राजेश सारथी-
वर्धा, 4 जनवरी : महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय (MGAHV), वर्धा, महाराष्ट्र में 2007 में हुई लेक्चरर पद पर पियूष प्रताप सिंह की नियुक्ति को लेकर गहरे विवाद उत्पन्न हो गए हैं। प्राप्त दस्तावेज़ों और सूत्रों के अनुसार, चयन प्रक्रिया में उल्लंघन हुए हैं, जिनसे विश्वविद्यालय की नियुक्ति प्रक्रिया और प्रशासनिक प्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।
क्या है मामला? 2006 में विश्वविद्यालय के सूचना प्रौद्योगिकी विभाग में लेक्चरर पद के लिए विज्ञापन जारी किया गया था। विज्ञापन में पद के लिए न्यूनतम योग्यता के रूप में निम्नलिखित शर्तें निर्धारित की गई थीं:
- एमसीए (55% अंकों के साथ) – उम्मीदवार को कंप्यूटर अनुप्रयोग में मास्टर डिग्री होनी चाहिए, जिसमें न्यूनतम 55% अंक होने चाहिए।
- नेट (NET) या पीएचडी – उम्मीदवार को राष्ट्रीय पात्रता परीक्षा (NET) उत्तीर्ण होना आवश्यक था, या फिर उनके पास पीएचडी डिग्री होनी चाहिए।
- अन्य आवश्यक शैक्षिक योग्यता – जिनमें कुछ विशेष तकनीकी दक्षताओं और शैक्षिक अनुभव की आवश्यकता थी।
- हालाँकि, पियूष प्रताप सिंह, जो इस पद के लिए चयनित हुए थे, न तो नेट उत्तीर्ण थे और न ही उनके पास पीएचडी की डिग्री थी। इसके अलावा, उनके पास कोई शोध प्रकाशन या अन्य अपेक्षित शैक्षिक प्रमाणपत्र भी नहीं थे। इसके बावजूद, उन्हें इस पद पर नियुक्त किया गया।
चयन प्रक्रिया में गड़बड़ी विश्वविद्यालय द्वारा बनाई गई प्रारंभिक चयन समिति ने पियूष प्रताप सिंह को अयोग्य करार दिया था, क्योंकि उनके पास नियमानुसार आवश्यक शैक्षिक योग्यता नहीं थी। इसके बाद, तत्कालीन कुलपति प्रोफेसर जी. गोपीनाथन ने एक आदेश जारी किया जिसमें कहा गया कि न्यूनतम वेतनमान पर योग्य उम्मीदवारों का चयन किया जाए। इसके बावजूद, एक नई समिति ने पियूष प्रताप सिंह को योग्य मानते हुए उन्हें नियुक्ति देने की सिफारिश की।
इस मामले में सबसे बड़ी गड़बड़ी यह थी कि विश्वविद्यालय ने UGC के स्पष्ट दिशा-निर्देशों का उल्लंघन किया। विश्वविद्यालय को यह सुनिश्चित करना था कि उम्मीदवार के पास UGC द्वारा निर्धारित मानकों के अनुरूप योग्यता हो, लेकिन यह सब कुछ नजरअंदाज किया गया।
पदोन्नति और स्थायीकरण में अनियमितता नियुक्ति के बाद, पियूष प्रताप सिंह को मात्र एक वर्ष के भीतर स्थायी नियुक्ति दे दी गई। इसके अलावा, उन्हें बिना कोई शोध पत्र प्रकाशित किए और बिना आवश्यक शैक्षिक प्रमाणपत्रों के, एसोसिएट प्रोफेसर और फिर प्रोफेसर के पदों पर पदोन्नत कर दिया गया। UGC के दिशा-निर्देशों के अनुसार, इन पदों के लिए शोध कार्य और उचित अकादमिक योगदान की आवश्यकता होती है, जो सिंह के पास नहीं था।
UGC के दिशा-निर्देशों का उल्लंघन UGC के दिशा-निर्देशों के अनुसार, किसी भी उम्मीदवार को उच्च शैक्षिक पदों के लिए चयनित करने से पहले यह सुनिश्चित करना आवश्यक है कि वह उम्मीदवार योग्य हो, और उसकी योग्यता UGC द्वारा निर्धारित मानकों के अनुरूप हो। यदि किसी उम्मीदवार के पास नेट उत्तीर्ण नहीं है और उसके पास शोध कार्य या प्रकाशित शोध पत्र नहीं हैं, तो उसे उच्च पदों पर पदोन्नति देने का कोई औचित्य नहीं है। इसके बावजूद, पियूष प्रताप सिंह को यह सारी अनियमितताओं के बावजूद नियुक्ति और पदोन्नति दी गई, जो साफ तौर पर नियमों का उल्लंघन है।
प्रशासन की भूमिका पर सवाल विश्वविद्यालय प्रशासन की भूमिका पर भी गंभीर सवाल उठाए गए हैं। चयन समिति के सदस्यों और कुलपति प्रोफेसर जी गोपीनाथन पर आरोप हैं कि उन्होंने जानबूझकर नियमों का उल्लंघन किया। इसके अलावा, नियुक्ति प्रक्रिया के बाद जारी किए गए आदेशों की प्रतियां कुलपति को नहीं भेजी गईं, जिससे यह मामला और भी संदिग्ध हो गया।
