संजय कुमार सिंह
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने दावा किया कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने उन्हें भरोसा दिया है कि भारत अब रूस से तेल नहीं खरीदेगा। ट्रम्प का यह दावा सही हो या गलत – इस पर भारत (सरकार या प्रधानमंत्री) को कहना चाहिए था कि नहीं, ऐसा नहीं है। हम रूस से तेल खरीद रहे हैं, नहीं खरीद रहे हैं या तेल उसी से खरीदते हैं जो सस्ता देता है, हमारी जरूरतों के अनुसार होता है या हमारी शर्तों पर देता है या जो हमारी मर्जी होगी। यह भी कि, ट्रम्प का दावा हवा हवाई है या इस कारण किया गया होगा। दावे को नजरअंदाज किया ही जा सकता था, विपक्ष के दावों, सवालों और आरोपों के बावजूद चुनाव आयोग की तरह चुप्पी मारी जा सकती थी पर आज के अखबारों की लीड यही है। मेरे नौ अखबारों में हिन्दुस्तान टाइम्स अकेला है जिसने इस खबर को पहले पन्ने पर जगह नहीं दी है। कहा जा सकता है कि उसने इस खबर को पहने पन्ने लायक नहीं माना है। यहां खबर है कि अमित शाह देश में एक्सक्लूसिव जेल बनवाना चाहते हैं। इसका घोषित कारण और संभावनाएं अलग चर्चा का मुद्दा है। पर वह सब अब होता नहीं है। मैं भी अभी इसकी चर्चा नहीं कर रहा हूं। उन अखबारों की चर्चा करूंगा जिन्होंने इस मामले को पहले पन्ने पर रखा है। मेरा मानना है और यह बहुत सामान्य अपेक्षा है कि अखबारों का काम यह नहीं था कि वे ट्रम्प के दावे को झुठलाएं या भारत सरकार का पक्ष प्रचारित करें। अखबारों का काम है सच्चाई बताना, खबर देना। भारत सरकार ने जो जरूरी था वैसा कुछ भी स्पष्ट नहीं कहा है। जैसे वह रूस से तेल की खरीद पूरी तरह बंद कर देगा या खरीदता रहेगा, अभी नहीं खरीद रहा है या अभी भी खरीद रहा है या खरीद की स्थिति यह है।
भारत (सरकार) ने कहा है, सरकार की नीति यह रही है कि “जहाँ सौदा बेहतर हो, वहीं से तेल खरीदेंगे”। मुझे लगता है कि यह बताने या कहने वाली बात ही नहीं है। इसमें न कुछ नया है और ना यह खबर है। ट्रम्प के दावे के संदर्भ में तो बिल्कुल नहीं। ट्रम्प ने जो कहा उसका यह मतलब किसी तरह नहीं निकलता है। जो कहा गया है उसका मतलब यह भी है कि, व्यावसायिक और आर्थिक परिस्थितियों, लॉजिस्टिक्स, बीमा, तेल की गुणवत्ता, आदि के कारण रूस से खरीद में कमी आ सकती है। यह नहीं है कहा है कि कमी की गई है या की जाने वाली है। जाहिर है, सरकार अपना पक्ष स्पष्ट नहीं कर रही है। मामला प्रधानमंत्री का था इसलिए प्रधानमंत्री को ही जवाब देना चाहिए था। अखबारों का काम था कि वे प्रधानमंत्री से पूछ कर रिपोर्ट करते। पर वह सब होता नहीं है तो आदर्श स्थिति होती कि हम ‘मन की बात’ के अगले एपिसोड का इंतजार करते। सरकार और उसके सभी अंग यही कहते तो आसमान नहीं गिर पड़ता लेकिन सरकार जैसी है, पारदर्शिता की जो कमी है उस कारण जो हुआ है वह बहुत स्पष्ट है और सरकार की कमजोरी या रुख साफ है जो भारत या देश की बदनामी का मामला हो सकता है। लेकिन अभी तक होता यह रहा है कि सरकार करे तो सब ठीक विपक्ष या विरोधी करे तो देशद्रोही। इन दिनों जिस तरह हेडलाइन मैनेजमेंट चल रहा है उसमें एक लाइन का निर्देश और उसके आधार पर खबर हो सकती थी, भारत (विदेश या वित्त मंत्रालय या मंत्री) ने ट्रम्प के दावे को खारिज किया है।
