है कि वह खबर है या सूत्र का निजी स्वार्थ। आज यह स्पष्ट है कि सरकार इसे छपवाना चाहती है और अखबारों ने इसे पहले पन्ने पर छाप कर सेवा की है। यह खबर सभी अखबारों में नहीं है। इसका मतलब यह भी हो सकता है कि आदेश स्पष्ट नहीं था। यह अलग बात है कि कई बार खबर इस तरह लीक की जाती है कि संबंधित रिपोर्टर उसे एक्सक्लूसिव समझ लेता है और खबर को जरूरत से ज्यादा महत्व मिल जाता है। पर वह अलग मुद्दा है। आज की खबरों में एक खबर मणिशंकर अय्यर की आने वाली किताब के संदर्भ में उनके इंटरव्यू और उनकी कही बातों की है। अखबारों की खबरों में विविधता और सरकार खबरों से बचने के लिए उसे पहले पन्ने पर लिया जा सकता है लेकिन पीटीआई की ऐसी खबरें अब पहले पन्ने पर नहीं छपती है जबकि उमर अब्दुल्ला का कहा आज कई अखबारों में पहले पन्ने पर है। नवोदय टाइम्स में यह चार कॉलम में टॉप पर और अमर उजाला में आधे पन्ने के विज्ञापन के ठीक ऊपर। टाइम्स ऑफ इंडिया में यह खबर सिंगल कॉलम में है। अमर उजाला का शीर्षक है, ईवीएम का रोना बंद कर नतीजे कबूल करे कांग्रेस। वाशिंग मशीन में धुल गई ईवीएम। सबको पता है कि भाजपा जब सत्ता में नहीं थी तो ईवीएम का विरोध कर रही थी। ईवीएम का उपयोग कांग्रेस के शासन में शुरू हुआ और भाजपा ने शुरू होते ही उसका विरोध शुरू कर दिया था। कहा जा सकता है कि तमाम भ्रष्टाचारियों की तरह ईवीएम भी भाजपा की वाशिंग मशीन में धुल चुकी है और उमर अब्दुल्ला के आज के कथन को इस संदर्भ में देखा जाना चाहिये।

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