
संजय कुमार सिंह
भारतीय मीडिया का बड़ा वर्ग सरकार या नरेन्द्र मोदी के पक्ष में चुनावी माहौल बनाते रहने का अपना काम निर्बाध गति से जारी रखे हुए है। यूएसएड पर सरकारी स्पष्टीकरण कल भले सभी अखबारों में प्रमुखता से नहीं छपा, संतोषजनक न हो, आज खबर पहले पन्ने से गायब है। कुछ करोड़ के सरकारी खर्चे के बाद 6 फ्लैग स्टाफ रोड से शीश महल बनने वाला मुख्यमंत्री आवास तो चनावी मुद्दा हो सकता है लेकिन चुनाव को प्रभावित करने के लिए कही जा रही 21 मिलियन डॉलर की विदेशी सहायता मुद्दा नहीं है। ऐसी सरकार के प्रधानमंत्री ने बिहार से चुनावी बिगूल फूंक दिया है और आज दिल्ली के ज्यादातर अखबार भी बिहार चुनाव के रंग में हैं। इसमें शेयर बाजार की बुरी हालत (सिर्फ नवोदय टाइम्स में है) खबर नहीं है जबकि सोशल मीडिया में चुनाव नतीजों के बाद सरकार पर राहुल गांधी के आरोप वाली प्रेस कांफ्रेंस और सवाल के वीडियो साझा किये जा रहे हैं। प्रधानमंत्री हमेशा की तरह अपने काम बताने की बजाय विपक्ष की आलोचना में लगे हैं और किसान आंदोलन को नजरअंदाज करने तथा किसानों की मांग की उपेक्षा का रिकार्ड बनाने के बाद बिहार से किसानों को 22 हजार करोड़ रुपये जारी कर रहे हैं।
द ट्रिब्यून में आज यह खबर लीड है। प्रधानमंत्री के नाम से लुटाई जा रही इन रेवड़ियों को ऐसे प्रचारित किया गया है जैसे जब तक नरेन्द्र मोदी सत्ता में रहेंगे या कोई भाजपाई प्रधानमंत्री होगा तभी तक ये पैसे मिलेंगे। दूसरी ओर इस सरकार में पैसे बांटने का यह सरकारी मामला ऐसा है कि अपात्रों को पैसे चले जाते रहे हैं। कभी वापस लिया गया है और कभी नहीं। जो भी हो, बिहार चुनाव के समय बिहार से ये पैसे जारी करके (बिहार के) किसानों को प्रभावित करने की कोशिश की जा रही है जबकि एमएसपी की किसानों की मांग वर्षों से नहीं सुनी जा रही है। आंदोलन और किसानों के शहीद होने के बावजूद। जहां तक बिहार की बात है, देश का सबसे पिछड़ा राज्य अभी भी सबसे पिछड़ा है। 2015 में एक लाख 25 हजार करोड़ रुपये देने की घोषणा अभी तक पूरी नहीं हुई है। भाजपा के सहयोग से मुख्यमंत्री रहे नीतिश कुमार ने 10 साल तक उसकी चर्चा भी नहीं की। जनवरी में जरूर 32 पेज का पत्र लिखा था जिसे नवभारत टाइम्स ने बिहार सीएम के बड़े खेल की तैयारी कहा था। संभव है यह सब करके नीतिश कुमार और नरेन्द्र मोदी अपना लक्ष्य पा लें पर बिहार को ना कुछ मिला है ना मिलेगा। यह यकीन जरूर करना पड़ेगा कि ईवीएम ठीक है और चुनाव आयोग कुछ गड़बड़ नहीं करता है।
उधर दिल्ली जीतने के बाद दिल्ली में लंबे समय से सत्तारूढ़ रही आम आदमी पार्टी की सरकार को बदनाम करने का काम भी चल रहा है। आज टाइम्स ऑफ इंडिया की लीड, “सीएजी के अनुसार डीटीसी का नुकसान छह साल में 35 हजार करोड़ रुपये से ज्यादा” होने की खबर है। इंडियन एक्सप्रेस में भी सीएजी रिपोर्ट से संबंधित खबर है। दि एशियन एज की एक खबर के अनुसार, आप सरकार को साधने के लिए विधानसभा में आज सीएजी की 14 रिपोर्ट रखी जायेगी। विधानसभा सत्र हंगामी होने की उम्मीद। कहने की जरूरत नहीं है कि दिल्ली चुनाव से पहले भी सरकार को सीएजी की रिपोर्ट के हवाले से बदनाम करने की कोशिश की गई थी जबकि वह रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं थी। अब दिल्ली सरकार के खिलाफ तो सीएजी की रिपोर्ट है पर केंद्र सरकार या भाजपा सासित राज्यों की सीएजी की रिपोर्ट कभी सुनने में नहीं आई। ऐसा नहीं कि सीएजी ने राज्य और केंद्र सरकार की तारीफ की होगी। क्योंकि ऐसा होता तो भी भाजपा अपनी पीठ ठोकने से बाज नहीं आती। जाहिर है उसे सार्वजनिक नहीं होने दिया जाता है। द