आज अखबारों ने इसकी रिपोर्टिंग जैसे की है उससे साफ है कि सरकार को मीडिया मैनेजमेंट करना नहीं आता है या कर नहीं पा रही है और मीडिया (समग्रता में) जो कर रहा है वह पत्रकारिता या रिपोर्टिंग तो नहीं ही है। उदाहरण के लिए अमर उजाला का शीर्षक देखिए – रूसी तेल पर ट्रम्प का दावा खारिज। इसमें क्यों और कैसे कुछ नहीं है। बस यह भाव है कि खारिज कर दिया तो कर दिया। आप मान लीजिए। लेकिन मानने वालों के लिए तो इसकी भी जरूरत नहीं थी और नहीं मानने वालों का काम इससे चलना नहीं है। पर आपकी यानी पाठक अथवा वोटर की चिन्ता किसे है। फिर भी एक उपशीर्षक है – सरकार की दो टूक, पीएम और ट्रम्प में कल नहीं हुई कोई बात। इसका दूसरा मतलब यही है कि ट्रम्प झूठ बोल रहे हैं। पर तथ्य यह है कि राहुल गांधी ने चुनौती दी थी कि प्रधानमंत्री ऐसा कह दें तो भी प्रधानमंत्री ने ऐसा नहीं कहा। कह दिया होता तो अभी दो टूक की जरूरत ही नहीं थी और नहीं कहा तो अभी दो टूक का कोई मतलब नहीं है। ऐसा ही शीर्षक नवोदय टाइम्स का है – ट्रम्प के एक और झूठ को भारत ने नकारा। इससे लगता है कि अखबार या संपादक यह माने बैठे हैं कि पिछला झूठ साबित हो चुका है या भारत की तरफ से बोलने वाले का सत्यवादी होना साबित और मान्य है। मुझे नहीं पता कि अभी ऐसा कुछ है। अखबार के इस शीर्षक से ऐसा ही लगता है। देशबन्धु का शीर्षक है, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प का दावा – भारत अब रूस से तेल नहीं खरीदेगा। इसके साथ राहुल गांधी का बयान भी है, ट्रम्प से डरते हैं मोदी। कहने की जरूरत नहीं है कि सच्चाई चाहे जो हो, आज अखबारों में सारी लीपा-पोती इसी को गलत साबित करने के लिए है। खबर यही थी जो देशबन्धु में छपी है। ट्रम्प ने सच कहा हो या झूठ, राजनीति कर रहे हों या उनकी कूटनीति हो सबको पता है कि ‘माई फ्रेंड’ और अबकी बार ट्रम्प सरकार वाले डोनाल्ड ट्रम्प युद्ध रुकवाने का दावा कर चुके हैं और जयराम रमेश ने आरोप लगाया है कि भारत के फैसले अमेरिका में लिए जा रहे हैं। मोदी सरकार का मीडिया मैनेजमेंट यह है कि ऐसी खबरें नहीं छपती हैं और प्रमुखता तो नहीं ही मिलती है लेकिन बचाव कितना लचर है वह आज अखबारों से पता चल रहा है और देशबन्धु में भी है। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा है, … जनता के हितों की रक्षा करना हमारी प्राथमिकता रही है। मुझे नहीं लगता है कि इसपर कुछ कहने की जरूरत है। खासकर इन दिनों चल रहे बचत उत्सव के दौरान उसका कारण जानते हुए। पर सरकारी बयान है तो खबर है और पहले पन्ने पर छपी है लेकिन सरकार के मामले में ऐसा नहीं होता है। आज भी नहीं हुआ है।
मुझे लगता है कि ट्रम्प झूठ बोलते हैं, कुछ भी बोल देते हैं या किसी और मकसद से ऐसा करते हैं तो भारत (प्रधानमंत्री) को बताना चाहिए और एक बार बता देना काफी रहेगा। हर बार उनके बयान को गलत साबित करने के लिए ढेरों मंत्रियों, प्रवक्ताओं और प्रचारकों को लगाने की जरूरत नहीं है। इन सब लोगों को उत्पादक और रचनात्मक काम में लगाया जाना चाहिए। लेकिन हमारी सरकार प्रचार और नैरेटिव से ही चल रही है उसमें विपक्ष की आलोचना, बदनाम करना सब शामिल है। इसलिए सरकार का बचाव करना भी सामान्य है। अब यह दिखने लगा है और इससे भारत सरकार, उसके काम, उसकी स्थिरता और 56 ईंची सीने के बारे में अच्छी राय नहीं बन रही होगी। टाइम्स ऑफ इंडिया ने बताया है कि ट्रम्प ने कहा कि आज (बुधवार) को उन्होंने (नरेन्द्र मोदी) आश्वत किया कि वे रूस से तेल नहीं खरीदेंगे…। इसपर विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने कहा है, मुझे नहीं पता है कि कल दोनों नेताओं के बीच कोई बात हुई है। जाहिर है, पता होना जरूरी नहीं है और हुई हो या नहीं, इन्हें खंडन करने की क्या जरूरत और कर रहे हैं तो हम क्यों मान लें। ठीक है कि दूसरी खबर नहीं है तो इसे लीड बनाया जा सकता है लेकिन राहुल गांधी का बयान क्यों नहीं? मुझे तो राहुल गांधी का कहा सही लगता है और इसीलिए देशबन्धु में पहले पन्ने पर है। जो भी हो टाइम्स ऑफ इंडिया की सूचना के आधार पर यह शीर्षक है, बुधवार को बात नहीं हुई (और यह बात करने वाला नहीं कह रहा है)। अखबार ने अमेरिकी राष्ट्रपति के लिए डॉन लिखा है और शीर्षक है, रूस से संबंधित डॉन के दावे पर भारत ने ऐसा कहा।