क्या कहते हैं नियम? UGC के दिशा-निर्देशों के अनुसार, किसी भी उम्मीदवार को उच्च शैक्षिक पदों के लिए चयनित करने से पहले यह सुनिश्चित करना आवश्यक है कि वह उम्मीदवार योग्य हो, और उसकी योग्यता UGC द्वारा निर्धारित मानकों के अनुरूप हो। यदि किसी उम्मीदवार के पास नेट उत्तीर्ण नहीं है और उसके पास शोध कार्य या प्रकाशित शोध पत्र नहीं हैं, तो उसे उच्च पदों पर पदोन्नति देने का कोई औचित्य नहीं है। इसके बावजूद, पियूष प्रताप सिंह को उच्च पदों पर नियुक्त और पदोन्नत किया गया।
वर्तमान स्थिति सूत्रों के अनुसार, पियूष प्रताप सिंह वर्तमान में जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) में प्रोफेसर के पद पर कार्यरत हैं। यह मामला उच्च शिक्षा संस्थानों में नियुक्ति प्रक्रिया की पारदर्शिता और निष्पक्षता को लेकर गंभीर चिंताएँ उत्पन्न कर चुका है। JNU जैसे प्रतिष्ठित संस्थान में उनकी नियुक्ति और पदोन्नति को लेकर अब सवाल उठने लगे हैं।
न्याय की उम्मीद विशेषज्ञों और शिक्षा जगत के जानकारों का मानना है कि इस मामले की निष्पक्ष और गहन जांच होनी चाहिए। दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जानी चाहिए ताकि उच्च शिक्षा प्रणाली में योग्यता और पारदर्शिता सुनिश्चित की जा सके। यह मामला उच्च शिक्षा में सुधार की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकता है, जिससे भविष्य में नियुक्ति प्रक्रियाओं में पारदर्शिता और निष्पक्षता को बढ़ावा मिलेगा।
देखें ये दस्तावेज…





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प्रोफेसर पियूष प्रताप सिंह का पक्ष भी पढ़ें…
इस पूरे मसले पर पियूष प्रताप सिंह ने भड़ास को बताया की यह 20 वर्ष पुराना मामला है। मैं इस वक़्त JNU में कार्यरत हूं. यह सभी आरोप फर्जी हैं… मेरी छवि को नुकसान पहुंचाने का जबरन प्रयास है। मैं मानहानि का नोटिस भेजने के लिए अपने अधिवक्ता से मशविरा कर रहा हूं….
मानहानि से संबंधित बिंदु –
- विश्वविद्यालय की 14 साल तक की सेवा में मुझे कोई भी नोटिस नहीं मिली और ना कोई न्यायिक कार्यवाही की गई
- विश्वविद्यालय ने मेरे आवेदन पर विचार कर मुझे इंटरव्यू के लिए बुलाया और नियुक्त किया उसके बाद मेरी सेवाओं का स्थाईकरण भी किया। जो कार्य परिषद से पास होकर मिनिस्ट्री ऑफ एजूकेशन से एप्रूव होकर महामहिम राष्ट्रपति द्वारा एप्रूव की गई।
- फर्जी शिकायती व्यक्ति मेरे नियुक्ति में आवेदक नहीं था अतः बिना आवेदन के किसी की नियुक्ति पर प्रश्न नहीं उठाया जा सकता।
- महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय वर्धा में लगभग 14 साल तक मैं कार्य किया और उस समय तक यह आवेदक मैं कोई आवेदन नहीं किया है।
- फर्जी आवेदक द्वारा ,किया गया आवेदन समय सीमा के बाहर है है।नियुक्ति का प्रश्न जनहित या फर्जी आवेदन से नहीं प्रश्नगत किया जा सकता।
- नियुक्ति प्रक्रिया विशेषज्ञों की कमेटी के द्वारा की जाती है अतः विशेषज्ञों की कमेटी पर किसी फर्जी आवेदक द्वारा प्रश्न नहीं उठाया जा सकता।
- यह विशेष उसे उल्लेखनीय है कि महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय वर्धा की सेवा से कार्य मुक्त हुए एवं त्यागपत्र दिए हुए मुझे 4 वर्ष से अधिक समय हो गए ऐसी स्थिति में पूर्व की नियुक्ति पर कोई भी प्रश्न करना अवैध है।
- प्रश्न कर्ता आवेदक द्वारा नियुक्ति पर प्रश्न उठाकर के मेरा मानसिक शोषण और समाज में मेरी छवि गिरने का प्रयास है। इसलिए प्रश्न करता को क्षमा मांगना चाहिए अन्यथा मान हानि की कार्यवाही अनिवार्य होगी।