न्यू इंडियन एक्सप्रेस की मार्च 2021 की एक खबर के अनुसार, केंद्र सरकार के मंत्रालयों और विभागों से संबंधित सीएजी रपटों की कुल संख्या 2015 में 55 से घटकर 2020 में सिर्फ 14 रह गई। यह लगभग 75% की गिरावट है। कहने की जरूरत नहीं है कि इससे यह चिंता पैदा होना स्वाभाविक है कि सरकार की वित्तीय जवाबदेही सीएजी की नजर में नहीं आ रही है। लेकिन दिल्ली सरकार के खिलाफ सीएजी की रिपोर्ट से उसे बदनाम किया जायेगा। वह भी तब जब 2जी नीलामी, कोल ब्लॉक नीलामी, आदर्श हाउसिंग सोसायटी और 2010 के राष्ट्रमंडल खेलों में कथित भ्रष्टाचार की खबरों और आरोपों से मनमोहन सिंह सरकार की छवि खराब की गई, नरेन्द्र मोदी ने कहा कि वे रेन कोट पहन कर नहाते हैं और उनकी सरकार गिर भी गई। भाजपा की सरकार में संसद में पेश की जाने वाली रक्षा ऑडिट रिपोर्ट में भी कमी आई है। 2017 में आठ ऑडिट रिपोर्ट संसद में पेश की गईं, जबकि 2020 में यह शून्य थी। रेलवे ऑडिट रिपोर्ट में भी यह कहानी दोहराई गई है। 2017 में, पांच रिपोर्ट तैयार की गईं लेकिन 2020 में यह केवल शून्य थी। यह सब दि इंडियन एक्सप्रेस की उसी पुरानी खबर में था। इससे आप समझ सकते हैं कि यह सरकार कैसे काम कर रही है।
वह भी तब नरेन्द्र मोदी ने सत्ता में आने से पहले भी जो कहा वो जुमले ही थे। झूठे कहानी गढ़ने और उसमें सहयोग करने के लिए तत्कालीन सीएजी विनोद राय को पुरस्कृत किया। दूसरी ओर, उन्हें उस समय के कांग्रेस नेता संजय निरुपम से माफी मांगनी पड़ी थी। दिलचस्प यह कि भ्रष्टाचार के बहुप्रचारित मामलों में किसी को सजा की खबर अभी तक नहीं है। विनोद राय ने अपनी इन ‘कहानियों’ की किताब भी लिखी। यह भाजपा, उसके प्रचारकों और सेवकों की राजनीति है जो सिर्फ प्रचार से चलती है और मीडिया के सहयोग से चल रही है। दूसरी ओर, नरेन्द्र मोदी अभी भी चारा घोटाले के भरोसे हैं। उसी को याद कर रहे हैं जबकि दोषी को सजा हो चुकी है और इसीलिए हो पाई होगी कि उनपर किसी जज को रिश्वत देने, उस जज की संदिग्ध मौत की खबर नहीं है। दूसरी ओर, चारा खाने के कथित अपराध और उसके लिए हुई सजा के कई साल हो चुके हैं। आरोपियों में तमाम दुनिया में नहीं हैं और जो हैं वो भारतीय कानूनों के अनुसार चुनाव नहीं लड़ सकते। अगर उनका बेटा (बेटी या परिवार) उस दल से चुनाव लड़ रहा है तो भाजपा कौन सा दूध की धुली है और तमाम आरोपियों, अभियुक्तों को संरक्षण देने के लिए वाशिंग मशीन पार्टी कही जाती है। उधर तो चारा खाने वाले हैं पर इधर तो बलात्कारी और लड़कियों के सौदागर, वीडियो बनाने और ब्लैकमेल करने वाले सब हैं।
जहां तक चारा चोरी या भ्रष्टाचार की बात है, डबल इंजन वाले उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद जिले का एक पार्क भाजपा शासन में बेहाल रहा। मुख्यमंत्री को पत्र लिखने पर भी कार्रवाई नहीं हुई। छठ से समय कुछ काम होता लगा तो मैंने समझा चलो सरकार इसका इंतजाम तो कर रही है बाद में पता चला वह भी गैर सरकारी प्रयास था। लेकिन लोक सभा चुनाव से पहले पार्क की सुध ली गई। काम शुरू हुए और रुककर या धीमी गति से ऐसे चल रहे हैं जैसे योजना विधान सभा चुनाव से पहले ठीक करने की हो। इस बीच उसकी चारदीवारी, लोहे के ग्रिल बेंच आदि सब चोरी चले गये। बाद में पार्क को गायों ने भी चरा। यहां लोहे के ग्रिल को चरा नहीं गया हो तो बेच खाया गया और फिर मनुष्यों का पार्क गौ माता चरने के लिए दे दिया गया। मैं यही समझ रहा था कि गायों को मनुष्यों से ज्यादा प्राथमिकता है लेकिन अब जब ठीक किया जा रहा है तो चरने और चरने देने का मामला नहीं है? क्या अब फिर चरने या चरने देने की तैयारी नहीं