भारत के प्रधानमंत्री की अमेरिकी राष्ट्रपति या किसी विदेशी मित्र से बात होगी तो विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता को क्यों या कैसे मालूम होगा? जाहिर है, वह वही बोलेगा जो उससे बोलने के लिए कहा जाएगा। अगर ऐसा है तो बताया जाना चाहिए और ऐसा लिखा भी जाता रहा है कि मुझे यह कहने, लिखने या बताने का निर्देश हुआ है। इतने बड़े मामले में ऐसा क्यों नहीं और नहीं है तो यकीन क्यों किया जाए। या कहने का क्या मतलब? इंडियन एक्सप्रेस का शीर्षक भी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता के हवाले से है, पता नहीं है। इसके साथ फ्लैग शीर्षक है, (ट्रम्प ने) प्रधानमंत्री की तारीफ की, भारत को बेजोड़ देश कहा। उपशीर्षक है, भारत द्वारा तेल खरीदना बंद करने पर अमेरिकी राष्ट्रपति ने कहा, (तेल खरीदना बंद करने की) एक प्रक्रिया है, यह जल्दी ही पूरी होगी। आप समझ सकते हैं कि मामला, ‘मुझे पता नहीं है’, भर का नहीं है। द हिन्दू की लीड का शीर्षक है, रूसी तेल आयात को लेकर ट्रंप और विदेश मंत्रालय आमने–सामने। ट्रंप का दावा है कि मोदी ने ‘जल्द ही’ रूस से तेल खरीदना बंद करने का वादा किया है; मंत्रालय ने इस बात से इनकार किया कि नेताओं ने इस मुद्दे पर चर्चा की, लेकिन कहा कि सरकार अपने ऊर्जा स्रोतों का ‘व्यापक आधार’ और ‘विविधीकरण’ कर रही है। आज खबर यही है और इसमें स्पष्ट है कि विदेश मंत्रालय ने जो कहा है वही लिखा गया है और इसीलिए यह सूचना या खबर है। कायदे से खबर ऐसी ही होनी चाहिए। लेकिन दि एशियन एज का भी एक अंदाज है। लीड का शीर्षक तो वही है जो ट्रम्प का दावा है या जो उन्होंने कहा बताया जा रहा है। खंडन फ्लैग शीर्षक है और इंडियन एक्सप्रेस की तरह मोदी की तारीफ को भी प्रमुखता दी गई है। इसके अनुसार, उन्होंने कहा है, “मोदी एक महान हस्ती है। वे ट्रम्प को पसंद करते हैं। मैं नहीं चाहता कि आप ‘लव‘ शब्द को अलग तरह से देखें…. मैं उनके राजनीतिक करियर को खत्म नहीं करना चाहता हूं।“ जाहिर है यह ट्रम्प और मोदी के संबंधों का मामला है। मैं नहीं जानता कि आरएसएस के लोगों के संबंध में इन दिनों सोशल मीडिया पर जो चर्चा चल रही है उसमें पाठक इस लव और अलग तरह से नहीं देखने की अपील के साथ उनके मुख्य बयान को कैसे देखेंगे पर मैं मोदी होता तो ज्ञानेश गुप्ता बन जाता। द टेलीग्राफ का शीर्षक वही है जो मुख्य खबर है। फ्लैग शीर्षक है, व्यापार सौदे की पृष्ठभूमि में टैरिफ से राहत की उम्मीद। यह भी एक खबर है जो मेरे बाकी अखबारों में हाइलाइट नहीं की गई है। इससे भी लगता है कि भारत को प्रतिक्रिया देने की जरूरत ही नहीं थी और देकर बता दिया गया है कि भाजपा और सरकार का मीडिया मैनेजमेंट पैसों के दम पर है, विज्ञापनों पर होगा। इसमें प्रतिभा और योग्यता ढूंढ़े नहीं मिल रही है। (जारी)
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लिंक – https://www.bhadas4media.com/jooth-kee-factory-varshon-se-sarvajanik-shapathpatra-par-tilmilana/

मैं रोज तीन हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल नौ, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। चैट जीपीटी का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल–चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।