है? यह सब तब जब तेलंगाना टनल में फंसे आठ मजदूरों की जान बचाने की दिशा में कोई खास प्रगति नहीं हो पाई है और कीचड़ व पानी होने के कारण अंदर फंसे मजदूरों से कोई संपर्क नहीं हो पाया है और इस लिहाज से यह सिल्कयारा के मामले से ज्यादा गंभीर है। लेकिन इस खबर को कम महत्व मिला है। प्रधानमंत्री अपनी सांप्रदायिक राजनीति जारी रखे हुए हैं और आज नवोदय टाइम्स में टॉप पर सिंगल कॉलम की खबर है, “कुम्भ को कोसने वालों को बिहार माफ नहीं करेगा : पीएम मोदी”। दि एशियन एज की लीड का शीर्षक है, “कुम्भ पर टिप्पणी के लिए प्रधानमंत्री ने लालू पर हमला बोला, आरजेडी के शासन में ‘जंगल राज’ पर निशाना साधा”।
द हिन्दू के साथ आज अमर उजाला में एक खबर है जो बताती है कि भड़काऊ भाषण मामले में केरल के एक भाजपा नेता को समर्पण करना पड़ा। हिन्दी पट्टी में भाजपा नेता तो छोड़िये तथाकथित साधु और संपादक भी नफरती भाषण देते हैं। पर कार्रवाई नहीं होती है। दूसरी ओर धर्म विशेष के लोगों के सार्वजनिक बयानों में नफरती एंगल या डायलॉग ढूंढ़ा जाता है और मामला न होने पर भी फंसाने के मामले हैं। ऐसे में केरल की यह खबर उत्तर भारत या हिन्दी पट्टी में पढ़ने-पढ़ाने लायक है। लेकिन ज्यादातर अखबार प्रधानमंत्री और भाजपा के खिलाफ जा ही नहीं सकते हैं। भाजपा नेता पीसी जॉर्ज के खिलाफ टीवी डिबेट के दौरान नफरती टिप्पणी करने का मामला है। केरल हाईकोर्ट ने शुक्रवार को भाजपा नेता पी.सी. जॉर्ज की अग्रिम जमानत याचिका खारिज कर दी। मुस्लिम यूथ लीग के नेता मुहम्मद शिहाब की शिकायत पर इराट्टूपेट्टा पुलिस उनके खिलाफ मामला दर्ज किया था। अपनी शिकायत में शिहाब ने आरोप लगाया था कि उनकी टिप्पणी से अलग-अलग धार्मिक समुदायों के बीच नफरत फैल सकती है। कोट्टायम जिला सत्र न्यायालय ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका खारिज कर दी तो जॉर्ज ने हाईकोर्ट का रुख किया था। पूर्व विधायक जॉर्ज पर आरोप है कि उन्होंने एक टेलीविजन चैनल पर बहस के दौरान एक अल्पसंख्यक समुदाय के खिलाफ नफरती टिप्पणी की। उनके खिलाफ केरल पुलिस अधिनियम की धारा 120 (0) और बीएनएस की धारा 299 और धारा 196 (1) (ए) के तहत मामला दर्ज किया गया है। इसी तरह नवोदय टाइम्स में एक खबर है, ललित मोदी ने ली वनुआतु की नागरिकता, प्रत्यर्पण कठिन। ललित मोदी ने प्रशांत महासागर के देश वानुआतु की नागरिकता प्राप्त कर ली है, जिससे उसका भारत प्रत्यर्पण कठिन हो गया है। वानुआतु का भारत के साथ कोई प्रत्यर्पण संधि नहीं है। मोदी पर 125 करोड़ रुपये के घोटाले का आरोप है और भारतीय एजेंसियां उन्हें 12 साल से ढूंढ रही हैं। यह नई नागरिकता उनकी गिरफ्तारी में एक बड़ी बाधा बन गई है। यह अलग बात है कि उसके बाद फरार हुए (या फरार होने दिये गये) बहुत सारे लोगों को तमाम आश्वासनों, दावों और कोशिशों के बाद भी अभी तक वापस नहीं लाया गया है। अगस्ता वेस्टलैंड सौदा में एक अपवाद था तो उससे भी कुछ मिला नहीं और पिछले दिनों उसकी जमानत हो गई। आजतक डॉट इन की जून 2015 की एक खबर के अनुसार, पूर्व आईपीएल प्रमुख ललित मोदी की मदद मामले में भाजपा नेता वसुंधरा राजे व (दिवंगत) सुषमा स्वराज का नाम आ चुका है और इसपर सार्वजनिक चर्चा भी हुई है खबरों के अनुसार, ललित मोदी ने राष्ट्रपति भवन के सचिव (तत्कालीन) ओमिता पॉल के साथ एक के बाद एक ट्वीट और पोस्ट में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ उस समय के बीजेपी अध्यक्ष (अब केंद्रीय मंत्री) अमित शाह का भी नाम है। ईडी ने फेमा के तहत अलग-अलग मामलों में ललित मोदी को 16 कारण बताओ नोटिस जारी किए हैं (थे)।


